3 June 2017, यात्रा का पहला दिन
आपके पिछवाड़े में कभी कील घुसा है?
नहीं?
तो फिर आप मेरा दर्द नहीं समझ सकते.
मैं यहाँ मनाली के एक होटल में रात को 10.30 बजे जानी
लिवर का ये डायलॉग याद कर के हँस भी रहा हूँ और जानी लिवर का दर्द भी समझ रहा हूँ.
माफ़ करना जानी भाई जाके पैर ना फटे बिवाई वो क्या जाने पीड़ पराई. थोड़ा लेट ही सही पर
आज बिवाई भी फटी और पीड़ भी जानी आपकी. काश आप आज कहीं मिले होते तो आप मेरा और मैं
आपका दर्द साझा करते. क्या खूब जमता रंग जब मिल बैठते दो जख्मी पिछवाड़े.
625 किमी. और लगभग 13 घंटे बाइक चलाने के बाद जख्मी शब्द बहुत
छोटा लग रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे तशरीफ काठ की हो गयी हो. अगर इसको किसी तरह निकाल
कर दिवार पर टांग दिया जाये तो एक बार तो पिकासो की पेंटिंग भी फीकी पड़ जाये. पर अब
कसम खा ली है जानी भाई, ये काठ की तशरीफ अब
बार बार बाइक नहीं चढ़ेगी.
मैं हमेशा कहता रहता था की मुझे घूमने की लत है. इसी लत ने आज
मेरी ये हालत कर दी. तो इस बार रेवाड़ी से लेह अपनी बाइक से. मेरी बुलेट क्लासिक. नाम
रखा है गुब्बी. गुब्बी!? ये कैसा नाम है. नाम
के पीछे की स्टोरी फिर कभी परन्तु एक बड़ी ही आश्चर्यजनक बात ये है मेरी बाइक ने पहाड़ों
में चलते हुए भी 45 किमी प्रति लीटर की एवरेज दी है. और ये सच है. आश्चर्यजनक
इसलिए क्यूंकि जब बाइक ली थी तो मुझे इसकी टॉप एवरेज 35 किमी प्रति लीटर की बताई गयी थी. ये कैसे संभव मुझे अभी तक
समझ नहीं आया है.
चलिए टूर की शुरुआत करते हैं. दरअसल आज सुबह से बाइक चलाने के
अलावा कुछ किया ही नहीं तो आप लोगों को बताने के लिए भी कुछ खास नहीं है सिवाय एक नए
रास्ते पर बाइक चलते हुए रेवाड़ी से सीधे मनाली तक आ पहुंचने के. तो यात्रा का पहला
दिन चाइनीज पटाखे की तरह बिना बजे ही फुस्स हो गया. लगता है अब ये पटाखा कल फटेगा.
असुविधा के लिए खेद है. थकान बहुत हो रही है. सामने दिवार पर घड़ी रात के 11
बजा रही है. नींद आ रही है रे बाबा. आओ फुस्सी पटाखे
सोते हैं.
4 June यात्रा का दूसरा दिन
आज मैं पूरे दिन फ्री हूँ. कोई खास प्लान नहीं रखा है. कल की
तशरीफ तोड़ यात्रा के बाद वैसे भी एक दिन का आराम करना जरुरी था. इन्ही सब विचारी के
बिच कमरे में चाय आ गयी है. सुबह सब नहाना धोना करने के बाद किसी साइबर कैफे में जाकर
पास बनवाना पड़ेगा. सुबह 9 बजे जब साइबर कैफे पहंचे तो सरकारी वेबसाइट पर पेमेंट गेटवे
काम नहीं कर रहा था. जिसकी वजह से किसी का भी पास नहीं बन पा रहा था. रोहतांग दर्रे
से आगे जाने के लिए ये पास बनवाना पड़ता है. ये पास नहीं होने पर आपको रोहतांग से वापिस
भेज दिया जायेगा. अपने ही देश में इस तरह के पास का औचित्य मुझे आज तक समझ नहीं आया.
ऊपर से इनको बनवाने में इतनी शर्तें जुडी होती है की एक पूरा दिन ऐसे ही बर्बाद हो
जाता है. उधर पेमेंट गेटवे फेल्ड दिखा रहा था और इधर मैं बार बार पेज रिफ्रेश करे जा
रहा था. तभी कोई चिल्लाया अरे वेबसाइट चल गयी है. मैंने जल्दी जल्दी सारी सुचना भरी
और फॉर्म को सबमिट कर दिया. और यहीं मुझसे एक गलती हो गयी. जब बार बार डेट ऑफ़ ट्रेवल
वाला कॉलम अपने आप आज की तारीख दिखने लग जाता था. जबकि मुझे जाना कल यानि 5 जून को था. जब फॉर्म सबमिट किया तो यात्रा की तारीख
5 की जगह 4 जून ही रह गयी. और इस तरह परमिट 4 जून यानि आज का ही मिल गया. मेरा परमिट
तो 5 जून का ही मिला पर ये परमिट अजय का था. यानी एक बन्दे का 4 जून का और दूसरे का
5 जून का. अब इसमें ऐसा कोई जुगाड़ नहीं की इसको दोबारा अप्लाई किया जा सके. अब क्या
करें? अजय रुआंसा हो आया. मुझे अपने
आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था. करीब आधे घंटे सोचने के बाद भी कुछ निर्णय नहीं हुआ. मैंने
अजय को समझाया की तू आज निकाल जा और केलोंग में मेरा इंतज़ार करना. मैं कल तुझे वहां
मिलता हूँ. पर उसने अकेले जाने के नाम से हाथ खड़े कर दिए. वो सिर्फ मेरे भरोसे ही घर
से आया था. अकेले कहीं जा पाने लायक हिम्मत अभी जुटा नहीं पता है. शायद ये यात्रा होने
के बाद कुछ परिपक्क्व हो सकेगा. फिर किसी ने बताया की अब एक ही रास्ता है. SDM
ऑफिस जाकर SDM साहब से लिखवा लाओ की गलती से तारीख में गड़बड़ हो गयी है. उसके
बाद जा सकते हो. पर आज तो इतवार है, मतलब कल सोमवार को सुबह 9 बजे तक अब कुछ और
काम नहीं है करने को. थोड़ी चिंता होती रही. पता नहीं सरकारी अधिकारी है, लिखेगा की नहीं. जा पाएंगे या नहीं. कहीं यहीं से
ना लौटना पड़ जाये. धत्त तेरे की ये कैसी शुरुआत हुई? दोनों गुमसुम बैठे थे. और इसी तरह आधा घंटा बीत गया. आखिर मैंने
चुप्पी तोड़ी, "अरे कुछ नहीं होगा,
तू टेंसन ना ले. ऐसा करते हैं आज सोलंग वैली घूमने
चलते हैं. कल SDM साहब नया परमिट बना
देंगे तब चलेंगे."
ऐसी यात्राओं में आप एकदम से फिक्स प्लान नहीं बना सकते. और
बनाने भी नहीं चाहिए. ऐसी यात्राएं अक्सर अनिश्चिताओं से भरी हुई होती हैं. इसलिए एक
दो दिन तो हमेशा अतिरिक्त रखने ही चाहिए. अगर आप फिक्स प्लान कर बैठे और उसमे जरा सी
भी गड़बड़ हुई तो दुःख होता है. और ये दुख आगे की यात्रा खराब कर सकता है.
वापिस लौटते हैं. वहीं पास में एक ढ़ाबे पर खाना खाया और 12
बजे तक सारी चिंताओं को पीछे छोड़ते हुए हम अजय की
बाइक पर सवार होकर सोलंग की तरफ निकल चले. रास्ते भर भरी ट्रैफिक जाम था. बच्चों के
स्कूलों की छुट्टियां खत्म नहीं हुई थी तो दुनिआ भर के लोग सपरिवार घूमने आये हुए थे.
शिमला के बाद उत्तर भारतियों के लिए मनाली अब नया हॉट स्पॉट है. पर कुछ भी हो हम मैदानी
इलाके वालों को पहाड़ों में घूमने की तमीज़ अब तक नहीं आयी है. सबको एक दूसरे से आगे
निकलने की जल्दी, हॉर्न पे हॉर्न,
गाड़ियों में तेज संगीत, मेकअप से रंगी पुती औरतें. उफ्फ. इतना सब काफी था मुझे चिढ़ाने
के लिए. अगर कभी मैं बड़ा अफसर बना ऐसे खूबसूरत छेत्रों में गाड़ियों के हॉर्न पर पूर्ण
प्रतिबंध लगा दूंगा. किसी ने भी हॉर्न बजाय तो तुरंत गाड़ी जब्त. सोलंग आ गया.
सोलंग घाटी मनाली रोहतांग मार्ग मुख्य मनाली शहर से लगभग 13 किमी दूर है. अब खूबसूरत तो क्या कहें पर इसकी
पैराग्लाइडिंग मुझे यहाँ खिंच लायी. काफी पुराण सपना - पैराग्लाइडिंग. आज जब इधर आ
ही गए हैं तो ये भी कर ही डालें. आगे गए तो मैदान में पैरग्लाइडिंग करने के लिए २ स्थान
निर्धारित किये गए थे. पहला स्थान एक साधारण ऊंचाई पर था जहाँ तक आपको पैदल चल कर जाना
था और फिर वहां से ग्लाइडिंग करते हुए आना था. इसके विपरीत दूसरा स्थान अत्यधिक ऊंचाई
पर बनाया हुआ था. वहां तक जाने के लिए रोपवे टैक्सी का इस्तेमाल करना था. फिर वहां
से आपको ग्लाइडिंग करनी थी. ये ऊंचाई इतनी अधिक थी की निचे खड़े होकर देखते देखते ही
मेरे पैर काँपने लगे. करूं या नहीं करूँ? आधा घंटा हो गया बैठे बैठे. निर्णय लेने में हो रही देरी का दूसरा कारन फीस की
चिंता थी. छोटे वाले स्थान की फीस 1600 रु जबकि ऊंचाई वाले की 3200 रु थी. ये भी काफी
ज्यादा थी. अजय से विमर्श करना बेकार था. वो पहले ही हाथ खड़े कर चूका था. काफी देर
सोचा और फिर एक टिकट ऊंचाई वाले स्थान की ले ली. गाइड के साथ रोपवे में सवार हुआ. ग्लाइडिंग
पॉइंट पर पहुंचा. ऊपर आसमान देखा. निचे जमीन देखी. पैर काँप गए. मन किया की मना कर
दूँ. क्या बहन लगाऊं यार. ये कैसा शौक है भाई, पैसे भी दो और ....
पूरा सोचता उस से पहले गाइड लगभग खींचते हुए मुझे आगे ले गया.
उसको देर हो रही थी तो किसी तरह के रहम के मूड में नहीं था. मेरे चारों तरफ रस्सी कसी
गयी. जरुरी निर्देश दिए गए. दौड़ने को कहा गया. दौड़ पड़े. और फिर तो उड़ चले. जैसे ही
चिनार के ऊँचे पेड़ों के ऊपर से ग्लाइडर ने उड़न भरी एक ठंडी बर्फीली हवा ने गलों पर
थपकी देकर स्वागत किया. हवा में उड़ते ही जैसे सब कुछ शांत हो गया. सारा शोर शराब,
डर, विचार कुविचार सब एक झटके में खत्म. ग्लाइडर सायं सायं हवा को चीरते हुए बर्फ से
ढकी हुई चोटियों पर तैरने लगा. आह क्या अहसास था. इसका वर्णन करना कम से कम मेरे जैसे
लेखक के बस की बात तो नहीं. लगभग 15 मिनट तक वैल्ली का चककर काटने के बाद जब मैं नीचे
उतरा तो जिंदगी भर का बेहद खास अनुभव मेरे साथ जुड़ चुका था. अजय ने भी बाद में कम ऊंचाई
वाली ग्लाइडिंग की और काफी खुश है. शाम होने से पहले ही हम वापिस आ गए. होटल के कमरे
में बैठ कर रात के खाने का इंतज़ार हो रहा है. शानदार अनुभव के बाद यात्रा का दूसरा
दिन समाप्त.
5 June तीसरा दिन
सुबह जल्दी उठे और बैग पैक कर के बाइक्स पर लाद्द् लिया। मनाली
से लेह की 490 किमी की दुरी तय करने के लिए हम मानसिक रूप से तैयार हैं. आज काफी
लंबी यात्रा होने वाली थी तो सारा सामान ठीक से बांध दिया गया ... साथ ही बाइक का
भी अच्छे से मुआयना किया गया। नाश्ता किया तब तक 9 बज चुके थे और SDM साहब अपने ऑफिस में समय से पहले ही पहुंच चुके
थे। हमने जाकर अपनी व्यथा सुनाई तो उन्होंने तुरंत पास पर साइन कर दिए। धन्य हो SDM साहब आप। लगभग 9.30 बजे मेरी गुब्बी निकल पड़ी आगे के सफर के लिए।
कहाँ रुकना है इसका कोई प्लान पहले नहीं किया गया था। जहाँ रात हो जायेगी वहीं रुक
जायेंगे। मनाली शहर की भीड़ को चीरते हुए गुब्बी जल्दी ही खाली पहाड़ी रास्तों पर आ
गयी। लगभग 2 घंटे में रोहतांग
दर्रे पर पहला पड़ाव किया जहाँ पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ ने हमारा स्वागत किया।
दर्रे से लगभग 5 km पहले से ही गाड़ियों
का भयंकर जाम लगा हुआ था। पूछने पर पता चला सीजन के समय ये रोज की कहानी है। खैर
बाइक कभी जाम में फसी है जो यहाँ फसती। कोई 15 मिनट रोहतांग पास पर रुक कर हम आगे को बढ़ चले। यहाँ से सफर
का असली रोमांच शुरू होने वाला था। जैसे ही पास पार किया टूटे फूटे रास्ते और ढ़लान
शुरू हो गयी। अब मैं पास को पार कर के निचे उतर रहा था। इसके साथ ही मनाली शहर का प्रभाव
समाप्त हो चुका था। अब यहाँ से आगे वो खतरनाक रास्ता शुरू होता है जिसके लिए मनाली
लेह हाईवे जाना जाता है। पहली बार पता चला की आप एक टूटी हुई और पथरीली पगडंडी को भी
हाईवे कह सकते हैं। मुझे याद नहीं की रोहतांग पास से पाँग तक (लगभग 300
km) के एरिया में कहीं भी मैंने बाइक में तीसरा
गेयर डाला हो। 2 घंटे में 15
km चलने के पश्चात खोकसार
पहुंचा जहाँ अक्ष पहले ही इंतजार कर रहा था। वहाँ एक टेंट नुमा ढाबे पर रुक कर चाय
पी और फिर उसके बाद खाना खाया। बाहर तेज बर्फीली हवा चल रही थी। सर्दी के मारे
बुरा हाल था इसलिए खाना खाने के बाद फिर से एक चाय पी। सरकार चाय को राष्ट्रीय पेय
घोषित क्यूँ नहीं कर देती। वैसे अघोषित रूप से तो है ही, मुझे नहीं लगता की इसपर किसी को आपत्ति होगी...
अभी हाल ही में सुना था की खिचड़ी राष्ट्रीय खाना बनेगी, तो चाय राष्ट्रीय पीना क्यूँ
नहीं बन सकती? । सर्दी इतनी ज्यादा थी की चाय चूल्हे से हाथ
तक पहुंचते पहुंचते मीठे पानी में बदल जाती थी। ढाबे वाले ने बाहर छोटे छोटे टेंट
लगा रखे थे... हमसे भी गुजारिश की कि आज रात उसके यहीं रुका जाये। किराया था 1200 रु। पर हमें आगे जाना था...सफर काफी लंबा था
इसलिए राम राम बोल कर आगे बढे। यहाँ से आगे हरियाली जैसे एकदम खत्म हो गयी थी।
पहाड़ों पर थोड़ी बहोत बर्फ के अलावा कुछ नहीं। यहाँ के पहाड़ों को अक्सर नंगे पर्वत
बोला जाता है। आप अगर ये सोच रहे हों की अब मैं आपको ये बताऊंगा की चारों तरफ
हरियाली से भरे हुए सुंदर नजारे थे तो आप ये बात अब आगे की सम्पूर्ण यात्रा तक भूल
जाएँ। चारों तरफ पहाड़ ... उसके बिच में पथरीली घाटी.. एकदम संकरा एवं कच्चा
रास्ता.. और उसपर मैं और मेरी गुब्बी। कहीं रास्ते के बिच में दलदल आती तो कहीं
बर्फ के पिंघलने से पैदा हुआ पानी नाले के रूप में हमारा रास्ता रोकता रहा। किंतु
दाद देनी पड़ेगी इस बाइक कंपनी की.. क्या जानदार बाइक बनायी है। ऐसा लगता है रॉयल enfiled ने जब Bullet डिज़ाइन की होगी तो वो लोग इस रास्ते का सर्वे करने आये
होंगे। रास्ते में रुकते रुकाते जिस्पा पहुँचा तो शाम हो चुकी थी। ऐसी जगहों पर
जहाँ किसी भी क्षण आपको मदद की जरुरत पड सकती हो किंतु कोशों दूर तक कोई मदद करने
वाला दिखाई न दे...वहाँ अँधेरा घिरने से पहले कोई ठोर ठिकाना नहीं ढूंढा तो आफत
आते देर नहीं लगती। एक जगह टेंट लगे
देखे तो रुक कर रात बिताने के बारे में पूछा। यहाँ भी 1200रु किराया था.. खाना अलग से। पर जगह इतनी सुंदर
थी की 1200 रु गौण हो गए।
चारों तरफ से बर्फीले पहाड़ों से घिरी घाटी में टेंट लगे हैं। बिल्कुल पास में ‘भागा’
नदी पुरे वेग से बह रही हैं। मैं अभी कुछ देर पहले नदी के किनारे थोडा टहल कर आया
हूँ। भागा नदी को चेनाब के हमेशा साथ रहने वाली नदी कहा जाता है. चेनाब नदी दो उत्कृष्ट
नदियों भागा और चंद्रा से मिलकर बनती है. भागा नदी भारत की तीसरी सबसे ऊंचाई पर स्थित
झील ‘सूरज ताल’ से निकलती है. आगे बारा-लाच-ला आएगा जिसको हमें कल पार कर के आगे बढ़ना
है, ये सूरज ताल वहीँ स्थित है. आज हम ये ही कोई 138 किमी चले हैं.
अब आगे 352 किमी का सफर बचता है. खाना खाने के बाद अपनी मोटी रजाई में घुस कर आज
दिन भर की यादों को डायरी में छिपा रहा हूँ। अभी लाइट नहीं है... जब लाइट आएगी तो bsnl का नेटवर्क आएगा उसके बाद मैं घर पर फोन कर
सकूँगा। बाहर जनरेटर चल रहा है... तेज हवा टेंट के कपडे को उखाड़ने को आतुर है...
हवा की सांय सांय मुझे टेंट के अंदर भी साफ सुनाई दे रही है। टेंट में पाइप से
लटका हुआ बल्ब लगातार हिल रहा है जिस से लिखने में थोड़ी परेशानी हो रही है। किसी
भुतहा फिल्म में प्रयोग करने के लिए एकदम सम्पूर्ण माहौल है। पर मेरे लिए माहौल
डरावना कम और खूबसूरत ज्यादा हो गया है। एकांत पसंद आदमी के लिए इस से ज्यादा
एकांत कहाँ होगा। शब्दों में बयान नहीं किये जा सकने वाले अनुभव के साथ यात्रा का
तीसरा दिन समाप्त।
6 Jun यात्रा का चौथा दिन
अगर रूट मैप के हिसाब से बात की जाये तो आज शाम को हमने
सरचू में रुकने का प्लान किया हुआ था। जिस्पा से सरचू 113 km है। सारी तैयारी कर के 6.30 बजे सुबह हम आगे बढ़ चुके थे। मनाली से कैन में
भर कर लाये हुए पेट्रोल से टँकी फुल कर ली थी। शुरू में कुछ देर थोडा ठीक ठाक
रास्ता आया। मनाली लेह हाईवे पर रोहतांग से सरचू के बीच में जहाँ भी तीसरा गेयर लग
जाये आप उसको ठीक ठाक रास्ता मान सकते हो। रास्ते में कहीं हल्की धुप मिलती तो
कहीं अचानक से गहरी धुंध के साथ तेज बर्फीली हवा। मौसम यहाँ क्या गुल खिलाता है
इसका पता मुझे तब चला जब बारा-लाच-पास ( Bara- lacha-la) पहुंचे। पास पार करने के लिए 16500 फीट की ऊंचाई पार करनी थी। बारा-लाच पास झंस्कार
रीजन में एक ऊंचाई पर स्थित दर्रा है जो हिमाचल के लाहौल और जम्मू कश्मीर के लद्दाख
को आपस में जोड़ता है. दर्रे पर चढ़ने से पहले धुप खिली हुई थी। जैसे जैसे ऊंचाई पर
चढ़ता गया ठण्ड अपना प्रकोप दिखाने लगी। तीन तीन जोड़े मोटे ऊनी कपड़े पहनने के
बावजूद हाड़ काँप रहे थे। रोड के दोनों तरफ ये ऊँची ऊँची बर्फ जमी हुई थी। BRO ने अभी अभी बर्फ काट कर रास्ता बनाया था। कुछ
और ऊपर पहुँचा तो बर्फ पड़ने लगी (snowfall).. देख कर अत्यंत हैरानी हुई पर हमेशा snowfall देखने की इच्छा पर खुशी से ज्यादा डर हावी रहा।
यहाँ एक बात मैं आपको बता दूँ की फोटो में बर्फ गिरना और बर्फ से ढके हुए पहाड़
चाहे जितने सुंदर लगते हों पर हकीकत में जब ये अपने होने का अहसास कराते हैं तो
इतनी सर्दी में भी पसीना आ जाता है। जब टॉप पर पहुंच तो जाम लगा हुआ था। जाम..!
यहाँ भी? दरअसल ये रास्ता
एकदम सिंगल लेन है (सिंगल भी मिल जाये तो बहोत बड़ी बात है), एक ट्रक जो ऊपर से आ रहा था एक तीव्र मोड़ पर
ठीक से मुड़ नहीं सका। रास्ते के दोनों तरफ जबरदस्त बर्फ जमी होने के कारण आगे पीछे
होने में भी समस्या थी। कुछ लोग यहाँ वहाँ बर्फ में अपनी गाड़ियाँ घुसा कर ट्रक को
निकलवाने की मशक्कत कर रहे थे। गुब्बी को भी एक कोने में लगवा दिया गया। मैंने
मौका देख कर मोबाइल निकाला और एक छोटी सी विडिओ बना ली ... उस हालत में जेब से मोबाइल निकालना और फिर
दस्ताने निकाल कर विडिओ बनाना अपने
आप में किसी अवार्ड विनिंग बहादुरी से कम नहीं था। सड़क किनारे जमी हुई बर्फ पर चढ़ा
तो निचे एक नीले रंग की पानी की झील दिखाई दी। झील रोमाँच से रोंगटे खड़े कर गयी. कहीं
ये ही तो सूरज ताल नहीं जहाँ से भागा नदी निकलती है? मैंने सिर्फ पढ़ा था और कोई
जानकारी नहीं थी. बाद में पता चला की सूरज ताल वहां से कोई 1 किमी की दुरी पर है. ठण्ड
की वजह से झील पूरी तरह जमी हुई थी। लगता है snowfall अभी शुरू ही हुआ था क्योंकि झील के पानी का रंग
अभी दिख रहा था नही तो शायद बस सफेद चादर दिखाई देती। थोड़ी देर में ट्रक निकला तो
हम भी निकल गए। इन रास्तों पर चलने के दौरान कई बाइकर्स मिले ... जो थोडा बहुत आगे
पीछे दिखते रहते। लगभग सभी से एक अनकही से दोस्ती हो गयी। ये दोस्ती शायद समय की
जरुरत रही होगी। वैसे भी स्वार्थपने में इंसान अभी तक सबसे आगे है। सबको एक दूसरे
से आगे आने वाले सफर में शायद किसी तरह की मदद की दरकरार थी। दोस्ती की इसी दरकरार
में एक बाइक जिस पर 2 लोग सवार थे पता
नहीं कब हमारे साथ साथ हो लिए। उन्होंने अजय के साथ नाम पते वाली अच्छी दोस्ती भी
कर ली। खैर एक से भले दो... हमें इसमें क्या नुकसान होना था। इन रास्तों पर कब कोई
आगे निकल जाता और कब कोई पीछे रह जाता कुछ पता नहीं चलता। इन्ही विचारों में खोया
हुआ मैं चला जा रहा था तो सामने एक नाला आ गया। बर्फ का पानी ऊपर से पिंघल कर रोड
से बहता हुआ निचे खाई में गिर रहा था। ऐसे कई नाले मैं पार कर के आ चुका हूँ
किन्तु ये काफी चौड़ा और गहरा था। पानी का वेग भी काफी था। आस पास नजर दौड़ाई...
सिवाय गहरी धुंध के कोई दिखाई नहीं दिया। सोचा अजय का इंतजार करता हूँ... क्या पता
यहाँ से निचे बह गया तो! कोई बचाने वाला भी नही है। करीब 5 मिनट इंतज़ार किया... कोई नहीं आया... अजय का
पता नहीं था आगे निकल गया या पीछे है। ऐसे इतनी ठण्ड में कितनी देर रुकेगा? चल फिर चलते है, कुछ नहीं होगा। बाइक आगे बढ़ाई .. टायर पानी में घुसा तो
घुसता ही चला गया। मतलब पानी गहरा था। ऐसे में अगर रेस ढीली छोड़ दी तो साइलेंसर
में पानी जा सकता है ये सोच कर थोड़ी रेस बढ़ाई। एक पाँव अब तक पानी में जा चुका
था... किन्तु पानी इतना गहरा था की पांव जमीन पर लग नहीं रहा था। रेस बढ़ाने और
बाइक की स्पीड कम रखने की आपाधापी में आगे वाला टायर पानी में छुपे हुए किसी बड़े
पत्थर से टकराया। जिस से संतुलन खराब हुआ
और इस से पहले मैं पानी में गिर कर यमराज के दर्शन करता मैंने फुर्ती से बाइक को
पकडे पकडे निचे जम्प लगा दी। निचे कूदने के बावजूद मैं गिरा नहीं और दोनों हाथों
से कस कर बाइक को पकडे रहा। अब मैं घुटनों तक पानी में था किन्तु ऐसी स्तिथि में
भी सेल्फ कण्ट्रोल ऐसा रहा की बाइक की रेस छोड़नी नहीं है ये बराबर ध्यान रहा। पहला
गेयर लगी हुई बाइक चालू हालात में थी तो फिर बाहर निकलने में ज्यादा परेशानी नहीं
हुई। शरीर पहले से ही सुन्न था तो ठन्डे पानी का एकदम से अहसास नहीं हुआ। परन्तु
बाहर निकलने के बाद हाथ पैर बाइक चलाने की हालत में नहीं रहे। ऐसा लग रहा था की
जूते के अंदर शायद पैर अब तक गल चुके हैं। धीरे धीरे आगे बढ़ना चालू रखा.. रुकने का
तो वैसे भी कोई फायदा नहीं था। थोड़ी दूर चला तो BRO का रोड का काम चल रहा था। वहाँ काम करने वाले
वर्कर्स ने हल्की आग जला रखी थी। मैंने बाइक रोकी, अपनी सारी ताकत इकट्ठा की और किसी तरह बाइक से आग तक
पहुँचा। मुझे लगता है अब तक के जीवन में मेरा शरीर इतना ठंडा कभी नही हुआ। पैर
घसीटते हुए आग के पास पहुँचा.. पास क्या यूँ कहिये की आग के ऊपर पहुँचा। जूते दस्ताने
सब उतार कर फेंके और हाथ सीधे आग पर रख दिए। आग भी काफी धीमी थी क्यूंकि ऐसे
बियाबान में आग में जलाने को कुछ उपलब्ध नहीं था, जो था वो सब गीला था। मेरी हालत देख कर एक लड़का दौड़ कर कहीं
से एक बोरी उठा लाया और उसको आग में डाल दिया। पहाड़ों का शहरीकरण भले ही होने लगा
हो लेकिन पहाड़ी लोगों ने आत्मयिता नहीं खोयी है। इनके लिए पहाड़ घूमने आने वाला हर
आदमी इनका अपना है। आग में सिकने के वो 15 मिनट जैसे नया जीवन दे गए। सुबह से नाले पार कर कर के बैग
में रखी हुई सारी जुराबें और दोनों जोड़ी जूते गीले हो चुके थे। कपड़े जूते सूखे तो
नहीं किन्तु मेरे अंदर आगे बढ़ने का नया उत्साह आ गया। दर्रे से निचे उतरे तो आगे
मौसम थोडा खुला हुआ मिला। हवा लगने से कपडे कुछ सूखने से लगे थे। उबड़ खाबड़ रास्तों
से होते हुए 11.30 बजे सरचू पहुँचा
तो थोड़ी देर में अजय और नए साथी भी आ मिले। हिसाब लगाया तो करीब 5.30 घंटे में 110 km चले थे जो काफी सही दुरी मानी गयी। वहीँ एक
ढाबे पर रुक कर चाय पी और फिर लंच भी किया। घड़ी पर नजर दौड़ाई.. 12 बजे हैं, मतलब अभी 6 घंटे और चल सकते हैं। आस पास नजर दौड़ाई तो सिवाय दो चार
ढ़ाबे के सरचू में और कुछ था ही नहीं। बस चारों तरफ वही पहाड़ जो इतने दिनों से साथ
चले आ रहे थे। मंत्रणा हुई... क्या करें? किसी को थकान हुई? तय हुआ की खाना खाने के बाद सब तरोताजा हैं, समय काफी है और साथ ही 80
km चलने के बाद बहोत अच्छा
रोड भी आ जायेगा। तो फिर चलते हैं.. मंजिल के जितना नजदीक पहुंचा जाये अच्छा है।
लो जी एक बार जो यहाँ से चले तो पीछे मुड़ कर नहीं देखा। फिलहाल कुछ दूर रोड ऐसा था
की बाइक 50 की स्पीड पर चल
रही थी। पाँग पहुँचने से पहले रास्ते में हम गाटा लूप से गुजरे. गाटा लूप अपने 22 तीव्र
और तेज घुमावदार रास्तों के लिए जाना जाता है. एक के बाद एक 22 तेज मोड़ पार होते गए
और ऊपर चढ़ते गए. अजय कहीं पीछे रह गया था. बाद में पता चला की ऐसे ही एक तेज मोड़ पर
वो थोड़ा असावधान हो गया था और बाइक से गिर गया था. बाइक राइडिंग के पुरे सुरक्षा उपकरण
पहने होने की वजह से चोट नहीं आयी थी. बस हाथ में थोड़ा झटका लगा था. आगे एक छोटे से
तम्बू पर चाय पिने के लिए रुका. वहीँ एक ट्रक देखा जिसमे तीन बाइक रखी हुई थी. ट्रक
मनाली की तरफ जाने वाला था. पूछने पर पता चला की कुछ लोग जो नेट पर देख पढ़ कर जोश में
मनाली लेह जाने के लिए बाइक से आये थे अब यहाँ तक आते आते हिम्मत हार चुके हैं और इस
ट्रक को किराये पर बुक कर के मनाली वापिस जा रहे हैं. ऊँचाई और खराब रास्ते की वजह
से सही सलामत ये यात्रा पूरी कर लेना वाकई टेढ़ी खीर है. जिसने पहले कभी छोटी मोटी पहाड़ी
यात्रा बाइक से नहीं की हो उसको सीधे इस रास्ते पर नहीं आना चाहिए. आगे नक्की पास
(Nakee La) आया जिसकी ऊंचाई 15,547 फीट है. पर यहाँ बर्फ नहीं थी और रास्ता भी ठीक था. कुछ देर बाद एक और ऊँचे
पास ने स्वागत किया. लाचुंग पास (Lachulung
La) ऊंचाई 16,616 फीट. यहाँ बादल घिरे हुए थे. धूप बिल्कुल नहीं थी. आस पास की चोटियां दिखाई
नहीं पड़ रही थी. ठंडी हवा के साथ ऊँचाई अपना रोब बराबर जमाये हुई थी. रास्ता इतना
खराब था की बाइक चलाने का शौक नहीं होता तो यात्रा काफी उबाऊ होने वाली थी। पूछने
पर बताया गया था की पाँग तक रास्ता
ऐसा ही है उसके बाद मस्त हाईवे स्टार्ट होगा। सुबह से चले और ये पाँग न आकर दे रहा था। खीज होने लगी। जाने से पहले एक ब्लॉग पढ़ा
था की लद्दाख रीजन का इस तरह से घूमने के हिसाब का माहौल कुछ ऐसा है की आदमी जल्दी
खीज जाता है। कितना जल्दी ये नहीं लिखा था। तो मैं हिसाब नहीं लगा पाया की मैं
जल्दी खीजा या टाइम के अनुसार... या कहीं खीझने में लेट तो नहीं हो गया। अपने आप
से उट पटांग बातें करता हुआ आखिर शाम के 4 बजे पाँग पहुँचा। अजय
और नए साथी पहले से मौजूद थे, जब तक मैं वहाँ
पहुंचा वो अपना चाय पानी खत्म कर चुके थे। मेरी खास इच्छा नहीं थी तो कुछ देर रुक
कर बाइक को आगे की तरफ हेंच दिया। और यहाँ से शुरू होता है वो रोड जिसकी प्रतीक्षा
सुबह से थी। माशाअल्लाह... अल हबीबी ... वाह गजब ... क्या सड़क है। मन ऐसे ही अजीब
अजीब से नारे लगाने लगा। बाइक 100km प्रति घंटा की रफ्तार पकड़ चुकी थी। जैसे फोटो में देखते हैं
ना एकदम सीधी रोड, चारों तरफ सुंदर
पहाड़ीयाँ, घाटी में चरते
हुए याक और पहाड़ी भेड़ें, चरवाहे, थोडा बहता हुआ पानी .. वाह.. एकदम वैसा ही
नजारा पहली बार देखने को मिला। लेह यहाँ से अभी भी 180 km दूर है और समय है लगभग 2 घंटे। हम लोग चाह रहे थे की आज सीधा लेह ही
पहुंच जाते हैं.. यात्रा का एक दिन बचा सकते है.. प्राइवेट नौकरी रे बाबा। अगर
बाइक ऐसे ही भागती रही तो लेह पहुंचना कोई ज्यादा बड़ी बात भी नही। 60
km कब निकले पता नहीं चला।
आगे चला तो तेज बर्फीली हवाएँ टकराने लगी। सामने एक बड़ा पहाड़ दिखाई दे रहा था जो
बर्फ से पूरा ढका हुआ था। शायद उसी बर्फ की वजह से इतनी ठंडी हवा है.. पर इतनी तेज
क्यूँ है, तूफान के जैसे..
हेलमेट उड़ने लगा। पहाड़ नजदीक आता जा रहा था.. हवा हल्की सी कम हुई पर लगा की जैसे
गुब्बी थोडा धीरे हो गयी है। मीटर पर नजर गयी.. स्पीड 65। ऐसे कैसे? ऐसी कैसी हवा है भाई जो 350 cc बाइक को 100 से 65 पर ले आई? रेस पूरी मरोड़ीनी
चाही तो हैरानी हुई देख कर की रेस तो पहले से ही पूरी मरोड़ी हुई है। पहाड़ और नजदीक
आया ... रेस और डाउन हुई....40 की स्पीड पर गुब्बी। ये क्या हो रहा है। गुब्बी पहाड़ चढ़ रही थी.. स्पीड 35...
फिर 30... और आखिर में 20 । क्या गुब्बी खराब हो गयी है! वो भी ऐसे बियाबान में! और
मुझे तो ठीक करनी भी नहीं आती। सोच कर मेरे पांवों के निचे से जमीन खिसक गयी। तभी
कुछ दूर आगे जाते हुए अजय पर निगाह पड़ी, वो भी काफी धीरे लग रहा था। पर ये समस्या का समाधान नहीं
था। मेरी प्यारी गुब्बी ये तूने क्या किया। मैंने तेरा इतना भरोसा किया और तूने
उसका ये सिला दिया। मेरे प्यार में क्या कोई कमी रह गयी थी जो तू खराब हुई वो भी
यहाँ ..! दूसरे गेयर में 18-20 की स्पीड से आगे बढ़ने के अलावा कोई दूसरा आप्शन नहीं था। धीरे धीरे बढ़ती हुई
गुब्बी दिए के बुझने से पहले फड़फड़ाने टाइप की फीलिंग दे रही थी। खैर फड़फढ़ाती हुई
गुब्बी जब पहाड़ के टॉप पर पहुंची तो एक बड़ा सा Welcome बोर्ड लगा हुआ था।
"Welcome at
Thanglang-La"
Height 17580 Feet
बोर्ड देखते ही मुझे किसी का लिखा हुआ ब्लॉग याद आ गया
जिसमे लिखा था की कैसे यहाँ चढ़ते समय अच्छी अच्छी गाड़ियाँ भी हाँफने लग जाती है।
मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। गुब्बी खराब नही हुई थी, ये जगह ही ऐसी थी। पहाड़ चढ़ते समय अहसास नहीं
हुआ की चढ़ाई कैसी है। मैंने खुशी से गुब्बी को चूमा और इसकी मस्त पोज बना बना कर
कुछ फोटो भी खींची। पूरी यात्रा में फोटो बहोत ही कम खिंची गयी थी अब तक। जाने क्यूँ।
उसके बाद तो फिर जो भागे तो 7 बजे लेह पहुंच कर ही रुके। एक घंटा सस्ता सा होटल ढूंढने में लग गए। आज पहाड़
में 500 km बाइक चलाने के
बाद अब बिना खाना खाये कपडे बदल कर रजाई में घुस कर दिन भर का अनुभव लिख रहा हूँ।
कपडे सारे गीले हैं इसलिए जो कम गीले थे वो पहन लिए हैं। आज का अनुभव ये कहता है
की मैं आपको बोलूँ की हर आदमी को मरने से पहले जिंदगी मे कम से कम एक बार मनाली
लेह की यात्रा बाइक से जरूर करनी चाहिए। यहाँ बहोत से ऐसे मौके आते हैं जब आपको ये
लगता है की अब मरे की तब मरे.. या ये कहाँ फस गए यार। अच्छे से अच्छा नास्तिक भी
यहाँ आस्तिक बन जाता है... भगवान से दुरी कुछ कम जो हो जाती है। मैं तो बोलता हूँ
की अपने बच्चों को डांस क्लास, पेंटिंग क्लास टाइप की जगहों पर ना भेज कर उनका surviving
skill बढाइये। उनको छुई मुई मत
बनाओ.. भेजो उनको ऐसी जगहों पर जहाँ उनको सिखने को मिले की जिन्दा कैसे रहा जाता
है। विपरीत परिस्थितियों में शांत कैसे रहा जाता है। लगता है मैं ज्यादा ज्ञान दे
रहा हूँ। वैसे भी लिखने वाले को अपने लिखने के काम से मतलब रखना चाहिए। आज के इस
जिंदगी भर ना भूल सकने वाले अनुभव के साथ इति समाप्ति। लेह से शुभ रात्रि।
7 Jun पाँचवा दिन
आज हम कहीं नहीं गए। सुबह उठने के बाद थोडा यहाँ वहाँ पैदल
घूमे बाद में नुब्रा और पेंगोंग लेक जाने के लिए परमिट बनवाने में लग गए। अब तक की
यात्रा का ये दूसरा परमिट था। मुझे ये बात आज तक समझ नहीं आई की भारत में घूमने के
लिए भारतियों को ही परमिट क्यूँ बनवाना पड़ता है? और इसको बनाने की प्रक्रिया इतनी जटिल की एक पूरा दिन
बर्बाद हो जाये। घूमने आने वालों के लिए इस तरह एक जगह बैठकर पूरा दिन बर्बाद कर
देने की कीमत को शायद सब लोग नहीं समझते। और वैसे भी परमिट जब सबको मिल ही जाता है
तो इस सारी excercise का मतलब क्या था भाई? आपको फीस चाहिए... या आपको ऊपर जाने वाले लोगों की गिनती
करनी है, तो ये सब तो
रास्ते में एक चेक पॉइंट बनाने भर से भी हो जायेगा। इस बात पर किसका इस्तीफा माँगा
जाये ये अभी तक तय नहीं हुआ है ..... होते ही दूसरी किताब के जरिये आप लोगों तक
पहुँचा दिया जायेगा। वैसे आज मेरा नुब्रा घाटी जाने का मन था पर पता चला की
खारदुंग-ला पर चटटान खिसकने और भारी बर्फबारी से रास्ता बंद था। अजय तो वैसे भी
वहाँ नहीं जाना चाहता था, अब मेरा भी प्लान
कैंसिल हो गया। एक जान पहचान के कर्नल साहब लेह में तैनात थे। घर से चलने से पहले
उनसे बात हुई थी और बताया था की 7 को लेह पहुचेंगे। पर रास्ते में नही रुकने की वजह से हम एक
दिन पहले ही आ गए थे। इसलिए पिछली रात को हमने उनको फोन ना कर के होटल में रुकना
बेहतर समझा। परमिट बनवाने के पश्चात उनको फोन किया तो उन्होंने तुरंत अपना पता
दिया और कुछ देर में हम उनकी यूनिट में मेहमान बन कर पहुंच गए। खूब खातिरदारी हुई।
कई दिनों बाद गर्म पानी से अच्छे से नहाये और घर जैसे स्वाद का खाना खाया। लंच कर
के अजय अपनी बाइक की सर्विस करवाने चला गया। मैं रूम में क्या करता... लेह घूमने
के इरादे से बाहर निकला तो गुब्बी पिछले पहिये से पंचर हुई उदास सी खड़ी थी। यहाँ
वहाँ देखा तो जमीन में काफी सारी कीलें पड़ी हुई थी। पास में ही आर्मी के जवान लकड़ी
का कुछ ढांचा सा बना रहे थे। गुब्बी भी इन्ही कीलों की साजिश का शिकार हो गयी थी।
मुझे गुब्बी पर बड़ी दया आई, कोई नहीं बीबा
इतने लंबे सफर के बाद एक पंचर तो बनता भी है। यहाँ मैं आपको बताना चाहूँगा की
यात्रा पर जाने से पहले मैंने अपनी बाइक के टायर्स को ट्यूबलेस नहीं करवाया था।
मुझे इस तरह का बिल्कुल भी अंदेशा नहीं था की आगे क्या हो सकता है। ज्यादा से
ज्यादा पंचर हो जायेगा तो खुद ही बना लूँगा सोच कर एक पंचर किट जरूर खरीद ली थी।
परन्तु जिस प्रकार की परिस्थितियों से मैं गुजरा वैसे में पंचर बनाना तो दूर अगर
सेल्फ ना हो तो बाइक में लगातार 2 किक भी ढंग से ना लगे। इसलिए आप सभी के लिए एक सलाह ये ही
है की यहाँ आने से पहले बाइक के टायर्स को ट्यूबलेस करवाना बहुत जरुरी है। साथ ही
एक एक अतिरिक्त क्लच वायर, रेस वायर और
ब्रेक वायर पहले से ही बाइक में डलवा लें तथा बाइक के ब्रेकडाउन के बारे में डिटेल
में जानकारी ले कर ही आएं। सलाह के बाद वापिस साइट सीन पर लौटते हैं। पंचर की
दुकान वहाँ से 6 km दूर थी। गुब्बी
पर बैठ कर धीरे धीरे वहाँ पहुँचा और पंचर बनवा लिया। दिन के 4 बजे थे। थोडा लेह शहर देख लेते हैं। वहाँ से
मॉल रोड, शांति स्तूप और थोडा
दायें बाएं का चक्कर लगा कर 7 बजे रूम में पहुँचा। पहुंचते ही सबसे पहला काम ये लिखने का कर रहा हूँ। इस से
पहले दिमाग में विचारों की गुथ्म गुत्था हो इनको ताजा ताजा डायरी में लिख देना ही
ठीक रहता है ... ना रहेंगे विचार न होगी गुथ्म गुत्था। कल पेंगोंग लेक जाने का विचार है। सही पूछें तो
जब आप यहाँ बाइक से आते हैं तो कुछ देखने की बजाय बाइक चलाना ही अपने आप में घूमना
है। जो असल देखने की चीज थी वो मैं अच्छे से ना सिर्फ देख चुका हूँ बल्कि जी भी
चुका हूँ .... मनाली लेह हाईवे, NH 3 ..।
8 Jun यात्रा का छठा दिन
रात अजय लेट आया था। उसकी बाइक में कुछ प्रॉब्लम थी तो पूरी
सर्विस करवानी पड़ी। अच्छा ही किया, ऐसी जगहों पर रिस्क नहीं लेकर समय पर देखभाल कर लेनी चाहिए। आया तो कहने लगा
कल पेंगोंग तो चलेंगे पर बाइक से नहीं जायेंगे। क्यूँ भाई? दलील दी की काफी दिन से लगातार बाइक चला रहे
हैं इस से ये नुकसान हुआ की सारा ध्यान बाइक चलाते हुए आगे सिर्फ रोड पर ही रहता
है। आस पास कुछ देख ही नहीं पाते। ऐसा करते हैं टैक्सी से चलेंगे, आराम से पैर पसार कर बैठेंगे और खूब फोटो
खिंचते हुए जायेंगे। वैसे भी अभी वापिस जाने के लिए भी काफी बाइक तो चलानी ही है।
आइला, इस एंगल से तो मैंने सोचा
ही नहीं। मुझे ये स्कीम बड़ी अच्छी लगी। मैंने बोला इतनी सर्दी में तेरा दिमाग जमा
नहीं? अभी भी बड़ा सही चल रहा है
भाई। तारीफ सुन कर उसने दूसरा पत्ता फेंका, बोला "देख अगर अलग से टैक्सी लेंगे तो 8 हजार रु लगेंगे। इसलिए मैंने 3 और लोगों का ग्रुप देख लिया है तो अपना हिस्सा
आधा।" "वाह मेरे चीते। तू तो बड़ा दिमाग चलाने लगा। लेह की हवा में ही
कुछ फर्क है क्या?" अगले दिन हम एक
स्कोर्पियो टैक्सी में बैठ कर घूमने को निकल पड़े। बाकि तीन लोग पहले से ही गाड़ी
में बैठे थे। तीनों लड़के गुड़गांव की किसी आईटी कम्पनी में काम करते हैं। बातें चल
निकली तो उनकी Frustration खुल कर सामने आ गयी। बेचारे बड़े परेशान थे अपने टूर से। इतने की वापसी की
फ्लाइट टिकट मंगलवार को थी मगर वो रविवार को ही वापिस लौट जाना चाह रहे थे। उनकी
घूमने की सब इच्छा पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी। मेरे लिए ये सुनना एक आम बात थी।
दरअसल अपेक्षाकृत कम घुम्मकड़ी के शौकीन लोग जब लद्दाख आते हैं तो ज्यादातर को पहली
नजर में ये जगह पसंद नहीं आती है। ये उसका ही नतीजा है। यहाँ तक की कल तो मुझे एक
टूरिस्ट से सुनने को मिला की "I think Ladakh is an over rated
place." लेकिन जिसको ये जगह पसंद
आ गयी वो फिर यहीं का हो कर रहा जाता है। मुझे एक लड़का मिला जो 7 बार लदाख आ चुका है। मैं खुद 3 बार आ चुका हूँ। रास्ते भर वो लोग खीजते रहे, एक लड़का तो लगातार एयरलाइन कम्पनी से फोन पर
जुड़ा हुआ था की जैसे भी कर के उनकी फ्लाइट 2 दिन पहले कर दी जाये, इसके लिए वो अतिरिक्त पैसे देने को भी तैयार थे। चलो छोड़ो
खीजने वाले लोगों को इस से ज्यादा स्पेस देना भी ठीक नहीं है।
ये टैक्सी से आने वाला प्लान यहाँ मुझे बहोत पसंद आया।
रास्ते भर फोटो खिंचता हुआ आया। जब आप ऐसी जगहों पर हर छोटी बड़ी चीज़ की खचर खचर
फोटो खींचने लग जाते हो तो स्थानीय लोग तुरंत समझ जाते हैं की मार्किट में लौंडा
नया आया है। अच्छा ये स्थानीय लोग भी गजब के आत्म नियंत्रण वाले लोग होते होंगे।
हर रोज सैकड़ों लोग इनको बर्दाश्त की हद तक तंग करते हैं फिर भी ये अपने काम को
शांति पूर्वक चलायमान रखते हैं। कितने भावविहीन चेहरे हो गए हैं इनके। जिनकी
जिंदगी निकल गयी भाव दर्शाते दर्शाते अब बेचारे भावविहीन नहीं होंगे तो क्या
होंगे। पेंगोंग के रास्ते में कारु गांव से थोड़ा आगे चढ़ाई शुरू हो गयी. लगभग आधा घंटे
चले और ये लो जी.... एक और ऊँचा दर्रा आपका स्वागत करेगा. नाम है चांग पास (Chang -La). ऊँचाई के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे ऊँचा मोटरेबल रोड
17590 फीट. रास्ते भर सड़क पर बर्फ की मोटी और कठोर पर्त जमी हुई थी। वाहनों के
चलने से बर्फ चिकनी भी गयी थी जिस से वाहन फिसल रहे थे। कुछ बाइक वाले जो आजु बाजु
चल रहे थे उनको कई कई बार फिसल कर गिरते हुए देखा। बाइकर्स जमीन पर पैर रखते हुए 5km की रफ़्तार से चल रहे थे। बाइक को लगभग खींचना
पड़ रहा था जिसकी थकान उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी। यहाँ गाड़ियों के पहियों में
लोहे की मोटी जंजीर बंधी हुई थी जिस से की टायर बर्फ पर फिसले ना। निचे खाई में
कुछ ट्रक फिसल कर गिरे पड़े थे। लग रहा है ये ट्रको की कब्रिस्तान होगी। सामने देखा
तो आगे चल रहा है एक बड़ा ट्रक फिसलते हुए खाई की तरफ बढ़ने लगा, मैं शून्य में ताकता रह गया। जब वापिस लौटा तो
देखा कई स्थानीय ड्राइवर ट्रक को बर्फ से बचा कर वापिस मेन रास्ते पर लाने में लगे
थे। हमारी टैक्सी का ड्राइवर भी। मुझे पता ही नहीं चला वो कब उतर कर उस तरफ दौड़
पड़ा था। बेलचे से पहियों के निचे से बर्फ हटाई गयी और यहाँ वहां से थोड़ी मिट्टी
खोद कर पहियों के आगे डाली गयी। टायर्स की कुछ ग्रिप बनी तो गाड़ी आगे बढ़ी। आगे एक
दिल्ली नंबर की Fortuner गाडी बर्फ में
स्केटिंग करती हुई मिली। गाडी सीधा ट्रैक छोड़ रास्ते पर गोल गोल घूम रही थी जैसे
परिक्रमा कर रही हो। ड्राइवर काफी अनाड़ी किस्म का प्रतीत हो रहा है। यहाँ प्रकृति
का सम्मान ना करते हुए वो अपनी गाड़ी के झोंक में ज्यादा लग रहा था। उसके मनोभाव
कुछ ऐसे लगे जैसे कह रहा हो की मेरे पास Fortuner है कोई छोटी मोटी गाड़ी नहीं, बर्फ इसका क्या बिगाड़ लेगी। लगता है कुदरत ने भी मेरी तरह
उसके मनोभाव पढ़ लिए थे और उसको परिक्रमा करवाने पर मजबूर कर दिया था। गाड़ी खाई की
तरफ जाती देख अंदर बैठे लोग चीख रहे थे.. ड्राइवर के भी हाथ पांव फूल गए थे। उसने
गाडी से बाहर कूद लगा दी। तुरंत एक स्थानीय ड्राइवर फिर से हरकत में आया और गाड़ी
को कण्ट्रोल किया। कैसे!? मैं देख कर भी
समझ नहीं पाया। बस इतना समझा की जहाँ जाओ वहाँ के नियमों का, कुदरत का, रहन सहन इत्यादि का पूरा सम्मान करो। अपने ये पैसों की अकड़
घर छोड़ कर जाओ तो ज्यादा अच्छा होगा। क्यूंकि कुदरत रिश्वत नहीं लेती।
पेंगोंग झील पहुँचे, अच्छी है पर इतना आकर्षण नहीं की उसके लिए कुर्बान हो जाया
जाये। शायद पहले भी आने की वजह से कम आकर्षक लग रही हो। जैसा की आपने इंटरनेट पर
फोटोज देखी होंगी, पानी बिल्कुल
वैसा ही है। एकदम साफ... रंग बदलता हुआ... कभी हरा कभी नीला... चारों तरफ पहाड़...
नीला और साफ आसमान, जैसे किसी ने निल
का डिब्बा पानी में घोल कर सफ़ेद बादलों पर डाल दिया हो... अदभुत। फोटो खिंची...
लंच किया... 2 घंटे रुके...
वापिस चल दिए। बस! हाँ आखिर आप एक झील को लगातार कितनी देर देख सकते हो? शाम को 8 बजे रूम में पहुँचे है। बहुत अच्छा अनुभव रहा। यहाँ मैं फिर
से बता देना चाहता हूँ की यदि आप मेरे पेंगोंग झील के सामान्य वर्णन से खुश नहीं
हैं तो आपको ये बात समझ लेनी चाहिए की लदाख में कोई एक चीज देखने की नहीं है बल्कि
रास्ते ही खुद में देखने समझने और जीने के लायक हैं। आप इन रास्तों पर चल लिए मतलब
आप अच्छे से घूम लिए। अब कल श्रीनगर होते हुए वापिसी की तैयारी है। कारगिल-श्रीनगर
होते हुए जाने वाला रास्ता काफी अच्छा है। एक तो मैं पहले भी इस रास्ते से जा चुका
हूँ और दूसरा इस यात्रा का वर्णन कुछ ज्यादा ही लम्बा हो गया है। कोई स्थापित लेखक
ना होने की वजह से मेरे पास शब्दों की भी कमी है इसलिए अब आगे की यात्रा का वर्णन
मैं इस अध्याय में नहीं जोड़ूँगा। आगे की यात्रा को समझने को मैं आपकी स्वविवेचना
पर छोड़ता हूँ।
लेह - कारगिल - श्रीनगर - जम्मू - लुधियाना - अम्बाला -
पानीपत - रोहतक - रेवाड़ी।
आगे की यात्रा इस रूट से पूरी करते हुए हम 12 तारीख को (कुल 10 दिन) घर पहुँचे तो घर वालों की नाराजगी से
हमारा स्वागत हुआ। आने जाने में बाइक
ने कुल दूरी तय की 3000 किमी।