Thursday, 29 January 2015

Stockholm Syndrome


एक होता है Stockholm Syndrome। इसके बारे मे प्रचलित कहावत कुछ यूँ हैं एक बार किसी गैंग ने एक गांव के लोगो को बन्दी बना लिया। उन्हे बन्दी बना कर खूब जुल्म डहाये गए। लोग बन्दी थे सो कुछ कर भी नहीं सकते थे। बेचारे जुल्म सहते गए। खैर समय बीता और सरकार को पता लगा। अपने सिपाही भेजे गांव वालों को छुडाने के लिये। पर हुआ क्या। गांव वाले डाकुओं से लडने की बजाय सिपाहियों से ही लड बैठे। डाकुओं की रक्षा के लिये। इसको कहते हैं Stockholm Syndrome. मतलब Feelings of trust by a victim towards a captor.
पता नहीं क्यूं मुझे कुछ अपोलियों की हालत देख कर उनका Stockholm Syndrome से ग्रसित होने का भय सता रहा है। रब्बा खैर करे....

Tuesday, 27 January 2015

मनोवैज्ञानिक और अपना अपना नज़रिया

एक बार एक विश्व प्रसिध मनोवैज्ञानिक को शराबियों के एक ग्रूप को व्याखान देने के लिये बुलाया गया। उद्देश्य था शराबियों को शराब के नुकसान बताना। और उन्हे समाज सुधार की तरफ मोड़ना। मनोवैज्ञानिक ने एक काँच का गिलास लिया ओर उसमे दारू डाली। फिर उसमे एक कीड़ा डाला। थोड़ी देर बाद कीड़ा तड़प तड़प कर मर गया। ये दिखाते हुए मनोवैज्ञानिक ने शराबियों की तरफ देखते हुए पूछा बताओ इस से तुम लोगों ने क्या सीखा? थोड़ा सोचते हुए एक शराबी बोला की इस से हमने ये सीखा की दारू पीने से पेट मे कीड़े नहीं होते। बताते हैं की बेचारा मनोवैज्ञानिक बेहोश होते होते बचा। ये तो था कोई किस्सा। पर इसका एक पहलू ये भी है की हर आदमी का अपना अपना नज़रिया होता है चीज़ों को देखने समझने का। ये किस्सा कल उस समय तब याद आ गया जब श्रीमान राहुल गाँधी जी ने अपना नजरिया पेश किया और मीडिया के पूछने पर मोदी-ओबामा पर दिल्ली में बोला ''काम करने की बजाय निजी संबंध बनाए जा रहे हैं''. दिल्ली वालों ये जो अश्वमेध यग चल रहा है इसमे अपनी आहुति जरूर दाल देना। नौटन्की तो सारी जिंदगी चलती ही रहेगी। बाकी तो सब नजरिये का ही खेल है। हम तो खामख़्वाह मनोवैज्ञानिक बने घूम रहे हैं।

Friday, 23 January 2015

मीडिया की निष्पक्ष रिपोर्टिंग

एक मीडिया वाले भाई ने दूसरे मीडिया वाले भाई की पोल खोलने के लिये आज शाम को प्रेस कांफ्रेंस बुलाई है। घूम फिर कर बात वही बेचारे मफलर चच्चा और दिल्ली election पर ही आनी है। पिछले दिल्ली चुनाव से इस बार वाले दिल्ली चुनाव के बीच मे कितनी ही जगह चुनाव हो चुके हैं पर कहीं कोई हल्ला नही. पता नही क्यूं जहां पर ये बंदा involve होता है वही पर फसाद होना शुरू हो जाता है। क्या रणनीति बनाता है ये आखिर? इसकी सोच क्या है? क्या ये अपने आपको बेचारा साबित कर के सहानुभूति लेना चाहता है? यहाँ मुझे एक सवाल और है। जो पत्रकार लोग होते हैं उनकी भी तो वोट होती होगी ना? वो भी तो किसी ना किसी पार्टी को वोट तो देते ही होंगे। तो स्वभाविक है उनका भी कहीं तो झुकाव होगा ही। फिर ये कैसे हो सकता है की कोई पत्रकार या कोई चैनल निष्पक्ष रिपोर्टिंग करता है? तो भैया हम तो जे कह रहे हते की जिसको मोदी पसंद है वो मोदी सपोर्टेड चैनल देख लो। जिसको कज्जु पसंद है वो कज्जु को सपोर्ट करने वाले चैनल देख लो। नही तो चैनल देख कर वोट देना बंद करो। काहे इतना झगड़ते हो भाई। अपनी अकल लगाओ, दिखावे पर ना जाओ।

Monday, 19 January 2015

देशहित मे भाजपा का हारना

देशहित मे इस बार भाजपा का हारना बहोत जरूरी है। वैसे तो दिल्ली के चुनाव मे हमे कोई खास दिलचस्पी नहीं है। दूसरा यूं की हमे केजरीवाल जैसा धूर्त और मक्कार नेता पसंद नहीं है। इसलिये चाहते थे की आम आदमी पार्टी चुनाव हार जाये। किन्तु अब मन बदल गया है। अब मन का क्या है। बदल गया तो बदल गया। वो हुआ यूं की हमे लगता है की दिल्ली BJP के नेताओं की औकात नहीं है चुनाव जितने की। औकात तो आम आदमी पार्टी के नेताओ की भी नहीं है। पर भाजपा के नेता सिर्फ मोदी नाम के सहारे अपनी नैया पार करना चाहते हैं। सारे दिन AC कमरों से बाहर निकलते नहीं और सपना देखते हैं CM बनने का। अगर किरण बेदी के चक्कर मे BJP चुनाव जीत गयी तो फिर ये ट्रेंड बन जायेगा की सारे साल काम मत करो और चुनाव के टाइम किसी सूपरस्टार को पकड़ कर आगे कर दो। इन नेताओं की बेहूदगी का आलम ये है की अभी भी सिर्फ मोदी और बेदी के कारण अपनी जीत पक्की मान कर बैठे हैं। जनता के बीच जाने का मन नहीं करता इनका। वैसे यूं देखें तो केजरीवाल को भी नौटन्की के अलावा कुछ करना नहीं है किन्तु इस बार भाजपा का जीत का भ्रम टूटना बहोत जरूरी है दोस्तों। नही बस यूं ही बोल दिये अब वोट तो दिल्ली वालों को ही देनी है।

Sunday, 11 January 2015

फ्रेंड लिस्ट का कचरा

लिखने का शौक बचपन से ही था। पहले अपनी डायरी लिखता था और सोचता था की एक दिन पत्रकार बनूँगा। पर शौक तो शौक होते हैं। सोचने से थोड़े ही पत्रकार बना जा सकता है। कभी उस लेवल का लिख ही नहीं पाया। फिर अब फेसबूक पर कुछ तथाकथित लिखने वाले लोगों से दोस्ती की। सोचा की वाह क्या गज़ब लिखते हैं। कुछ दिन इनको फॉलो करूंगा तो शायद लिखना सीख जाउ। अरे क्या लिखना सीखता भला। ना कोई नया शब्द ना कोई नयी कला। जिसे देखो बस यहाँ की कॉपी वहां पेस्ट वहां की कॉपी यहाँ पेस्ट। और पोस्ट भी क्या? सारे दिन धर्म के नाम पर चिंघाड मचाना या पानी पी पी कर बस मोदी और संघ को कोसना। मतलब हद होती है यार। जिन लोगों के लेखन से इतना इंप्रेस होकर उनको एड किया था वो भी बस ढपोरशंख ही निकले। मन उचट गया है। लग रहा है की लेखकों के नाम पर कचरा जमा कर लिया है मैने अपनी फ्रेंड लिस्ट मे। इस से अच्छा तो मै अपनी डायरी मे लिख कर ही खुश था। 

मेरी सोसियल लाइफ और बॉस

कल एक दोस्त का फोन आया। बोला भाई आपकी पोस्ट बहोत अच्छी थी। मैने पूछा यार आजकल आप तो फेसबूक पर कभी active दिखते ही नहीं। चक्कर क्या है? और पोस्ट इतनी अच्छी थी लाइक कर देते। बोला की मेरी फ्रेंड लिस्ट मे बहोत से प्रोफेशनल लोग हैं। मतलब की कुछ मेरे बॉस टाइप के। तो उन सबको नोटिफिकेशन जायेगा ना इसलिये मैने लाइक नहीं की। वो लोग सोचेंगे की मै कैसी कैसी activity करता हूँ फेसबूक पर, इमेज खराब हो जायेगी भाई!!! मेरे प्रिय दोस्त के लिये मेरे पास शब्दों की कमी पड गयी। जिन भाइयों को बॉस लोगों से इतनी दिक्कत है वे प्लीज़ किसी और नाम से id बना लें। और फेसबूक का मज़ा लें। यहाँ बहोत कुछ है करने को। मेरे जितने भी past, present और future वाले बॉस लोग मेरी फ्रेंड लिस्ट मे हैं वो सुन लें। मै कंपनी मे आपके मार्गदर्शन मे काम करता हूँ। किन्तु फेसबूक पर? बॉस - My Foot। ये मेरी सोसियल लाइफ है बॉस। इसके उपर आपका नाक भौं सिकोड़ना मुझे कतई गंवारा नहीं। और हाँ अगर इसकी वजह से मेरा salary increment नहीं दिया तो यहीं पर तसल्ली बक्श आपका performance review भी किया जायेगा।

रिश्तों की उलझन

कुछ रिश्ते एक अजीब सी उलझन बन कर क्यूँ रह जाते है? मुझे लगता है की लगभग सभी की जिंदगी मे एक आध रिश्ता तो ऐसा होता है जो गले की हड्डी बन जाता है। ना निगलते बनता है और ना उगलते। और एक कुछ यूं की एक सवाल है। एक ही आदमी को एक ही आदमी कितनी बार ठग सकता है और फिर वापस विश्वास मे ले सकता है? और यूं की कोई किसी को कितनी बार माफ कर सकता है। और एक यूं की किसी का किसी के उपर किस हद तक अधिकार हो सकता है। माने मै रिश्तों के भवर मे उलझा सा महसूस करता हु कभी कभी खुद को। कभी लगता है की सब ठीक है। कभी लगता है की सबको लात मार के चलो हिमालय पर। अब वहीं धूनी रमाएंगे। बहोत जतन करे पर कोई लाभ मिल नहीं रहा बाबा। एक आदमी, सिर्फ कुछ लोगों के हाथों की कठपुतली बन कर सारी जिंदगी गुजार देता है। किस मजबूरी मे? नही मल्लब भिये, अभी हाल फिलहाल ऐसा कुछ हुआ नहीं है पर कभी कभी मेरे दिल मे ख्याल आता है, की ये सब क्या हो रेल्ला है बाप। मल्लब हम तो बस यूँ ही फिरकी ले रहे हैं भिया.........

Tuesday, 6 January 2015

पाकिस्तानी नाव और सावन के अंधे

जब दुनिया बन रही होगी तो बनाने वाले ने जरूर ये पूछा होगा की अक्ल बड़ी या भैंस? जिसने अक्ल बताया उसको अक्ल मिल गयी। जिसने भैंस बताया उसको ना अक्ल मिली और शायद ना भैंस। इस श्रेणी के काफी लोग अपने होने का अहसास समय समय पर करवाते रहते हैं। एक होता है सावन के अंधे को चारों तरफ हरा ही दिखता है। माने यूँ की लोकसभा चुनाव मे मोदी से हारने के बाद सब अंधो को अब चारों और मोदी दिखता है। ताज्जुब होता है की इस पार्टी ने 44 सीट जीत कैसे ली? जनता की नज़रो मे गिरने की किस कदर होड़ मची हुई है ये बात पाकिस्तानी नाव के उपर मचे हुए घमासान से पता चल रही है। पूरी सुरक्षा प्रणाली पर ही सवाल उठाये जा रहे हैं। सवाल ये है की जिस पार्टी के नेताओ को दर्जन भर चुनाव हारने के बावजूद अब तक ये समझ नहीं आ रहा है की जनता उनके खिलाफ क्यूँ होती जा रही उस पार्टी ने कैसे 60 साल तक देश पर शासन कर लिया? कुछ माननीय कुलाचें मार मार के खुफिया रिपोर्ट्स और नेवी की कार्यवाही को सिर्फ इसलिये गलत बता रहे हैं की कहीं उसका श्रेय मोदी ना ले ले। इनको देख कर लगता है की शायद इनके लिये उस जमाने मे भैंस ही बड़ी रही होगी।

Saturday, 3 January 2015

महात्मा जी की बिल्ली और PK

एक बार एक महात्माजी अपने कुछ शिष्यों के साथ जंगल में आश्रम बनाकर रहते थें, एक दिन कहीं से एक बिल्ली का बच्चा रास्ता भटककर आश्रम में आ गया । महात्माजी ने उस भूखे प्यासे बिल्ली के बच्चे को दूध-रोटी खिलाया । वह बच्चा वहीं आश्रम में रहकर पलने लगा। लेकिन उसके आने के बाद महात्माजी को एक समस्या उत्पन्न हो गयी कि जब वे सायं ध्यान में बैठते तो वह बच्चा कभी उनकी गोद में चढ़ जाता, कभी कन्धे या सिर पर बैठ जाता । तो महात्माजी ने अपने एक शिष्य को बुलाकर कहा देखो मैं जब सायं ध्यान पर बैठू, उससे पूर्व तुम इस बच्चे को दूर एक पेड़ से बॉध आया करो। अब तो यह नियम हो गया, महात्माजी के ध्यान पर बैठने से पूर्व वह बिल्ली का बच्चा पेड़ से बॉधा जाने लगा । एक दिन महात्माजी की मृत्यु हो गयी तो उनका एक प्रिय काबिल शिष्य उनकी गद्दी पर बैठा । वह भी जब ध्यान पर बैठता तो उससे पूर्व बिल्ली का बच्चा पेड़ पर बॉधा जाता । फिर एक दिन तो अनर्थ हो गया, बहुत बड़ी समस्या आ खड़ी हुयी कि बिल्ली ही खत्म हो गयी। सारे शिष्यों की मीटिंग हुयी, सबने विचार विमर्श किया कि बड़े महात्माजी जब तक बिल्ली पेड़ से न बॉधी जाये, तब तक ध्यान पर नहीं बैठते थे। अत: पास के गॉवों से कहीं से भी एक बिल्ली लायी जाये। आखिरकार काफी ढॅूढने के बाद एक बिल्ली मिली, जिसे पेड़ पर बॉधने के बाद महात्माजी ध्यान पर बैठे। विश्वास मानें, उसके बाद जाने कितनी बिल्लियॉ मर चुकी और न जाने कितने महात्माजी मर चुके। लेकिन आज भी जब तक पेड़ पर बिल्ली न बॉधी जाये, तब तक महात्माजी ध्यान पर नहीं बैठते हैं। कभी उनसे पूछो तो कहते हैं की हमारी परम्परा को ठेस पहुंचेगी।
आजकल बड़ा PK PK हो राहा है। हिम्मत कर के डाउनलोड की और देख ली। एक बेहद ही औसत दर्जे की घटिया फिल्म को परम्परा को ठेस पहुंचने के नाम पर हो-हल्ला मचा मचा कर सुपर हिट करवा दिया। हम लोग भी महात्मा के शिष्य हो गए हैं। परम्परा के नाम पर बिल्ली पालना बंद करो दोस्तों।