राजनैतिक रूप से साल 2014 जहाँ धुआंधार प्रचार, तालियों वाले भाषण और जबरदस्त जीत के बाद मोदी जी के नाम रहा. वहीं 2015 को गिड़गिड़ाने वाले भाषणों, आरोप-प्रत्यारोप और एक और बंपर जीत के बाद केजरीवाल अपने नाम करने में कामयाब रहे. इसमें कोई दो राय नहीं की अपनी जबरदस्त भागदौड़ और यहाँ वहां की उछलकूद के दम पर केजरीवाल अपनी राजनैतिक छवि मजबूत करने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं. पार्टी में उठते विरोध के स्वरों को एक के बाद एक जिस कद्र कुचल कर केजरी अपनी तानाशाही के दम पर पार्टी में शीर्ष पर बने हुए हैं वो उनकी राजनैतिक परिपक्वता को दर्शाता है. एक और जहाँ स्पष्ट बहुमत के बाद भी मोदी अब तक न केवल कोई महत्वपूर्ण बिल पास करने में नाकामयाब हुए बल्कि संसद तक भी ठीक से नहीं चलवा पा रहे हैं वहीं दूसरी और विपक्ष के मात्र तीन सदस्य होते हुए भी केजरी बड़ी ही बखूबी से कभी मार्शल्स का उपयोग तो कभी हफ्ते हफ्ते का निलंबन करवाते आ रहे हैं. साथ ही साथ जिस तरह से अलका लम्बा को आगे कर भाजपा सदस्यों पर पहले विधानसभा और बाद में सड़क पर उतर कर हमला बोला गया उसने भाजपा को दिल्ली में बैकफुट पर धकेलने का काम किया. केजरीवाल ना सिर्फ दिल्ली में बल्कि अन्य कुछ राज्यों में भी भाजपा के जनाधार को बुरी तरह क्षत विक्षत करने में जी जान से जुटे हैं. भाजपा के भीतर घातियों को जहाँ सत्ता की मलाई हज़म नहीं हो रही वहीं आम आदमी पार्टी ने इतने दिनों में पूरी तरह से अरविन्द को समर्पित वालंटियर्स की फ़ौज कड़ी कर दी है. मुख्यमंत्री के द्वारा लगाये गए बिना सर पैर के झूठे आरोपों को कब तक मिडिया में बनाये रखना है और कब सड़क पर उतर कर धरना प्रदर्शन करना है ये लोग इसे अच्छी तरह से समझते हैं. अपने चहेते अफसरों और समर्पित नजदीकियों का ख्याल कैसे रखा जाता है ये भी अरविन्द बता चुके हैं, फिर चाहे वो हाल ही की सीबीआई रेड में राजेन्द्र को बचाना हो या स्वाति मलीवाल को अध्यक्ष बनाना हो. वहीं दूसरी और मोदी गजेन्द्र चौहान के मुद्दे पर अभी तक संघर्ष कर रहे हैं. बहरहाल गोएबल्स थ्योरी के दम पर तेजी से आगे बढ़ते हुए अरविन्द केजरीवाल ने विरोधियों के माथे पर चिंता की लकीरें उकेर कर ये जता दिया है की 2019 तक वो सिर्फ दिल्ली के नेता के तौर पर ही नहीं जाने जाना चाहते हैं.
पहले जब जिंदगी में थोड़ी फुर्सत होती थी तब कभी कभार किसी मुद्दे पर अपने विचार डायरी में लिखता था. फिर फेसबुक आया और हम फेसबुक को एक रफ़ नोट बुक की तरह यूज़ करने लगे. अपना लिखा हुआ सुरक्षित रखने के लिए अब फेसबुक के साथ साथ यहाँ अपने ब्लॉग पेज पर भी लिख लेते हैं. इसका एक फायदा ये भी है की समय के साथ आपके लिखने में क्या सुधार हो रहा है वो आप बड़ी आसानी से समझ सकते हैं. इच्छा ये है की किसी दिन ज्यादा से ज्यादा बड़ा लिखने लायक सिख सकूँ और फिर गर्व से सबको दिखा सकूँ.
Saturday, 19 December 2015
न्याय वयवस्था से उठता भरोसा
चाहे दोषी छूट जाये पर एक भी निर्दोष को सजा न होने पाये" बाबा साहेब ने जिस विचारधारा को सामने रख कर भारतीय संविधान के अंतर्गत कानून बनाये थे वो विचारधारा आज के समय में तर्कसंगत नहीं रह गयी है. रेंगती भारतीय न्याय वयवस्था में इतने खिड़की दरवाजे हैं की अपराधी अगर रसूख वाला हो तो अँधेरी कोठरी में कभी रह ही नहीं सकता....... सलमान खान इसका ताजातरीन उदाहरण हैं. एक पल को मान भी लिया जाये की न्याय पालिका भ्रष्ट नहीं है बावजूद उसके क्यों आज समाज का हर अमीर अपराधी यहाँ वहां आज़ाद कुलांचे भरता फिरता है......भुग्तभोगियों की डबडबायी नरम आँखे न्याय की आश में पत्थर की हो जाती हैं पर अपराधी का सफेदपोश कैनवास कभी मैला नहीं होता. चाहे वो 1998 का हिरण शिकार मामला हो या 1970 का बंगाल का सैनबाड़ी केस.... लोग सिस्टम की मोटी दीवारों और न्याय की अंधी देवी के आगे चीख चीख कर बेदम हो गए पर हमारी महान न्याय व्यव्यस्था अभी तक समय पर सही गलत बताने का दम नहीं दिखा सकी है ...तो क्या यह मान लिया जाये की भारतीय न्याय वयवस्था आज उस मच्छरदानी की तरह हो चली है जो होती तो मच्छर रोकने के लिए है पर इतनी जगह से उधड़ी पड़ी है की मच्छरदानी के नाम पर एक चिथड़ा भर बन कर रह गयी है. 70 हज़ार करोड़ का घोटाला कर के सिर्फ 7 महीने जेल में काटने के बाद आज़ाद परिंदों के मानिंद घूमते ना जाने कितने ही कलमाड़ी इसकी एक बानगी भर हैं. इस सबके पीछे फांसी की सजा पाये आतंकवादियों के लिए मानवाधिकार के नाम पर छाती पिट पिट कर मुर्रहम मनाता हमारा मीडिया और वोट बैंक बन कर घूमते हमारे जैसे नागरिक भी बराबर के भागीदार हैं. यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा की बड़े बड़े नेता, जज, वकील, पत्रकार और एक्टिविस्ट इत्यादि खुल्लेआम एक आतंकवादी की पैरवी करते हुए दया याचिका अभियान चलाते हैं और हम चीटियों तर्ज पर इन रंगे सियारों का अनुसरण करते हुए उनके पीछे पीछे आँख बंद कर के चलते हैं. तराजू वाली देवी पैरोल के नाम पर कब किसकी कोठरी का दरवाजा खोल दे कौन जानता है. हमारी न्यायिक प्रणाली शक्तिशाली लोगों के घरों की चौखटों को किस कद्र चूमती है इसका अहसास तब और गहरा हो जाता है जब 19 साल चले आय से अधिक सम्पति के मामले का फैसला सिर्फ 10 सेकंड में सुना दिया जाता है. जर्रा जर्रा हो चुका सिस्टम सेकंड हैण्ड स्कूटर पर चलने वाले उस पत्रकार की महफ़िल में नागिन डांस करता है जो आज हज़ारों करोड़ के ग्रुप के साथ भारत के बड़े बिज़नेस टायकून हैं. इनके पाक साफ दामन की चुंधिया देने वाली चमक के आगे बदलती सरकारें और माननीय न्यायपालिका कभी उस कालिख को नहीं देख सके जिसका ढेर लगा कर ये यहाँ तक पहुंचे हैं. इन्साफ मांगने के नाम पर आज तक ना जाने कितनी ही निर्भया और कितने ही सेन बंधु उस तुनकमिजाज व्यवस्था के बुलेट प्रूफ शीशों से टकरा कर खुद चूर चूर हो चुके हैं. सर्वोच्चता और सम्मान के नाम पर कानून की खाइयां आम आदमी के लिए और गहरी होती जा रही हैं. जयललिता, सलमान, मोहम्मद अफ़रोज़ के बाद सोनिया राहुल भी निर्दोष साबित हो कर बाहर आते ही होंगे. बहरहाल, न्यायपालिका के सम्मान और सर्वोच्चता के नाम पर आम जनता के हिस्से सिर्फ अंधेरगर्दी को ढ़ोना ही लिखा है......
आमिर खान और असहिष्णुता
बेजोड़ बात यह है की आमिर खान ने देश छोड़ने की बात इसलिए कही की उसे यहाँ अब सुरक्षित महसूस नहीं होता. मतलब यह देश उसकी और उसके बच्चों की सुरक्षा के हिसाब से सही नहीं है. इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि इस पुरे भाषण के दौरान आमिर ने एक बार भी मोदी - भाजपा का नाम नहीं लिया. अगर ऐसा है तो आमिर के साथ खड़े लोग किस बिनाह पर उसका समर्थन कर रहे हैं. बहरहाल, बड़ा सवाल यह हो चला है कि क्यों न देश छोड़ने की बात करने या उसका समर्थन करने वाले को देश विरोधी मान लिया जाये या फिर क्या यह मान लिया जाये कि इंडिया इज़ मोदी, मोदी इज़ इंडिया? विरोध का जूनून कुछ इस कद्र हावी हुआ की मोदी विरोध कब देश विरोध में बदल गया पता ही नहीं चला. असहिष्णुता के नाम पर एक मुल्क की ऐतिहासिक वर्ज़िशों के टपके पसीने के मानिंद हम उस यकीन से गुजार दिए गए जैसे हम सबका गया गुजरा होना ही नियति है. बात दरअसल यह है कि मोदी और देश के बीच की रेखा को रबड़ से मिटा कर बड़ी ही सफाई के साथ देश विरोध को मोदी - भाजपा के साथ जोड़ दिया गया है. विरोधियों और लुटियन के बंगलों कि इंचार्जी हासिल करने कि ख़्वाहिश रखने वालों की भीड़ में इस फर्क को कोई देख नहीं पा रहा है या देखना नहीं चाह रहा है. समर्थक लोकतंत्र के नाम पर कब वोटतंत्र में बदल गए ये जानना भी अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं.
Breaking India Forces are now no more unreal gossips..।
कोई दुकानदार प्रतिस्पर्धी दुकानदार का धंधा खराब करने के लिये नगर निगम के पाइप लाइन वालों को पैसे खिलाता है कि प्रतिस्पर्धी की दुकान के सामने नाले का पाइप तोड़ दो या फूटपाथ खोद के रखो ताकि ......। युधों के तरीके बदल गये हैं.... पहले के जमाने मे राजाओं की सेनायें आमने सामने लडाईयां लड़ती थी....सेनाओं की वो लड़ाइयां बंदूक - तोप से होती हुई राकेट - मिसाईल और फिर cobart तक आ पंहुची। दूसरे देश को तोड़ने के लिए अभी जो लेटेस्ट फैशन है उसके हिसाब से उस देश के लोगों को भारी फंडिंग करो.... NGOs खुलवाओ....आये दिन धरने प्रदर्शन....तोड़ फोड़....सरकर विरोधी नारे..... सरकार को काम नहीं करने दो....लोगों को एक चुनी हुई सरकार और देश के संविधान के प्रति भड़काओ। सिर्फ दो दिन की छापेमारी में पचास हज़ार मीट्रिक टन से दालें बरामद की गई हैं....इतना स्टॉक कोई साधारण व्यापारी जमा नहीं कर सकते.... तो ये कोन लोग हैं जो इतने बड़े पैमाने पर जमाखोरी में लिप्त हैं.... महँग़ाई बढ़ने से किसको फायदा होगा। कुछ सिख उपद्रवी ही गुरु ग्रन्थ साहिब के पन्ने क्यों फाड़ने लगे हैं.... और फिर तुरंत केजरीवाल को शांत पड़े पंजाब के कोट कपूरा में अचानक से जाने की जरुरत क्यों आन पड़ी? धार्मिक झड़पें....दलित महादलित... बीफ...वीके सिंह ....मैं हिन्दू तू मुसलमान ....मीडिया अपने एजेंडे में कामयाब हो रहा है..... छोटी सी किश्ती को टाइटैनिक बना कर दिखाया जा रहा है. पर क्यूँ? प्रत्यक्ष तौर पर इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है पर अप्रत्यक्ष हम और आप खूब देख और समझ रहे हैं. कड़ियाँ जुड़ती और राजनीती की गुथ्थी उलझती जा रही है. लड़ाई उस लेवल पर है जहाँ दुश्मन अनजान पर शातिर है. कुरुक्षेत्र के मैदान में डटी कौरवों की सेना धूर्तता की कोई भी सीमा लांघने के लिए तैयार खडी है. अपने आस पास निगाह रख कर बड़े पैमाने पर चल रहे षड्यंत्र को समझना जरुरी है...मजहब जात को दूर रख कर हमेशा सजग और चौकन्ना रहना भी देशभक्ति ही है।
Breaking India Forces are now no more unreal gossips..।
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