Wednesday, 31 December 2014

चलें फिर नए साल में


आज बॉस की नज़रों से बच कर जब झांका इस साल के अतीत मे तो पाया की जिंदगी के बाकी साधारण सालों की तरह ही एक और साल आज इतिहास बन चला। कई देर तक इस साल की खट्टी मीठी यादें शरीर के उपर वाले माले मे तैरती रहीं। Thank You 2014। आप कब पंख लगा कर उड़ गये पता ही नहीं चला। आपने आज फिर अहसास करा दिया की टाइम कभी रुकने के लिये किसी की दलील नहीं सुनता। आपका और हमारा साथ काफी अच्छा रहा। शुक्रिया। अब आपका कलेन्डैर आज रात को आग सेंकने के काम आयेगा।  
सभी साथियों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। 

Saturday, 20 December 2014

दोस्त की बीमारी और मेरा एजेंडा

दो साल पहले की बात है एक करीबी दोस्त को कोई गंभीर बीमारी हो गयी। दुनिया भर के टेस्ट, चेक-उप और इलाज करवाने के बाद आखिरकार ये निष्कर्ष निकला की Food Poisoning हुई है। फाइनली एक नामी डॉक्टर ने इलाज शुरू किया। 6 महीने तक दवाई चली। 6 महीने बाद दोस्त तो ठीक हो गया पर फूल कर भैंसा हो गया। सबने सोचा की नॉर्मली हो गया होगा। मैने दोस्त को बोला की तेरा डॉक्टर जो दवाई देता है वो क्रॉस चेक करवा लेना कहीं से। कुछ दिन बाद फिर से पेट मे दर्द उठा तो घरवाले भागे डॉक्टर के पास। डॉक्टर ने कुछ दवाई दी और घर भेज दिया। दोस्त ने सारी दवाइयां एक एक कर के गूग्ल पर चेक की। पेट दर्द के लिये उसका डॉक्टर जो दवाइयाँ दे रहा था वो ये निकलीं - Pain killer, Antibacterial, Paracetamol, Constipation, Vomit, मुह के छाले, भूख लगने वाली......और भी कुछ। अब जिनको पता है ये दवाईयाँ किस काम आती हैं वो मामले की गंभीरता को अच्छे से समझ सकते हैं। आगे जो हुआ सो हुआ, लेकिन इस छोटे से किस्से ने बुरी तरह झंकझोर दिया है। रह रह कर ये ही दिमाग मे आ रहा है की देश मे उन लाखो करोडो लोगों का क्या हाल हो रहा होगा जिनके पास गूगल नहीं है? जब दिल्ली जैसे शहर मे ऐशा हो सकता है तो भारत के दूर दराज के गाँवो मे ये झोलाछाप कैसे अपना गोरखधंदा मज़े से फैला रहे होंगे। खैर हम भी कभी खोलेंगे अपना NGO और करेंगे Social Work। तब करेंगे लोगों को जागरूक। फेकबूक पर तो लोग लाइक भी ठीक से नहीं करते जागरूक क्या होंगे। बहरहाल, एक और एजेंडा शामिल हो गया है हमारी To Do लिस्ट मे...

निर्भया का स्टिंग और मेरा Experience

कल दिन भर टी वी पर निर्भया निर्भया का शोर छाया रहा। टीवी वाले स्टिंग दिखा रहे थे की कैसे दिल्ली के लोग लड़कियों को बचाने के लिये आगे नहीं आते। जब उन्होने एक बस का स्टिंग दिखाया तो मुझे 2008 की एक घटना याद आ गयी। रात के 9 बजे थे और मै धौला कुँआ से नोइडा जाने वाली 323 नंबर ब्लू लाइन बस मे था। बस मे कंडक्टर और हेलपर के नाम से 6 लड़के पड़े थे। लगभग सारे ही नशे मे फुल थे। एक लड़की और उसका बाप जिनको शायद कही उतरना था वो अपनी सीट से उठ कर दरवाजे पर आ गये। लड़की के साथ आगे वाले गेट की खिड़की पर बैठे हुए लड़के ने छेड़खानी शुरू कर दी। लड़के ने उन्हे उनके स्टैंड पर उतरने नहीं दिया। लड़की ने कुछ हो हल्ला मचाया। सब लोग मुर्दों की तरह शांत पड़े रहे। मेरा कॉलेज अभी हाल ही मे पूरा हुआ था। कॉलेज मे दिल खोल कर किये गये लड़ाई झगड़ों का असर था की मेरे अंदर कुछ हिम्मत बची हुई थी। उपर से नया नया जिम शुरू किया था तो मै भी फुल हवा मे था। आखिरकार मैने मोर्चा संभाला और जाकर् उस लड़के को सीधे 2 घूंसे मुह पर जड़ दिये। और लड़की के बाप को बोला पोलीस को फोन करे। इस से पहले कुछ और होता लड़की के पिता मे अचानक गज़ब की फुर्ती आ गयी और मेरा हाथ पकड़ कर बोला क्यूं फालतू मे लफड़ा कर रहे हो !! जाओ जाकर अपनी सीट पर बैठ जाओ। मन तो किया लड़के की बजाय लड़की के बाप का मुह तोड़ दूं। पर इस आपा धापी के बीच बस अगले स्टैंड पर रुकी और बाप बेटी उतर कर अंधेरे मे कही गुम हो गये। स्टिंग करने वालों को कैसे बताया जाये की सारे स्टिंग लड़कियों के लिये करने की बजाय एक दो स्टिंग हमारे जैसों का भी कर दिया करो। क्या पता किसी एक आध लड़की को शर्म आ जाये और कुछ हिम्मत कर ले आगे से। उस लड़के की छेड़खानी की लिस्ट मे अब तक ना जाने कितनी लड़कियां शामिल हो गयी होंगी।

Friday, 12 December 2014

भेड़ की लात और मफलर चच्चा

मेरी मित्र सूची मे कितने लोग ऐसे हैं जिन्होने कभी संघ की कोई शाखा देखी है। कोई संघ से जुड़ा हुआ या संघ को नजदीकी से जनता हुआ हो? शायद ही कोई होगा। किन्तु एक बात मै आपको बता दूं की अगर न्यूज़ चैनल्स देख कर या दिग्विजय जैसे किसी धूर्त नेता का बयान सुन कर RSS के प्रति आप भी अपनी गलत राय बना बैठे हैं तो एक बार नजदीकी शाखा मे जाकर देखे। आपने आपको देशभगत कहने वाले अगर अपने आप पर ही ना लज्जा जाएं तो कहना। क्या सिखाया जाता है वहां। वाकई गज़ब। कज्जु सर ने बोला है की अगर पावर मे आये तो देल्ली मे RSS को बैन करेंगे। अपने बड़के भैया की बात याद आ गयी। भेड़ अगर गुस्से मे किसी को लात भी मारती है तो घुटने से उपर नहीं मार पाती। इसलिये आदमी भेड़ के गुस्से से भी डरता नहीं है। मफलर चच्चे वैसे तो हमे दिल्ली के चुनाव मे कोई खास दिलचस्पी नहीं है। आप जीते या BJP किन्तु एक बात समझ लो हमे भेड़ की लात और औकात की हद अच्छे से पता है। यूं फालतू की हवा ना बनाओ।

Monday, 8 December 2014

It is a Jungle out there

एक किताब का वाक्य याद आ गया। आप भी सुनिये। 
It is a Jungle out there. और जंगल बड़ा बेरहम होता है. यहाँ अगर तुम मर गये तो इसके जिम्मेदार तुम खुद होगे. तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारी मौत की समीक्षा दूसरे लोग करेंगे। 
कल सुना दिल्ली मे फिर से रेप हो गया। लड़की ने क्या पहना था, क्या खाया या पिया था और कितने बजे निकली थी। इस सबकी समीक्षा करने के लिये अब हमारे तुम्हारे जैसे दूसरे लोग हैं। जंगल नहीं बदलेगा। ये सदियों से ऐसे ही चला आ रहा है। अगर तुम इसको बदल सकते हो तो हम तुम्हारे साथ हैं। किन्तु पहले खुद से शुरुआत करो। पहले इतना तो बदल जाओ की खुद को सुरक्षित रख सको। रोहतक वाली लड़कियां सही थी या गलत पता नहीं। किन्तु कुछ सीखो उनसे। सुन लो लड़कियों जिस दिन तुम सुरक्षित हो गयी उस दिन जंगल के बाकी जानवर असुरक्षित हो जायेंगे। अगर कमजोर हो तो तुम्हे जिम जाने से किसने रोका है? जूडो कराटे – मार्शल आर्ट सीखने से किसने रोका है? यहाँ कोई बचाने नहीं आयेगा। You have to survive in Jungle. यहाँ अगर तुम मर गये तो इसके जिम्मेदार तुम खुद होगे। It is a Jungle out there. और जंगल बड़ा बेरहम होता है। 

Tuesday, 2 December 2014

रहम करो सरकार

साध्वी जो भी नाम है उसका। मनोहर लाल खट्टर। गिरिराज सिंह। योगी आदित्यनाथ। स‍तीश उपाध्याय। अरुण जेटली। राजनाथ सिंह। इन सबने अपने दकियानूसी बयानो और हरकतो से साबित कर दिया है की बेवकूफी किसी एक आदमी या पार्ती की बपोती नहीं है। कोन है वित मंत्री, डिजल-पट्रोल के दाम घटने से महंगाई कम क्यूँ नहीं हुई? कोन है गृह मंत्री, छतिसगढ़ मे नक्सली हमले अभी तक क्यूँ हो रहे है? कोन है हरियाना का CM, बिना जांच के इनाम का एलान कैसे कर दिया? जो सरकार सिर्फ मिडिया रिपोर्ट के आधार पर फैसला ले ले वो क्या भैंस की पुंछ शासन करेगी। रहम करो सरकार। आनन फानन मे मोदी से ज्यादा एक्टिव बनने की कोशिस ना करो। वो तो तुम लोग इस जन्म मे बन भी नहीं सकते। कुछ टिप्स ले लो मोदी से। रहम करो सरकार।

Monday, 1 December 2014

रोहतक बस कांड

हरियाणा है ये यू पी नहीं। बस का ड्राइवर और कंडक्टर गुंडागर्दी नहीं करने देते। कोई लड़का बदतमीज़ी करे तो बाकी सवारी ही उनको नहीं छोड़ती। लगता है मीडिया एक ही पक्ष को दिखा रहा है। चक्कर कुछ और है। रोहतक बस कांड का असली सच क्या है? आनन फानन मे लड़कियों को 31000 /- किस बात के? बाकी सवारियों का ओन रेकॉर्ड बयान क्यूं नहीं लिया गया? मीडिया जो दिखा रहा है वही सच है एशा मानने को दिल नहीं कर रहा है। 

Monday, 24 November 2014

खिसयायी बिल्ली और स्मृति ईरानी

कल शाम को घर से बाहर निकला तो देखा अपने मोहल्ले की बिल्ली खंबे को टक्कर पे टक्कर मारे जा रही है। कभी दौड़ के आती और जोर से टक्कर मारती तो कभी पंजे से खंबे को नोचती। कभी चाटती तो कभी घूरती। मैने पूछा रे बावली के होग्या ? बोली देखते नहीं हो खंबे को नोच रही हूँ। पर क्यूं ? खिसया गयी हो क्या ? हाँ मै खिसया गयी हूँ। कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है। किस मुद्दे पर पकडूँ, किस पर घेरूँ। मैने पूछा रे साफ साफ बता। चक्कर क्या है? पता लगा क़ि इसलिये नाराज है की स्मृति ईरानी पंडित के पास क्यूँ गयी। तो क्या हुआ? नहीं ये अंधविश्वास है। और जो टीवी मे आते है वो? नहीं वो नहीं क्यूंकि जो मीडिया वाले इसको अंधविस्वास बता रहे हैं, उनके चैनल पर सुबह शाम एक घंटे के प्रोग्राम मे आने वाले ज्योतिष देखने वाले माता और बाबा लोग सेक्युलर हैं इसलिये वो अंधविश्वासी नहीं माने जायेंगे। या खुदा, ये स्मृति भी ना जाने अभी और कितनी बदनामी करवाएगी। सांप्रदायिक कहीं की। 

# स्मृति ईरानी # खिसयायी बिल्ली खंबा नोचे - विपक्ष 

Sunday, 23 November 2014

बधाई हो लड़का हुआ है।

बधाई हो लड़का हुआ है।
अरे रे पहले पूरी बात तो सुन लीजिये। मेरी बीवी की कोख से नहीं हुआ। अरे नहीं भाई बाहर वाली का भी कोई चक्कर नहीं है। गोद लिया है। अजित सिंह ने दिया है। उदयन से। राहुल नाम है। उम्र यही कोई 8 साल। रंग तेजस्वी। हमने तो वजन और हाइट की डीटेल भी मांगी थी, किन्तु अजित जी अपने कामों मे अत्याधिक व्यस्त होने के चलते दे नहीं सके हैं अब तक। खैर वो बाद मे मिल जायेगी। तो आज से ये हमारा बेटा और हम इसके मुंह बोले पापा। धन्यवाद अजित सिंह जी। माफ कीजिये अब बोलिये क्या बोल रहे थे आप?
बधाई हो लड़का हुआ है।

Monday, 17 November 2014

श्री राम का अश्वमेध यग

अश्वमेध यग सुना है? प्रभु श्री राम ने किया था। घोड़ा दौड़ाया था अपना। घोड़ा जहाँ जायेगा वहा सहयोग भाईचारा बराबर का किन्तु राजा होंगे रामचंद्र। वही घोड़ा आज फिर से दौड़ रहा है। गांव गांव देश देश। कोई पकड़ नहीं पा रहा है। साथ खड़ा होकर दौड़ नहीं पा रहा है। सुना है अमेरिका मे तो 100 घंटे मे पचासों कार्यकर्म निपटा दिये थे। बिना कुछ खाये पिये। बहोत जोरदार स्वागत हुआ था वहां? अब किसी ने बताया की G20 कुछ होता है। वहां तो और भी बुरा हाल था। ब्रिटिश अखबार बोला की G20 का सबसे लोकप्रिय नेता है ये? और ऑस्ट्रेलिया ने तो ट्रेन ही चला दी मोदी एक्सप्रेस के नाम से। कोई कह रहा है की इस्राइल के राजा ने भी चिठी लिखी है। प्रार्थना की है की भाई एक बार घोड़ा यहाँ भी भेजो। हमे भी सहयोग - भाईचारा बढ़ाना है। एक विश्व स्तरीय नेता को प्रधानमंत्री चुना है भारत की जनता ने। और भारत को विश्व स्तर का बनाने के लिये काम जोर शोर से चल रहा है। भीड़ भाड़े की है या नहीं ये सोचने मे अपनी उर्जा ना व्यर्थ करें। कृपया सब एक कदम आगे बढ़ाये।
भारत बढ़ रहा है। आओ इसका हिस्सा बने। 

Twitter से -
Stephanie March @steph_march
This Modi event in Sydney is like a (slightly) smaller Olympics opening ceremony. ‪#‎sydneystorm‬
Rahul Kanwal @rahulkanwal
You can bring the biggest rockstar or sports star in world & I doubt he/she can match kind of welcome @narendramodi received at Allphones
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Wednesday, 12 November 2014

मोदी की राजनीति - Visit of Japan


नरेन्द्र मोदी राजनीति के बहोत ही चतुर खिलाडी हैं। जूता भीगा कर मारते हैं। क्यूंकि सूखे जूते से आवाज ज्यादा आती है और चोट कम लगती है। भीगे हुए जूते से अंदरूनी चोट लगती है। दर्द अइशा की ना किसी को बता सकते हैं, ना छुपा सकते हैं। अभी देखो एक तो गीता ले कर गये गिफ्ट करने को। उपर से बयान एसा दे डाला। हंसते हुए बोले की भारत मे सेकुलर्स की भी रोजी रोटी चलनी चाहिये। भाई जूता भिगोने की क्या जरूरत थी भला? इतनी दूर बैठ कर भी नही छोड़ा। कितना दर्द हुआ होगा, कभी सोचा है। जब इतनी दूर गये हो तो कुछ मुद्दा हमे भी दे देते चिल्‍ल पों करने को। कुछ नही छोड़ा। सब अपना ही नाम कर लिये बस। उपर से चिड़ाने के लिये इतनी जोर से कान के नीचे ड्रम और बजा दिये। निवेश इतना लाये की पीछे जीरो कितनी है वोही समझ नहीं आ रहा है। विरोधी समझ नहीं पा रहे हैं की किस बात पर विरोध करें। 
सभी मित्रों से अनुरोध है की मोदी का विरोध इसलिये ना करे की विरोध करना है। या तो तैयार रहें आने वाले और भी ज्यादा रोमांचक दिनो का आनंद लेने के लिये या खेलते रहें आलू – टमाटर और साम्प्रदायिकता से। 

मोदी का सूरज


एक दोस्त ने एक दिन पूछा कि भाई सूरज पूर्व से ही क्यूं निकलता है? मैने उसको बोला कि भाई अगर पश्चिम से निकलता तो तू पूछता कि पश्चिम से ही क्यूं निकलता है, पूर्व से क्यूं नहीं निकलता? मोदी जी लालकिले से चढ कर बोल दिये की सब सांसद एक गांव को गोद लें। उसको आदर्श गांव बनाएं। सबके काम की समीक्षा होगी। और किसी का तो सुना नहीं किन्तु अखबर मे पढ़ा कि मीनाक्षी लेखी ने दिल्ली के अपने लोकसभा छेत्र के किसी गांव को गोद ले लिया है और काम शुरू भी कर दिया है। ये पढ़ कर कुछ बुद्दिजीवी लगे अपना ज्ञान बांटने कि ये ही गांव क्यूं लिया वो क्यूं नहीं लिया? अब इनको कोन समझाये कि भाई सूरज कहीं से भी निकले आपके सवाल तो फिर भी ऐसे ही रहने वाले हैं। फिर क्या फर्क पड़ता है कि कोन सांसद कोन सा गांव गोद ले रहा है। काम तो आप लोगों को फिर भी नहीं देखना है। मोदी जी भी पता नहीं क्या क्या बोल गये लालकिले पर चढ कर। नेतागिरी का कोई स्तर ही नहीं है। कोई घोटाला वोटाला करने पर ध्यान दो साहब। कहाँ इन चक्करों मे पड रहे हो। देश की जनता को आदत नहीं है एकदम से इतना कुछ अच्छा सहने की।           

Kiss of Love


I don't allow my sister or daughter to kiss someone in a restaurant. I could slap her even. So m I a Sanghi Gunda as well? Thanks comrades. I love to be that then. And Congratulations as there is atleast one Sanghi Gunda in each family from now on. 
# Kiss of Love

Interviews

Interviews!!? Hundreds of people for one post always!! Then rounds of so called interviews. How anybody can judge somebody in 5 minutes. Why do companies bother such interviews? Perhaps it makes them feel better to talk about the problems of world, even though the actual job involves to follow already set procedures or just sitting at the desk and punching formulas into spreadsheets.

देवी-देवताओं का दुरुपयोग

शादियों का सीजन आ गया है. अब फिर से निमन्त्रण पत्र आयेंगे. लोग शादियों के कार्ड्स पर धातु / प्लास्टिक के बने हुए गणेश जी की मूर्तियाँ लगा देते हैं. अपनी श्रधा दिखाने के लिये. कही मंगल मूर्ति नाराज ना हो जाये. बोलने ना लगे की भाई तूने मेरी मूर्ति अलग से तो चिपकाई ही नहीं. बप्पा सब शुभ करें इसलिये अलग से मूर्ति लगाओ कार्ड पर. एक शादी के सीज़न मे 50 से ज्यादा कार्ड्स आते हैं. समझ नहीं आता क्या करें इन मूर्तियों का. अलग से उतार कर रखें, कार्ड के साथ रद्दी वाले को दे, फेंक दे या कुछ और. भैया हमने तो लगा दी है. अब सामने वाला भुगते. दिवाली का त्योहार भी अभी गया है. देख रहा हूँ कहीं भी पीपल का पेड़ है उसके चारों तरफ घरों से निकाली हुई भगवान की पुरानी मूर्तियों का ढेर लगा है. लोग दिवाली पर नयी मूर्ति ले आये हैं. पुराने वाले भगवान की अब जरूरत नहीं रही. नये चमकते हुए भगवान आयेंगे तो मन लगा कर आशीर्वाद देंगे. पर पुरानी मूर्तियों का क्या करें. अगर फेक दी तो पुराने वाले भगवान नाराज हो जायेंगे. तो अपना पीछा छुडवाओ पेड़ के नीचे रख दो. अब सामने वाला भुगते. पिछले हफ़्ते दिल्ली के विभिन्न हिस्सों मे घूमने का मौका मिला. एक कॉमन चीज़ जो लगभग हर जगह देखने को मिली वो थी देवी देवताओं की छपाई वाली टाइल्स. पूरी दिल्ली मे बहोत सी एसी बिल्डिंग हैं जिनकी बाहरी चारदीवारी पर देवी देवताओं की छपाई वाली टाइल्स चिपका रखी हैं. पता लगा की भैया दीवारों के कान होते हैं और लोग उन कानो को दिल खोल कर गिला करते हैं. तो भगवान की मूर्तियाँ चिपका दी गयी हैं. कुछ तो शर्म करेंगे लोग. दीवारों पे चढ़ के हगना-मूतना, थूकना कुछ तो कम करेंगे. हमने पुछा की भैया अगर लोग अब भी ना माने तो? जवाब आया वो सामने वाला भुगते. धर्म के ठेकेदारों मेरी कोमल भावना बहोत जोर से आहत हो रही है. कोई तो बताओ देवी-देवताओं का ये दुरुपयोग कैसे रुकेगा? सामने वाला कैसे भुगते?

Tuesday, 7 October 2014

लड़की होने का अभिशाप


लड़का लड़की को एक समान बताने वालो यथार्थ सुनिये। एक बहन है अपनी। मौसेरी। बड़ी मुश्किल से रिश्ता हुआ है। क्युकी दीपिका पादुकोण से थोड़ी कम खूबसूरत है। पढ़ी लिखी ज्यादा है। दुनियादारी की समझ आ गयी है। अपना अच्छा बुरा सोच सकती है। किंतु कोढ़ मे खाज ये की अकूत धन संपदा के भंडार नही हैं। अनपढ़ लोगों के पल्ले बंधने से साफ मना कर दिया। घर वालों की भी छाती 56 इंच की हो गयी। इतना पढाया है तो कम से कम कालेज की शक्ल देखने वाला लड़का तो मिलेगा ही। क्या कहा SUV नहीं दे सकते ? बड़े निर्लल्ज लोग हैं जो एक SUV के लिये इतने अच्छे घर के रिश्ते को ना कर दिया। माता पिता को चिंता दीमक की तरह खाए जा रही है। आखिरकार, सारे जहाँ की मिट्‌टी को अपने पैरों के नीचे पीस कर पतला कर देने के बाद खुशी का दिन आया। खुशी इतनी की धूम 3 के रेकॉर्ड तोड कमाई की खुशी भी फीकी पड जाये। हैसियत से ज्यादा खर्चा किया गया सगाई पर। संभ्रांत घर का लड़का जो मिला था। उपर से शरीफ इतना की गाय भी शरमा जाये। लगा की दाल मे कुछ काला है। सबके सामने होशियारी दिखाने की बजाय चुप रहने मे ही भलाई समझी। शुभ मुहूर्त निकलने वाला है। माँ बाप को लग रहा है की चार धाम यात्रा पूरी होने वाली है। मुझे तुम पसंद नही हो। एक लड़की पहले से ही मेरे जीवन मे है। उसको मै छोडूँगा नही। अपने घर वालों को मना नही करूँगा नही तो मेरी छवि खराब हो जायेगी। समझा करो तुम। या तो तुम ये रिश्ता तोड दो या उस लड़की को साथ मे मानते हुए, दुनिया को दिखाने के लिये मेरे साथ रहने को तैयार हो जाओ। बता दिया गया है शर्मीले लडके के द्वारा लड़की को। फोन पर साफ शब्दों में। माँ बाप के सावन मे पतझड़ आ गया। लडके के माता पिता का जवाब आया की लडका मजाक कर रहा था। दुर्भाग्य देखिये की सब कुछ जानते हुए भी रिश्ता तोड नही सकते। गांव भर के सामने सगाई हुई है। इज्जत का सवाल है। बचपन से बेटी को दिये गये संस्कार, नैतिकता और अच्छी शिक्षा सब बेमाने हो गये हैं। विडम्बना ये की सब कुछ जानते हुए रिश्ता किया जाये या नही। अच्छा होता की वो भी अपनी बेटी को जिस्म की नुमाइश करवा कर मॉडर्न संसार के समुद्र मे गोते लगवा देते। ना साला शादी का खर्चा और ना ही रिश्ता जोडने तोडने की फिक्र। सवाल ये की अब माँ बाप की चार धाम यात्रा पूरी कैसे हो?

पढ़ना और लिखना


काफी पहले अखबार मे किसी महापुरुष का कहा गया एक वाक्य पढ़ा था। "पुस्तकें इंसान की सबसे अच्छी मित्र होती हैं।" बेशक होती हैं। इसमे मै एक चीज़ और जोड़ना चाहता हूँ। वो ये की पुस्तक के अलावा कलम भी आपकी काफी अच्छी मित्र हो सकती है। किन्तु कलम तभी अच्छी मित्र बन कर उभरेगी यदि आपको पुस्तकों का ज्ञान है और नई नई पुस्तकें पढने का शौक है। वाह। कितना गज़ब का सुखद संयोग है। अच्छी पुस्तकें पढ़ना और लिखना अपने आप मे बहोत ही आनंददायक है। आप अपने संपूर्ण जीवन मे कभी बोर नहीं हो सकते यदि आपको इन दोनो मे से किसी एक भी चीज़ का शौक है तो। जिंदगी यूँ ही चलती रहती है। हमें ऑफीस और दीन-दुनिया की चिंता भुला कर कुछ समय देना चाहिये। कलम उठाओ और लिखना शुरू कर दो। कुछ भी। इंसान हमेशा ध्यान मग्न रहता है। बाकी किसी फालतू चीज़ के बारे मे सोचने के बारे मे समय ही नही मिल पाता है। अच्छी पुस्तकें और कलम ही हमे हमसे मिलवाती हैं। मैने कुछ पुस्तकें पढ़ी हैं और जमा भी की है। जल्दी ही मै अपने घर मे अच्छी पुस्तकों का एक संग्रहालय बनाना चाहता हूँ। शुरुआत हो चूकि है। लिखने की भी और पढने की भी। साथ ही जिस अंजान लम्हे की वजह से मुझे ये सब करने की इच्छा जाग्रत् हुई है उस अंजान लम्हे को मेरा बहोत बहोत साधुवाद। 

सांस्कृतिक विरासत


मदारी। वही खेल दिखाने वाला। बंदर के गले मे रस्सी डाल कर नचाने वाला। अब आता ही नही है। सुना है सपेरों के साँप वाला खेल दिखाने को भी बंद करवा दिया गया है। भालू वाला तो बहोत पहले ही बैन कर दिया गया था, पशु क़ुर्रता के नाम पर। बच्चे बड़े हो रहे हैं। घर मे अगली पीढी चहलकदमी करने लगी है। क्या बताएंगे उनको। कैसे यकीन दिलवाएंगे की कोई आता था गाँव मे खेल दिखाने। कोई फोटो भी तो नही है उस समय की। गुल्ली-डंडा, कंचा ओर पिट्ठू जैसे बहोत से खेल गाँव का कोई बच्चा खेलता नहीं है। जन्माष्टमी और तीज पर लगने वाले मेले भी बंद हो गये हैं। चप्पल के पहिये काट कर कोई गाड़ी भी नहीं बनाता है। चकरी ओर कागज का डमरू जैसे देशी खिलोने कहीं मिलते नहीं। किसी ने बताया के पतंग भी अब प्रोफेशनल हो गया है। मोदी और सलमान ही उड़ाते हैं। गुजरात में। पतंग उत्सव के नाम पर। मनोरंजन के लिये बस टीवी देखना और क्रिकेट खेलना ही रह गया है। माहौल पश्‍चिमी और खिलोने चाइनीज हो गये हैं। अगली पीढी को सांस्कृतिक विरासत कैसे मिले?

Friday, 26 September 2014

दशहरे का मेला ओर विलुप्त भारतीय परम्पराएं


कभी गौर किया है की आजकल लोग इतनी तस्वीर क्यूं लेते हैं? बहोत से लोग विडिओ बनाते हैं। आप किसी का भी लॅपटॉप या मोबाइल उठा कर देख लो, ढेर सारी तस्वीरें मिल जाएंगी। उदाहरण के तौर पर दशहरे का मेला। जहाँ रावण दहन होता है। अब चूँकि मेलों के नाम पर एक यही बड़ा उत्सव बचा है। तो हम बात कर रहे थे रावण दहन की। वहां भी आपको बहोत से लोग फोटो या विडिओ लेते हुए मिल जायेंगे। लोग असली मकसद भूल जाते हैं की हम यहाँ अपना उत्सव मनाने आये हैं। कुछ सीखने, कुछ देखने, कुछ सबक लेने आये हैं। बस मग्न हैं फोटो लेने मे। पोज़ बदल बदल कर। सब लगे हैं। क्यूं? क्यूंकि जाने अनजाने सबको ये भय है की ये चीज़ें विलुप्त होने वाली हैं। जल्दी ही। निकट भविष्य मे। समय नहीं है उनको जिंदा रखने का। कद्र नही है। इतिहास की जानकारी नहीं है। रुचि भी नहीं है इतिहास को जानने मे। सब बस फोटो खीचने तक ही सीमित है। भारतीय संस्कृति की, हमारे बचप्न से, हमारे गाँव - स्कूल से जुड़ी हुई कितनी ही ऐसे चीज़े, संस्कार ओर परम्पराएं हैं जो अब यादें बन कर रह गयी हैं। उनको बचाने के लिये हम सब बस फोटो खींच रहे हैं। मैं भी सोच रहा हूँ इस बार के मेले मे अपना आइफोन ले कर जाँऊ ओर खूब सारी फोटो निकालूं। पोज़ बदल बदल कर। 

देश की साफ सफाई


15 अगस्त के दिन मोदी जी का भाषण सुना। आप लोगों ने भी सुना होगा। मोदी जी बोले की देश को साफ करना है। साफ सफाई इतनी होनी चाहिये की दुनिया देखे। 2019 तक देश को एकदम साफ सुथरा बनाना है। कई कॉर्पोरेट्स से भी बोला की भाई आप लोग भी मदद करो। लोगों से हाथ उठवा कर पूछा की आप लोग इस अभियान मे मेरा साथ देंगे की नहीं? सब ने बड़े जोश से बोला हाँ जी। देंगे साथ। साथ ना देने का तो सवाल ही नहीं। क्यूं ना देंगे भला। तो साहब सब लोग मान गये। खैर, प्रोग्राम खत्म हुआ। अपने पीछे गंदगी के ढेर छोड़ गये थे लोग। जूस ओर ड्रिंक्स के खाली पॅकेट्स, पानी की बोत्तलें, चिप्स के पॅकेट्स, अखबर और भी काफी कचरा। क्या किया जाये इन लोगों का? पिछले 10 साल से हॉस्टल मे रह रहा हूँ। पहले पढ़ते तब भी और अब जॉब करते हैं तब भी हॉस्टल ही मिला हुआ है। जहां काम करते हैं वो जगह दुबई मे है। किन्तु लोग सब अपने भारतीय ही हैं। टॉप मॅनेज्मेंट को छोड़ कर। दूसरी बात ये की काम करने वालों की औसत उम्र 34 साल है। कुछ के तो बच्चे ही मेरे जितने हो गये हैं। सब एंप्लायीस को प्रतिदिन हाइजिन एंड क्लीनिंग की ट्रैनिंग दी जाती है सो अलग। लेकिन जनाब इन सब बातों का असर हो कैसे। भारतीय जो ठहरे हम। जब तक अपने देश की जी भर के बेइज्जती ना करवा दे खुदा कसम चैन नहीं मिलता। बाकी सब तो छोड़ दीजिये, सुबह टूथब्रश या शेव करने के बाद जो वॉशबेसिन को गंदा करते हैं वो तक साफ नहीं करते। कहते हैं की अगर हम साफ कर देंगे तो जिसकी सफाई की ड्यूटी है वो क्या करेगा। टाय्लेट का फ्लश तक ऑन करने की जहमत नहीं उठाते हैं। आप बात करते हो। मोदी जी की हिम्मत कैसे हुई साफ सफाई की बात करने की हमसे। अगर करना है तो खुद से करो। हमे तो बस साफ चाहिये सब। सफाई सरकार का काम है बस। इतनी उम्र हो गयी है। अब तक साफ नहीं किया तो अब कैसे कर सकते। अगर हम रेलवे स्टेशन को साफ रखेंगे तो फिर सफाई वाला क्या करेगा भला। या तो उसकी नौकरी चली जायेगी या वो बिल्कुल निकम्मा हो जायेगा। ना जी साहब ना। एशा काम हमसे तो बिल्कुल ना होगा। हमने तो अपने बच्चो को भी यही सिखाया है। जो जिसका काम है वो उसको ही करना चाहिये। मोदी जी होते कोन हैं हमारे बच्चों को बोलने वाले की मदद करो सफाई में? और हाँ एक बात और, मोदी जी ने बोला है की 2019 तक भारत को क्लीन करना है। अगर नहीं कर पाये तो इन से बड़ा फेकू कोई नहीं और बता देना की अगर सफाई नहीं हुई तो अगली बार वोट मांगने ना आ जाएं। पता नहीं कोन मती मारी गयी थी जो उँ मोदीवा की बातों मे आकर हाँ बोल दिये ऐसे काम को।

Saturday, 13 September 2014

झूठी शान और बेलगाम खर्चे


झूठी शान की वजह से शादियों पर होने वाले बेलगाम खर्चे की सामाजिक बुराई हमेशा से ही मुझे सोचने पर मजबूर कर देती थी। फैसला किया की ज्यादा कुछ नहीं तो इसी बुराई के खिलाफ लोगों को जागरूक करेंगे। कुछ तो योग्दान हमे भी देना ही था भारत निर्माण मे। समय बीता। अपना संकल्प और गहरा होता गया। निर्णय हुआ की शुरुआत स्वयम् से करेंगे। समय का चक्र घुमा ओर शादी का दिन निर्धारित हुआ। सबको समझा दिया गया की कोई फालतू का दिखावा नहीं होगा। कन्या पक्ष को बता दिया गया की एक रुपया नहीं लेना है। कोई दूसरा फालतू का दिखावा भी ना होने पाये। कुछ 15 लोग पहुचे बारात मे। अत्यंत साधारण तरीके से शुभ विवाह संपन्न हुआ। लोगों का बहोत स्नेहाशीस मिला। तारीफ हुई हमारी अक्ल के लिये। कुल जमा 25 हज़ार मे सब अच्छे से निपट गया। तब के बचाये गये पैसे से अब चैन की सांस लेते हैं। कोई किसी का कर्जा नहीं, कोई दबाव नहीं। एक मित्र है अपना। राजस्थान का। पिछले 6 सालों से विदेश मे नौकरी कर रहा है। कोई 40-45 हज़ार कमाता है। मित्र की भी शादी का दिन आया। लगा की अपना परम मित्र है ओर समझदार भी है तो हम लगे अपना प्रवचन पेलने। इस उम्मीद मे की यहीं से समाज को सुधारने का कार्य आरम्भ किया जाये अब। लगभग 2 महीने तक मित्र को समझाया गया। सारे नफे नुकसान बताये गये। जवाब मिलता रहा की इस लड़ाई को मिल कर लडेंगे। बड़ी खुशी हुई सुन कर। एक दिन अचानक पता लगा की शादी से पहले ही अपने मित्र के परिजन 19 लाख के गहने ले आये हैं। होने वाली बहू की रस्म के लिये। सुन कर पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी। मित्र से बात की गयी। जवाब मिला की भाई घर वालों को भी तो खुशी का मौका देना चाहिये। शादी कोन सी रोज रोज होतीहै। और फिर रिश्तेदारों को क्या जवाब देता। कुछ दिनों मे शादी भी संपन हुई। पता लगा की 2 भाइयों की शादी मे कुल जमा 35 लाख से उपर का खर्चा कर दिया गया है। 6 साल विदेश मे नौकरी करने के बाद भी 12 लाख का कर्जा हो गया है। मित्र अपनी नई नवेली दुल्हन को छोड़ कर फिर से विदेश चला गया है। अब जो कमाई कर रहा है उसमे से आधे से ज्यादा तो सिर्फ ब्याज मे ही चला जाता है। मित्र और उसकी संगिनी इस उम्मीद मे हैं की कब ये कर्जा चुकता हो और कब साथ रहने का सुख मिले। जिस सामाजिक बुराई को बचपन से दूर करने का सपना देखता रहा वो पहले ही प्रयास मे चकनाचूर हो गया। पशोपेश यह है की इस प्रयास को जारी रखा जाये या समाज को छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार पर ही ध्यान केंद्रित किया जाये?        

Friday, 12 September 2014

बटेर और बिल्ली की राजनीति

बटेर बिल्ली से खुद को बचाने के लिये अपनी आँखे बंद कर लेता है। वो ये सोचता है की अगर मैं बिल्ली को नहीं देख पा रहा हूँ तो संभवतया बिल्ली भी मुझे नहीं देख पा रही है। जान बूझ कर आँखे बंद की जा रही हैं लव जिहाद के मुद्दे पर। पर बिल्ली (जनता) मूर्ख नहीं है। सब देख रही है। कब झपट पड़े कोई नहीं जानता। गरबा पर भी बहस!!? ये भी तोड़ने वाली राजनीति!!? अजीब किस्म के मूर्ख लोग हैं यार। मुझे बताओ दूसरे धर्म का ऐसा कोन सा आदमी है जो गरबा मे जाकर नाचना चाहता है? शरीफ नीयत से। है कोई ऐसा? जो आदमी उस धर्म को मानता नहीं। जो आदमी पूजा मे विश्वास नहीं रखता वो सिर्फ मज़े लेने के लिये गरबा मे जायेगा!! ये तो हद हो गयी। उषा ठाकुर ने क्या गलत कहा ये चीज़ अभी तक समझ मे आ नहीं रही है। ये क्या कोई डांस प्रतियोगिता है जो वहां जाकर अपना जलवा दिखाना है? जो लोग आंखे बंद कर के छुपने का नाटक कर रहे है वो ये अच्छी तरह समझ लें की बिल्ली सब जानती है। एक बार जो झपट पड़ी तो बटेर गया काम से।गलत को गलत कहने मे हर्ज क्या है ये समझ से परे है। अरे बेवकूफों गलत को सही कहना ही सेकुलरिज्म है तो बटेर को भगवान ही बचाये फिर बिल्ली से। 

Thursday, 11 September 2014

चंद शब्द

अगर आप गौर करेंगे तो पायेंगे की आजकल आपके चारों और कुछ चंद शब्द ही घूम रहे हैं। मसलन - हिन्दू, मुसलमान, धर्म, दंगा, बलात्कार, लव जिहाद, धर्म परिवर्तन, साँई-शंकराचार्य। कभी कभी तो इतना मानसिक उत्पीड़न महसूस होता है की समझ नहीं आता की जो ये सब बोल रहा है उसके साथ कैसा सलूक किया जाये। चाहे - अनचाहे जब किसी से बात करते हैं तो ये ही शब्द घूम फिर कर जुबान पर आ जाते हैं और फिर चर्चा का विषय बन जाते हैं। कुछ लोग तो इतने ज्ञानी होते हैं की एक बार चर्चा शुरू करते हैं और फिर अपनी ज्ञानवर्धक गोलियों का चूर्ण बना कर किश्तों मे हमे खिलाते हैं। यदि उनको बीच मे ही टोक दिया तो चूर्ण की पुडिया बड़ी हो जाती है। गांव गली मे कहीं चले जाओ ये ही शब्द हवा मे तैरते हुए दिखाई देते हैं। मीडिया मे भी सारे दिन बस इन्ही शब्दों का मंत्र जाप चलता रहता है। किसानों की माली आर्थिक हालत, शिक्षा का गिरता स्तर, खेलों का पिछड़ापन, हथियार टेक्नालजी, अंतरिक्ष रिसर्च, फौजियों की सुविधाएँ, देश की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और भी ना जाने कितने मुद्‌दे हैं जो किसी शापित की भांती अनछुए पड़े हुए हैं। ना कोई चर्चा ना कोई बहस।  

Wednesday, 10 September 2014

मंदबुद्धि के राजनेता

एक नये ब्रांड एम्बेसडर आये हैं मार्केट मे। बोले की दारू पी कर सो जाओ। बुराई नहीं है। रिश्वत दिया करो, मैने भी दी है। चूहा खाओ, मै भी खाता हूँ। सही तो कह रहे हैं। अब अगर पब्लिक नहीं समझ रही है तो साहब की क्या गलती है इसमे? अगर बेचारा दलित है तो इसका मतलब ये नहीं है की आप सब लोग उसको ऐसे गरियाओगे। मोदी क्या जाने क्या होती है गरीबी। ऐसे ही फेंकते रहते हैं की मैने चाय बेची है।ये बताओ साहब आपने चूहा खाया है कभी? नहीं न खाये हो। तब काहे इतना उछाल कूद मचा रखे हो गरीबी के नाम पर। चुप से बैठो और खबरदार अब अगर कभी गरीबी का नाम लिया तो। गरीबी का सर्टिफिकेट आपसे छीन कर देश के उभरते हुए दलित मुख्यमंत्री श्री श्री मांझी साहब को दिया जाता है।

Tuesday, 9 September 2014

रिश्ते कैसे बने बोझ

मुझे याद है जब छोटे थे और अपने या किसी पड़ोसी के घर मे कोई शादी होती थी, तो कैसे वहां गाँव के लोग, पड़ोसी और रिश्तेदारों का काफी दिन पहले ही जमघट लगना शुरू हो जाता था। सब के अंदर काम करवाने की होड़ लगी रहती थी। कोई पड़ोस से बिस्तर मांग कर ला रहा है तो कोई बेलन या चाकू। हलवाई के लिये। ये सब कब बंद हो गया पता ही नही चला। पूरा काम रेडीमेड होता है। ठेकेदार को शादी का ठेका दे दो सब काम खुद से हो जायेगा। काम तो काफी सरल हो ग्या है परन्तु रिश्ते कहीं खो गये हैं। शादी मे कोई आता भी है तो घर से बस एक ही सदस्य आता है और वो भी बस हाज़िरी लगाने। अभी पड़ोस की एक बहन की शादी थी। किसी ने आंटी को बोला की बुआ को बुला लो। आंटी ने झिढ़क दिया, कहने लगी अभी तो 2 दिन पड़े है। अभी से क्या करेगी यहाँ आकर? पूरे दिन बस सोचता रहा की रिश्तों की आत्ंयिता कहाँ खो गयी है? क्यों आज सारे रिश्ते बस एक बोझ बन कर रह गये हैं?

फ़ेसबूक बना सार्वजनिक शौचाल्य

वैसे फ़ेसबूक भी क्या चीज़ है। अजी चीज़ तो क्या यूं कहिये कि सार्वजनिक शौचाल्य बन गया है। जिसको जब मन करता है अपना मल त्याग कर चला जाता है। कोई पाबंदी नहीं है। जिन लोगों को हनुमान चालीसा याद नही वो धर्म का उपदेश देते हैं। जो रात के अंधेरे मे अकेले शु शु करने जाने से डरते है वो मारने काटने कि बात करते हैं। जिनकी अपने खुद के पडोसियों से बोलचाल बंद है वो सरकार को पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध मे कूटनीति कि शिक्षा देते है। अब मुझे ही देख लो, स्कूल मे कभी कोई पत्र ठीक से लिख नहीं पाया और फेसबूक पर पत्रकार बनने कि सोच रहा हूँ। खैर, जब शौचाल्य सामने हो तो अपना मल रोकने की ब्जाय त्यागने मे ही भलाई है। 

Monday, 8 September 2014

मदारी का खेल

मदारी खेल दिखा रहा है। बंदर को नचा रहा है। चारों तरफ भीड़ खड़ी है। लोग ताली बजा रहे हैं। भरे बाजार लड़की तीन बंदरों को नचा रही है। अपनी और अपने पिता की इज्जत बचाने के लिये। मेरठ मे। तमाशबीन अपना मनोरंजन कर रहे हैं। खेल के बीच मे लोग सिक्के उछाल रहे हैं। मदारी की टोकरी की तरफ। यहाँ भी लोग अपने अपने स्मार्टफोन का जलवा दिखाने मे वयस्त हैं। कैमेरों का फलॅश पड रहा है। बेहतरीन पिक्चर के लिये। मदारी एक साथ तीन बंदरों को जाने फिर दोबारा कब नचाएगा, इसलिये वीडियो भी बन रही है। आधे घंटे की कडी मेहनत के बाद खेल खत्म हुआ। कुछ लोग निराश। इतनी जल्दी खत्म!! अभी तो ठीक से मनोरंजन भी नहीं हुआ। कंजूस लोगों ने ताली बजाई। मदारी का हौंसला बढाने के लिये। पर जेब से फूटी कौडी नहीं निकली। कुछ ने यहाँ भी हुआँ हुआँ की खेल खत्म होने के बाद। दोनो ने अपने पसीने पोंछे और अपने अपने घर को हो लिये। चलते फिरते मुर्दों से और उम्मीद भी क्या करें। आधुनिकता ने मर्दानगी को कब खत्म कर दिया पता ही नही चला।!!??