शादियों का सीजन आ गया है. अब फिर से निमन्त्रण पत्र आयेंगे. लोग शादियों के कार्ड्स पर धातु / प्लास्टिक के बने हुए गणेश जी की मूर्तियाँ लगा देते हैं. अपनी श्रधा दिखाने के लिये. कही मंगल मूर्ति नाराज ना हो जाये. बोलने ना लगे की भाई तूने मेरी मूर्ति अलग से तो चिपकाई ही नहीं. बप्पा सब शुभ करें इसलिये अलग से मूर्ति लगाओ कार्ड पर. एक शादी के सीज़न मे 50 से ज्यादा कार्ड्स आते हैं. समझ नहीं आता क्या करें इन मूर्तियों का. अलग से उतार कर रखें, कार्ड के साथ रद्दी वाले को दे, फेंक दे या कुछ और. भैया हमने तो लगा दी है. अब सामने वाला भुगते. दिवाली का त्योहार भी अभी गया है. देख रहा हूँ कहीं भी पीपल का पेड़ है उसके चारों तरफ घरों से निकाली हुई भगवान की पुरानी मूर्तियों का ढेर लगा है. लोग दिवाली पर नयी मूर्ति ले आये हैं. पुराने वाले भगवान की अब जरूरत नहीं रही. नये चमकते हुए भगवान आयेंगे तो मन लगा कर आशीर्वाद देंगे. पर पुरानी मूर्तियों का क्या करें. अगर फेक दी तो पुराने वाले भगवान नाराज हो जायेंगे. तो अपना पीछा छुडवाओ पेड़ के नीचे रख दो. अब सामने वाला भुगते. पिछले हफ़्ते दिल्ली के विभिन्न हिस्सों मे घूमने का मौका मिला. एक कॉमन चीज़ जो लगभग हर जगह देखने को मिली वो थी देवी देवताओं की छपाई वाली टाइल्स. पूरी दिल्ली मे बहोत सी एसी बिल्डिंग हैं जिनकी बाहरी चारदीवारी पर देवी देवताओं की छपाई वाली टाइल्स चिपका रखी हैं. पता लगा की भैया दीवारों के कान होते हैं और लोग उन कानो को दिल खोल कर गिला करते हैं. तो भगवान की मूर्तियाँ चिपका दी गयी हैं. कुछ तो शर्म करेंगे लोग. दीवारों पे चढ़ के हगना-मूतना, थूकना कुछ तो कम करेंगे. हमने पुछा की भैया अगर लोग अब भी ना माने तो? जवाब आया वो सामने वाला भुगते. धर्म के ठेकेदारों मेरी कोमल भावना बहोत जोर से आहत हो रही है. कोई तो बताओ देवी-देवताओं का ये दुरुपयोग कैसे रुकेगा? सामने वाला कैसे भुगते?
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