Saturday, 19 December 2015

मोदी और केजरीवाल - राजनैतिक कार्यशैली

राजनैतिक रूप से साल 2014 जहाँ धुआंधार प्रचार, तालियों वाले भाषण और जबरदस्त जीत के बाद मोदी जी के नाम रहा. वहीं 2015 को गिड़गिड़ाने वाले भाषणों, आरोप-प्रत्यारोप और एक और बंपर जीत के बाद केजरीवाल अपने नाम करने में कामयाब रहे. इसमें कोई दो राय नहीं की अपनी जबरदस्त भागदौड़ और यहाँ वहां की उछलकूद के दम पर केजरीवाल अपनी राजनैतिक छवि मजबूत करने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं. पार्टी में उठते विरोध के स्वरों को एक के बाद एक जिस कद्र कुचल कर केजरी अपनी तानाशाही के दम पर पार्टी में शीर्ष पर बने हुए हैं वो उनकी राजनैतिक परिपक्वता को दर्शाता है. एक और जहाँ स्पष्ट बहुमत के बाद भी मोदी अब तक न केवल कोई महत्वपूर्ण बिल पास करने में नाकामयाब हुए बल्कि संसद तक भी ठीक से नहीं चलवा पा रहे हैं वहीं दूसरी और विपक्ष के मात्र तीन सदस्य होते हुए भी केजरी बड़ी ही बखूबी से कभी मार्शल्स का उपयोग तो कभी हफ्ते हफ्ते का निलंबन करवाते आ रहे हैं. साथ ही साथ जिस तरह से अलका लम्बा को आगे कर भाजपा सदस्यों पर पहले विधानसभा और बाद में सड़क पर उतर कर हमला बोला गया उसने भाजपा को दिल्ली में बैकफुट पर धकेलने का काम किया. केजरीवाल ना सिर्फ दिल्ली में बल्कि अन्य कुछ राज्यों में भी भाजपा के जनाधार को बुरी तरह क्षत विक्षत करने में जी जान से जुटे हैं. भाजपा के भीतर घातियों को जहाँ सत्ता की मलाई हज़म नहीं हो रही वहीं आम आदमी पार्टी ने इतने दिनों में पूरी तरह से अरविन्द को समर्पित वालंटियर्स की फ़ौज कड़ी कर दी है. मुख्यमंत्री के द्वारा लगाये गए बिना सर पैर के झूठे आरोपों को कब तक मिडिया में बनाये रखना है और कब सड़क पर उतर कर धरना प्रदर्शन करना है ये लोग इसे अच्छी तरह से समझते हैं. अपने चहेते अफसरों और समर्पित नजदीकियों का ख्याल कैसे रखा जाता है ये भी अरविन्द बता चुके हैं, फिर चाहे वो हाल ही की सीबीआई रेड में राजेन्द्र को बचाना हो या स्वाति मलीवाल को अध्यक्ष बनाना हो. वहीं दूसरी और मोदी गजेन्द्र चौहान के मुद्दे पर अभी तक संघर्ष कर रहे हैं. बहरहाल गोएबल्स थ्योरी के दम पर तेजी से आगे बढ़ते हुए अरविन्द केजरीवाल ने विरोधियों के माथे पर चिंता की लकीरें उकेर कर ये जता दिया है की 2019 तक वो सिर्फ दिल्ली के नेता के तौर पर ही नहीं जाने जाना चाहते हैं.

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