अगर आप गौर करेंगे तो पायेंगे की आजकल आपके चारों और
कुछ चंद शब्द ही घूम रहे हैं। मसलन - हिन्दू, मुसलमान, धर्म, दंगा, बलात्कार, लव जिहाद,
धर्म परिवर्तन, साँई-शंकराचार्य। कभी कभी तो इतना मानसिक उत्पीड़न महसूस होता है की
समझ नहीं आता की जो ये सब बोल रहा है उसके साथ कैसा सलूक किया जाये। चाहे - अनचाहे
जब किसी से बात करते हैं तो ये ही शब्द घूम फिर कर जुबान पर आ जाते हैं और फिर चर्चा
का विषय बन जाते हैं। कुछ लोग तो इतने ज्ञानी होते हैं की एक बार चर्चा शुरू करते हैं
और फिर अपनी ज्ञानवर्धक गोलियों का चूर्ण बना कर किश्तों मे हमे खिलाते हैं। यदि उनको
बीच मे ही टोक दिया तो चूर्ण की पुडिया बड़ी हो जाती है। गांव गली मे कहीं चले जाओ
ये ही शब्द हवा मे तैरते हुए दिखाई देते हैं। मीडिया मे भी सारे दिन बस इन्ही शब्दों
का मंत्र जाप चलता रहता है। किसानों की माली आर्थिक हालत, शिक्षा का गिरता स्तर, खेलों
का पिछड़ापन, हथियार टेक्नालजी, अंतरिक्ष रिसर्च, फौजियों की सुविधाएँ, देश की अर्थव्यवस्था,
पर्यावरण और भी ना जाने कितने मुद्दे हैं जो किसी शापित की भांती अनछुए पड़े हुए हैं।
ना कोई चर्चा ना कोई बहस।