Wednesday, 29 November 2017

यात्रा वृतांत: लेह



 3 June 2017, यात्रा का पहला दिन

आपके पिछवाड़े में कभी कील घुसा है?
नहीं?
तो फिर आप मेरा दर्द नहीं समझ सकते.
मैं यहाँ मनाली के एक होटल में रात को 10.30  बजे जानी लिवर का ये डायलॉग याद कर के हँस भी रहा हूँ और जानी लिवर का दर्द भी समझ रहा हूँ. माफ़ करना जानी भाई जाके पैर ना फटे बिवाई वो क्या जाने पीड़ पराई. थोड़ा लेट ही सही पर आज बिवाई भी फटी और पीड़ भी जानी आपकी. काश आप आज कहीं मिले होते तो आप मेरा और मैं आपका दर्द साझा करते. क्या खूब जमता रंग जब मिल बैठते दो जख्मी पिछवाड़े.
625 किमी. और लगभग 13  घंटे बाइक चलाने के बाद जख्मी शब्द बहुत छोटा लग रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे तशरीफ काठ की हो गयी हो. अगर इसको किसी तरह निकाल कर दिवार पर टांग दिया जाये तो एक बार तो पिकासो की पेंटिंग भी फीकी पड़ जाये. पर अब कसम खा ली है जानी भाई, ये काठ की तशरीफ अब बार बार बाइक नहीं चढ़ेगी. 
मैं हमेशा कहता रहता था की मुझे घूमने की लत है. इसी लत ने आज मेरी ये हालत कर दी. तो इस बार रेवाड़ी से लेह अपनी बाइक से. मेरी बुलेट क्लासिक. नाम रखा है गुब्बी. गुब्बी!? ये कैसा नाम है. नाम के पीछे की स्टोरी फिर कभी परन्तु एक बड़ी ही आश्चर्यजनक बात ये है मेरी बाइक ने पहाड़ों में चलते हुए भी 45  किमी प्रति लीटर की एवरेज दी है. और ये सच है. आश्चर्यजनक इसलिए क्यूंकि जब बाइक ली थी तो मुझे इसकी टॉप एवरेज 35 किमी प्रति लीटर की बताई गयी थी. ये कैसे संभव मुझे अभी तक समझ नहीं आया है.
चलिए टूर की शुरुआत करते हैं. दरअसल आज सुबह से बाइक चलाने के अलावा कुछ किया ही नहीं तो आप लोगों को बताने के लिए भी कुछ खास नहीं है सिवाय एक नए रास्ते पर बाइक चलते हुए रेवाड़ी से सीधे मनाली तक आ पहुंचने के. तो यात्रा का पहला दिन चाइनीज पटाखे की तरह बिना बजे ही फुस्स हो गया. लगता है अब ये पटाखा कल फटेगा. असुविधा के लिए खेद है. थकान बहुत हो रही है. सामने दिवार पर घड़ी रात के 11 बजा रही है. नींद आ रही है रे बाबा. आओ फुस्सी पटाखे सोते हैं.



4 June यात्रा का दूसरा दिन
आज मैं पूरे दिन फ्री हूँ. कोई खास प्लान नहीं रखा है. कल की तशरीफ तोड़ यात्रा के बाद वैसे भी एक दिन का आराम करना जरुरी था. इन्ही सब विचारी के बिच कमरे में चाय आ गयी है. सुबह सब नहाना धोना करने के बाद किसी साइबर कैफे में जाकर पास बनवाना पड़ेगा. सुबह 9 बजे जब साइबर कैफे पहंचे तो सरकारी वेबसाइट पर पेमेंट गेटवे काम नहीं कर रहा था. जिसकी वजह से किसी का भी पास नहीं बन पा रहा था. रोहतांग दर्रे से आगे जाने के लिए ये पास बनवाना पड़ता है. ये पास नहीं होने पर आपको रोहतांग से वापिस भेज दिया जायेगा. अपने ही देश में इस तरह के पास का औचित्य मुझे आज तक समझ नहीं आया. ऊपर से इनको बनवाने में इतनी शर्तें जुडी होती है की एक पूरा दिन ऐसे ही बर्बाद हो जाता है. उधर पेमेंट गेटवे फेल्ड दिखा रहा था और इधर मैं बार बार पेज रिफ्रेश करे जा रहा था. तभी कोई चिल्लाया अरे वेबसाइट चल गयी है. मैंने जल्दी जल्दी सारी सुचना भरी और फॉर्म को सबमिट कर दिया. और यहीं मुझसे एक गलती हो गयी. जब बार बार डेट ऑफ़ ट्रेवल वाला कॉलम अपने आप आज की तारीख दिखने लग जाता था. जबकि मुझे जाना कल यानि 5 जून को था. जब फॉर्म सबमिट किया तो यात्रा की तारीख 5 की जगह 4 जून ही रह गयी. और इस तरह परमिट 4 जून यानि आज का ही मिल गया. मेरा परमिट तो 5 जून का ही मिला पर ये परमिट अजय का था. यानी एक बन्दे का 4 जून का और दूसरे का 5 जून का. अब इसमें ऐसा कोई जुगाड़ नहीं की इसको दोबारा अप्लाई किया जा सके. अब क्या करें? अजय रुआंसा हो आया. मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था. करीब आधे घंटे सोचने के बाद भी कुछ निर्णय नहीं हुआ. मैंने अजय को समझाया की तू आज निकाल जा और केलोंग में मेरा इंतज़ार करना. मैं कल तुझे वहां मिलता हूँ. पर उसने अकेले जाने के नाम से हाथ खड़े कर दिए. वो सिर्फ मेरे भरोसे ही घर से आया था. अकेले कहीं जा पाने लायक हिम्मत अभी जुटा नहीं पता है. शायद ये यात्रा होने के बाद कुछ परिपक्क्व हो सकेगा. फिर किसी ने बताया की अब एक ही रास्ता है. SDM ऑफिस जाकर SDM साहब से लिखवा लाओ की गलती से तारीख में गड़बड़ हो गयी है. उसके बाद जा सकते हो. पर आज तो इतवार है, मतलब कल सोमवार को सुबह 9 बजे तक अब कुछ और काम नहीं है करने को. थोड़ी चिंता होती रही. पता नहीं सरकारी अधिकारी है, लिखेगा की नहीं. जा पाएंगे या नहीं. कहीं यहीं से ना लौटना पड़ जाये. धत्त तेरे की ये कैसी शुरुआत हुई? दोनों गुमसुम बैठे थे. और इसी तरह आधा घंटा बीत गया. आखिर मैंने चुप्पी तोड़ी, "अरे कुछ नहीं होगा, तू टेंसन ना ले. ऐसा करते हैं आज सोलंग वैली घूमने चलते हैं. कल SDM साहब नया परमिट बना देंगे तब चलेंगे."
ऐसी यात्राओं में आप एकदम से फिक्स प्लान नहीं बना सकते. और बनाने भी नहीं चाहिए. ऐसी यात्राएं अक्सर अनिश्चिताओं से भरी हुई होती हैं. इसलिए एक दो दिन तो हमेशा अतिरिक्त रखने ही चाहिए. अगर आप फिक्स प्लान कर बैठे और उसमे जरा सी भी गड़बड़ हुई तो दुःख होता है. और ये दुख आगे की यात्रा खराब कर सकता है.
वापिस लौटते हैं. वहीं पास में एक ढ़ाबे पर खाना खाया और 12 बजे तक सारी चिंताओं को पीछे छोड़ते हुए हम अजय की बाइक पर सवार होकर सोलंग की तरफ निकल चले. रास्ते भर भरी ट्रैफिक जाम था. बच्चों के स्कूलों की छुट्टियां खत्म नहीं हुई थी तो दुनिआ भर के लोग सपरिवार घूमने आये हुए थे. शिमला के बाद उत्तर भारतियों के लिए मनाली अब नया हॉट स्पॉट है. पर कुछ भी हो हम मैदानी इलाके वालों को पहाड़ों में घूमने की तमीज़ अब तक नहीं आयी है. सबको एक दूसरे से आगे निकलने की जल्दी, हॉर्न पे हॉर्न, गाड़ियों में तेज संगीत, मेकअप से रंगी पुती औरतें. उफ्फ. इतना सब काफी था मुझे चिढ़ाने के लिए. अगर कभी मैं बड़ा अफसर बना ऐसे खूबसूरत छेत्रों में गाड़ियों के हॉर्न पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दूंगा. किसी ने भी हॉर्न बजाय तो तुरंत गाड़ी जब्त. सोलंग आ गया.
सोलंग घाटी मनाली रोहतांग मार्ग मुख्य मनाली शहर से लगभग 13 किमी दूर है. अब खूबसूरत तो क्या कहें पर इसकी पैराग्लाइडिंग मुझे यहाँ खिंच लायी. काफी पुराण सपना - पैराग्लाइडिंग. आज जब इधर आ ही गए हैं तो ये भी कर ही डालें. आगे गए तो मैदान में पैरग्लाइडिंग करने के लिए २ स्थान निर्धारित किये गए थे. पहला स्थान एक साधारण ऊंचाई पर था जहाँ तक आपको पैदल चल कर जाना था और फिर वहां से ग्लाइडिंग करते हुए आना था. इसके विपरीत दूसरा स्थान अत्यधिक ऊंचाई पर बनाया हुआ था. वहां तक जाने के लिए रोपवे टैक्सी का इस्तेमाल करना था. फिर वहां से आपको ग्लाइडिंग करनी थी. ये ऊंचाई इतनी अधिक थी की निचे खड़े होकर देखते देखते ही मेरे पैर काँपने लगे. करूं या नहीं करूँ? आधा घंटा हो गया बैठे बैठे. निर्णय लेने में हो रही देरी का दूसरा कारन फीस की चिंता थी. छोटे वाले स्थान की फीस 1600 रु जबकि ऊंचाई वाले की 3200 रु थी. ये भी काफी ज्यादा थी. अजय से विमर्श करना बेकार था. वो पहले ही हाथ खड़े कर चूका था. काफी देर सोचा और फिर एक टिकट ऊंचाई वाले स्थान की ले ली. गाइड के साथ रोपवे में सवार हुआ. ग्लाइडिंग पॉइंट पर पहुंचा. ऊपर आसमान देखा. निचे जमीन देखी. पैर काँप गए. मन किया की मना कर दूँ. क्या बहन लगाऊं यार. ये कैसा शौक है भाई, पैसे भी दो और ....
पूरा सोचता उस से पहले गाइड लगभग खींचते हुए मुझे आगे ले गया. उसको देर हो रही थी तो किसी तरह के रहम के मूड में नहीं था. मेरे चारों तरफ रस्सी कसी गयी. जरुरी निर्देश दिए गए. दौड़ने को कहा गया. दौड़ पड़े. और फिर तो उड़ चले. जैसे ही चिनार के ऊँचे पेड़ों के ऊपर से ग्लाइडर ने उड़न भरी एक ठंडी बर्फीली हवा ने गलों पर थपकी देकर स्वागत किया. हवा में उड़ते ही जैसे सब कुछ शांत हो गया. सारा शोर शराब, डर, विचार कुविचार सब एक झटके में खत्म. ग्लाइडर सायं सायं हवा को चीरते हुए बर्फ से ढकी हुई चोटियों पर तैरने लगा. आह क्या अहसास था. इसका वर्णन करना कम से कम मेरे जैसे लेखक के बस की बात तो नहीं. लगभग 15 मिनट तक वैल्ली का चककर काटने के बाद जब मैं नीचे उतरा तो जिंदगी भर का बेहद खास अनुभव मेरे साथ जुड़ चुका था. अजय ने भी बाद में कम ऊंचाई वाली ग्लाइडिंग की और काफी खुश है. शाम होने से पहले ही हम वापिस आ गए. होटल के कमरे में बैठ कर रात के खाने का इंतज़ार हो रहा है. शानदार अनुभव के बाद यात्रा का दूसरा दिन समाप्त. 


5 June तीसरा दिन
सुबह जल्दी उठे और बैग पैक कर के बाइक्स पर लाद्द् लिया। मनाली से लेह की 490 किमी की दुरी तय करने के लिए हम मानसिक रूप से तैयार हैं. आज काफी लंबी यात्रा होने वाली थी तो सारा सामान ठीक से बांध दिया गया ... साथ ही बाइक का भी अच्छे से मुआयना किया गया। नाश्ता किया तब तक 9 बज चुके थे और SDM साहब अपने ऑफिस में समय से पहले ही पहुंच चुके थे। हमने जाकर अपनी व्यथा सुनाई तो उन्होंने तुरंत पास पर साइन कर दिए। धन्य हो SDM साहब आप। लगभग 9.30 बजे मेरी गुब्बी निकल पड़ी आगे के सफर के लिए। कहाँ रुकना है इसका कोई प्लान पहले नहीं किया गया था। जहाँ रात हो जायेगी वहीं रुक जायेंगे। मनाली शहर की भीड़ को चीरते हुए गुब्बी जल्दी ही खाली पहाड़ी रास्तों पर आ गयी। लगभग 2 घंटे में रोहतांग दर्रे पर पहला पड़ाव किया जहाँ पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ ने हमारा स्वागत किया। दर्रे से लगभग 5 km पहले से ही गाड़ियों का भयंकर जाम लगा हुआ था। पूछने पर पता चला सीजन के समय ये रोज की कहानी है। खैर बाइक कभी जाम में फसी है जो यहाँ फसती। कोई 15 मिनट रोहतांग पास पर रुक कर हम आगे को बढ़ चले। यहाँ से सफर का असली रोमांच शुरू होने वाला था। जैसे ही पास पार किया टूटे फूटे रास्ते और ढ़लान शुरू हो गयी। अब मैं पास को पार कर के निचे उतर रहा था। इसके साथ ही मनाली शहर का प्रभाव समाप्त हो चुका था। अब यहाँ से आगे वो खतरनाक रास्ता शुरू होता है जिसके लिए मनाली लेह हाईवे जाना जाता है। पहली बार पता चला की आप एक टूटी हुई और पथरीली पगडंडी को भी हाईवे कह सकते हैं। मुझे याद नहीं की रोहतांग पास से पाँग तक (लगभग 300 km) के एरिया में कहीं भी मैंने बाइक में तीसरा गेयर डाला हो। 2 घंटे में 15 km चलने के पश्चात खोकसार पहुंचा जहाँ अक्ष पहले ही इंतजार कर रहा था। वहाँ एक टेंट नुमा ढाबे पर रुक कर चाय पी और फिर उसके बाद खाना खाया। बाहर तेज बर्फीली हवा चल रही थी। सर्दी के मारे बुरा हाल था इसलिए खाना खाने के बाद फिर से एक चाय पी। सरकार चाय को राष्ट्रीय पेय घोषित क्यूँ नहीं कर देती। वैसे अघोषित रूप से तो है ही, मुझे नहीं लगता की इसपर किसी को आपत्ति होगी... अभी हाल ही में सुना था की खिचड़ी राष्ट्रीय खाना बनेगी, तो चाय राष्ट्रीय पीना क्यूँ नहीं बन सकती? । सर्दी इतनी ज्यादा थी की चाय चूल्हे से हाथ तक पहुंचते पहुंचते मीठे पानी में बदल जाती थी। ढाबे वाले ने बाहर छोटे छोटे टेंट लगा रखे थे... हमसे भी गुजारिश की कि आज रात उसके यहीं रुका जाये। किराया था 1200 रु। पर हमें आगे जाना था...सफर काफी लंबा था इसलिए राम राम बोल कर आगे बढे। यहाँ से आगे हरियाली जैसे एकदम खत्म हो गयी थी। पहाड़ों पर थोड़ी बहोत बर्फ के अलावा कुछ नहीं। यहाँ के पहाड़ों को अक्सर नंगे पर्वत बोला जाता है। आप अगर ये सोच रहे हों की अब मैं आपको ये बताऊंगा की चारों तरफ हरियाली से भरे हुए सुंदर नजारे थे तो आप ये बात अब आगे की सम्पूर्ण यात्रा तक भूल जाएँ। चारों तरफ पहाड़ ... उसके बिच में पथरीली घाटी.. एकदम संकरा एवं कच्चा रास्ता.. और उसपर मैं और मेरी गुब्बी। कहीं रास्ते के बिच में दलदल आती तो कहीं बर्फ के पिंघलने से पैदा हुआ पानी नाले के रूप में हमारा रास्ता रोकता रहा। किंतु दाद देनी पड़ेगी इस बाइक कंपनी की.. क्या जानदार बाइक बनायी है। ऐसा लगता है रॉयल enfiled ने जब Bullet डिज़ाइन की होगी तो वो लोग इस रास्ते का सर्वे करने आये होंगे। रास्ते में रुकते रुकाते जिस्पा पहुँचा तो शाम हो चुकी थी। ऐसी जगहों पर जहाँ किसी भी क्षण आपको मदद की जरुरत पड सकती हो किंतु कोशों दूर तक कोई मदद करने वाला दिखाई न दे...वहाँ अँधेरा घिरने से पहले कोई ठोर ठिकाना नहीं ढूंढा तो आफत आते देर नहीं लगती।  एक जगह टेंट लगे देखे तो रुक कर रात बिताने के बारे में पूछा। यहाँ भी 1200रु किराया था.. खाना अलग से। पर जगह इतनी सुंदर थी की 1200 रु गौण हो गए। चारों तरफ से बर्फीले पहाड़ों से घिरी घाटी में टेंट लगे हैं। बिल्कुल पास में ‘भागा’ नदी पुरे वेग से बह रही हैं। मैं अभी कुछ देर पहले नदी के किनारे थोडा टहल कर आया हूँ। भागा नदी को चेनाब के हमेशा साथ रहने वाली नदी कहा जाता है. चेनाब नदी दो उत्कृष्ट नदियों भागा और चंद्रा से मिलकर बनती है. भागा नदी भारत की तीसरी सबसे ऊंचाई पर स्थित झील ‘सूरज ताल’ से निकलती है. आगे बारा-लाच-ला आएगा जिसको हमें कल पार कर के आगे बढ़ना है, ये सूरज ताल वहीँ स्थित है. आज हम ये ही कोई 138 किमी चले हैं. अब आगे 352 किमी का सफर बचता है. खाना खाने के बाद अपनी मोटी रजाई में घुस कर आज दिन भर की यादों को डायरी में छिपा रहा हूँ। अभी लाइट नहीं है... जब लाइट आएगी तो bsnl का नेटवर्क आएगा उसके बाद मैं घर पर फोन कर सकूँगा। बाहर जनरेटर चल रहा है... तेज हवा टेंट के कपडे को उखाड़ने को आतुर है... हवा की सांय सांय मुझे टेंट के अंदर भी साफ सुनाई दे रही है। टेंट में पाइप से लटका हुआ बल्ब लगातार हिल रहा है जिस से लिखने में थोड़ी परेशानी हो रही है। किसी भुतहा फिल्म में प्रयोग करने के लिए एकदम सम्पूर्ण माहौल है। पर मेरे लिए माहौल डरावना कम और खूबसूरत ज्यादा हो गया है। एकांत पसंद आदमी के लिए इस से ज्यादा एकांत कहाँ होगा। शब्दों में बयान नहीं किये जा सकने वाले अनुभव के साथ यात्रा का तीसरा दिन समाप्त। 

6 Jun यात्रा का चौथा दिन
अगर रूट मैप के हिसाब से बात की जाये तो आज शाम को हमने सरचू में रुकने का प्लान किया हुआ था। जिस्पा से सरचू 113 km है। सारी तैयारी कर के 6.30 बजे सुबह हम आगे बढ़ चुके थे। मनाली से कैन में भर कर लाये हुए पेट्रोल से टँकी फुल कर ली थी। शुरू में कुछ देर थोडा ठीक ठाक रास्ता आया। मनाली लेह हाईवे पर रोहतांग से सरचू के बीच में जहाँ भी तीसरा गेयर लग जाये आप उसको ठीक ठाक रास्ता मान सकते हो। रास्ते में कहीं हल्की धुप मिलती तो कहीं अचानक से गहरी धुंध के साथ तेज बर्फीली हवा। मौसम यहाँ क्या गुल खिलाता है इसका पता मुझे तब चला जब बारा-लाच-पास ( Bara- lacha-la) पहुंचे। पास पार करने के लिए 16500 फीट की ऊंचाई पार करनी थी। बारा-लाच पास झंस्कार रीजन में एक ऊंचाई पर स्थित दर्रा है जो हिमाचल के लाहौल और जम्मू कश्मीर के लद्दाख को आपस में जोड़ता है. दर्रे पर चढ़ने से पहले धुप खिली हुई थी। जैसे जैसे ऊंचाई पर चढ़ता गया ठण्ड अपना प्रकोप दिखाने लगी। तीन तीन जोड़े मोटे ऊनी कपड़े पहनने के बावजूद हाड़ काँप रहे थे। रोड के दोनों तरफ ये ऊँची ऊँची बर्फ जमी हुई थी। BRO ने अभी अभी बर्फ काट कर रास्ता बनाया था। कुछ और ऊपर पहुँचा तो बर्फ पड़ने लगी (snowfall).. देख कर अत्यंत हैरानी हुई पर हमेशा snowfall देखने की इच्छा पर खुशी से ज्यादा डर हावी रहा। यहाँ एक बात मैं आपको बता दूँ की फोटो में बर्फ गिरना और बर्फ से ढके हुए पहाड़ चाहे जितने सुंदर लगते हों पर हकीकत में जब ये अपने होने का अहसास कराते हैं तो इतनी सर्दी में भी पसीना आ जाता है। जब टॉप पर पहुंच तो जाम लगा हुआ था। जाम..! यहाँ भी? दरअसल ये रास्ता एकदम सिंगल लेन है (सिंगल भी मिल जाये तो बहोत बड़ी बात है), एक ट्रक जो ऊपर से आ रहा था एक तीव्र मोड़ पर ठीक से मुड़ नहीं सका। रास्ते के दोनों तरफ जबरदस्त बर्फ जमी होने के कारण आगे पीछे होने में भी समस्या थी। कुछ लोग यहाँ वहाँ बर्फ में अपनी गाड़ियाँ घुसा कर ट्रक को निकलवाने की मशक्कत कर रहे थे। गुब्बी को भी एक कोने में लगवा दिया गया। मैंने मौका देख कर मोबाइल निकाला और एक छोटी सी विडिओ बना ली ... उस हालत में जेब से मोबाइल निकालना और फिर दस्ताने निकाल कर विडिओ बनाना अपने आप में किसी अवार्ड विनिंग बहादुरी से कम नहीं था। सड़क किनारे जमी हुई बर्फ पर चढ़ा तो निचे एक नीले रंग की पानी की झील दिखाई दी। झील रोमाँच से रोंगटे खड़े कर गयी. कहीं ये ही तो सूरज ताल नहीं जहाँ से भागा नदी निकलती है? मैंने सिर्फ पढ़ा था और कोई जानकारी नहीं थी. बाद में पता चला की सूरज ताल वहां से कोई 1 किमी की दुरी पर है. ठण्ड की वजह से झील पूरी तरह जमी हुई थी। लगता है snowfall अभी शुरू ही हुआ था क्योंकि झील के पानी का रंग अभी दिख रहा था नही तो शायद बस सफेद चादर दिखाई देती। थोड़ी देर में ट्रक निकला तो हम भी निकल गए। इन रास्तों पर चलने के दौरान कई बाइकर्स मिले ... जो थोडा बहुत आगे पीछे दिखते रहते। लगभग सभी से एक अनकही से दोस्ती हो गयी। ये दोस्ती शायद समय की जरुरत रही होगी। वैसे भी स्वार्थपने में इंसान अभी तक सबसे आगे है। सबको एक दूसरे से आगे आने वाले सफर में शायद किसी तरह की मदद की दरकरार थी। दोस्ती की इसी दरकरार में एक बाइक जिस पर 2 लोग सवार थे पता नहीं कब हमारे साथ साथ हो लिए। उन्होंने अजय के साथ नाम पते वाली अच्छी दोस्ती भी कर ली। खैर एक से भले दो... हमें इसमें क्या नुकसान होना था। इन रास्तों पर कब कोई आगे निकल जाता और कब कोई पीछे रह जाता कुछ पता नहीं चलता। इन्ही विचारों में खोया हुआ मैं चला जा रहा था तो सामने एक नाला आ गया। बर्फ का पानी ऊपर से पिंघल कर रोड से बहता हुआ निचे खाई में गिर रहा था। ऐसे कई नाले मैं पार कर के आ चुका हूँ किन्तु ये काफी चौड़ा और गहरा था। पानी का वेग भी काफी था। आस पास नजर दौड़ाई... सिवाय गहरी धुंध के कोई दिखाई नहीं दिया। सोचा अजय का इंतजार करता हूँ... क्या पता यहाँ से निचे बह गया तो! कोई बचाने वाला भी नही है। करीब 5 मिनट इंतज़ार किया... कोई नहीं आया... अजय का पता नहीं था आगे निकल गया या पीछे है। ऐसे इतनी ठण्ड में कितनी देर रुकेगा? चल फिर चलते है, कुछ नहीं होगा। बाइक आगे बढ़ाई .. टायर पानी में घुसा तो घुसता ही चला गया। मतलब पानी गहरा था। ऐसे में अगर रेस ढीली छोड़ दी तो साइलेंसर में पानी जा सकता है ये सोच कर थोड़ी रेस बढ़ाई। एक पाँव अब तक पानी में जा चुका था... किन्तु पानी इतना गहरा था की पांव जमीन पर लग नहीं रहा था। रेस बढ़ाने और बाइक की स्पीड कम रखने की आपाधापी में आगे वाला टायर पानी में छुपे हुए किसी बड़े पत्थर से टकराया। जिस से संतुलन खराब हुआ और इस से पहले मैं पानी में गिर कर यमराज के दर्शन करता मैंने फुर्ती से बाइक को पकडे पकडे निचे जम्प लगा दी। निचे कूदने के बावजूद मैं गिरा नहीं और दोनों हाथों से कस कर बाइक को पकडे रहा। अब मैं घुटनों तक पानी में था किन्तु ऐसी स्तिथि में भी सेल्फ कण्ट्रोल ऐसा रहा की बाइक की रेस छोड़नी नहीं है ये बराबर ध्यान रहा। पहला गेयर लगी हुई बाइक चालू हालात में थी तो फिर बाहर निकलने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई। शरीर पहले से ही सुन्न था तो ठन्डे पानी का एकदम से अहसास नहीं हुआ। परन्तु बाहर निकलने के बाद हाथ पैर बाइक चलाने की हालत में नहीं रहे। ऐसा लग रहा था की जूते के अंदर शायद पैर अब तक गल चुके हैं। धीरे धीरे आगे बढ़ना चालू रखा.. रुकने का तो वैसे भी कोई फायदा नहीं था। थोड़ी दूर चला तो BRO का रोड का काम चल रहा था। वहाँ काम करने वाले वर्कर्स ने हल्की आग जला रखी थी। मैंने बाइक रोकी, अपनी सारी ताकत इकट्ठा की और किसी तरह बाइक से आग तक पहुँचा। मुझे लगता है अब तक के जीवन में मेरा शरीर इतना ठंडा कभी नही हुआ। पैर घसीटते हुए आग के पास पहुँचा.. पास क्या यूँ कहिये की आग के ऊपर पहुँचा। जूते दस्ताने सब उतार कर फेंके और हाथ सीधे आग पर रख दिए। आग भी काफी धीमी थी क्यूंकि ऐसे बियाबान में आग में जलाने को कुछ उपलब्ध नहीं था, जो था वो सब गीला था। मेरी हालत देख कर एक लड़का दौड़ कर कहीं से एक बोरी उठा लाया और उसको आग में डाल दिया। पहाड़ों का शहरीकरण भले ही होने लगा हो लेकिन पहाड़ी लोगों ने आत्मयिता नहीं खोयी है। इनके लिए पहाड़ घूमने आने वाला हर आदमी इनका अपना है। आग में सिकने के वो 15 मिनट जैसे नया जीवन दे गए। सुबह से नाले पार कर कर के बैग में रखी हुई सारी जुराबें और दोनों जोड़ी जूते गीले हो चुके थे। कपड़े जूते सूखे तो नहीं किन्तु मेरे अंदर आगे बढ़ने का नया उत्साह आ गया। दर्रे से निचे उतरे तो आगे मौसम थोडा खुला हुआ मिला। हवा लगने से कपडे कुछ सूखने से लगे थे। उबड़ खाबड़ रास्तों से होते हुए 11.30 बजे सरचू पहुँचा तो थोड़ी देर में अजय और नए साथी भी आ मिले। हिसाब लगाया तो करीब 5.30 घंटे में 110 km चले थे जो काफी सही दुरी मानी गयी। वहीँ एक ढाबे पर रुक कर चाय पी और फिर लंच भी किया। घड़ी पर नजर दौड़ाई.. 12 बजे हैं, मतलब अभी 6 घंटे और चल सकते हैं। आस पास नजर दौड़ाई तो सिवाय दो चार ढ़ाबे के सरचू में और कुछ था ही नहीं। बस चारों तरफ वही पहाड़ जो इतने दिनों से साथ चले आ रहे थे। मंत्रणा हुई... क्या करें? किसी को थकान हुई? तय हुआ की खाना खाने के बाद सब तरोताजा हैं, समय काफी है और साथ ही  80 km चलने के बाद बहोत अच्छा रोड भी आ जायेगा। तो फिर चलते हैं.. मंजिल के जितना नजदीक पहुंचा जाये अच्छा है। लो जी एक बार जो यहाँ से चले तो पीछे मुड़ कर नहीं देखा। फिलहाल कुछ दूर रोड ऐसा था की बाइक 50 की स्पीड पर चल रही थी। पाँग पहुँचने से पहले रास्ते में हम गाटा लूप से गुजरे. गाटा लूप अपने 22 तीव्र और तेज घुमावदार रास्तों के लिए जाना जाता है. एक के बाद एक 22 तेज मोड़ पार होते गए और ऊपर चढ़ते गए. अजय कहीं पीछे रह गया था. बाद में पता चला की ऐसे ही एक तेज मोड़ पर वो थोड़ा असावधान हो गया था और बाइक से गिर गया था. बाइक राइडिंग के पुरे सुरक्षा उपकरण पहने होने की वजह से चोट नहीं आयी थी. बस हाथ में थोड़ा झटका लगा था. आगे एक छोटे से तम्बू पर चाय पिने के लिए रुका. वहीँ एक ट्रक देखा जिसमे तीन बाइक रखी हुई थी. ट्रक मनाली की तरफ जाने वाला था. पूछने पर पता चला की कुछ लोग जो नेट पर देख पढ़ कर जोश में मनाली लेह जाने के लिए बाइक से आये थे अब यहाँ तक आते आते हिम्मत हार चुके हैं और इस ट्रक को किराये पर बुक कर के मनाली वापिस जा रहे हैं. ऊँचाई और खराब रास्ते की वजह से सही सलामत ये यात्रा पूरी कर लेना वाकई टेढ़ी खीर है. जिसने पहले कभी छोटी मोटी पहाड़ी यात्रा बाइक से नहीं की हो उसको सीधे इस रास्ते पर नहीं आना चाहिए. आगे नक्की पास (Nakee La) आया जिसकी ऊंचाई 15,547 फीट है. पर यहाँ बर्फ नहीं थी और रास्ता भी ठीक था. कुछ देर बाद एक और ऊँचे पास ने स्वागत किया. लाचुंग पास (Lachulung La) ऊंचाई 16,616 फीट. यहाँ बादल घिरे हुए थे. धूप बिल्कुल नहीं थी. आस पास की चोटियां दिखाई नहीं पड़ रही थी. ठंडी हवा के साथ ऊँचाई अपना रोब बराबर जमाये हुई थी. रास्ता इतना खराब था की बाइक चलाने का शौक नहीं होता तो यात्रा काफी उबाऊ होने वाली थी। पूछने पर बताया गया था की पाँग तक रास्ता ऐसा ही है उसके बाद मस्त हाईवे स्टार्ट होगा। सुबह से चले और ये पाँग न आकर दे रहा था। खीज होने लगी। जाने से पहले एक ब्लॉग पढ़ा था की लद्दाख रीजन का इस तरह से घूमने के हिसाब का माहौल कुछ ऐसा है की आदमी जल्दी खीज जाता है। कितना जल्दी ये नहीं लिखा था। तो मैं हिसाब नहीं लगा पाया की मैं जल्दी खीजा या टाइम के अनुसार... या कहीं खीझने में लेट तो नहीं हो गया। अपने आप से उट पटांग बातें करता हुआ आखिर शाम के 4 बजे पाँग पहुँचा। अजय और नए साथी पहले से मौजूद थे, जब तक मैं वहाँ पहुंचा वो अपना चाय पानी खत्म कर चुके थे। मेरी खास इच्छा नहीं थी तो कुछ देर रुक कर बाइक को आगे की तरफ हेंच दिया। और यहाँ से शुरू होता है वो रोड जिसकी प्रतीक्षा सुबह से थी। माशाअल्लाह... अल हबीबी ... वाह गजब ... क्या सड़क है। मन ऐसे ही अजीब अजीब से नारे लगाने लगा। बाइक 100km प्रति घंटा की रफ्तार पकड़ चुकी थी। जैसे फोटो में देखते हैं ना एकदम सीधी रोड, चारों तरफ सुंदर पहाड़ीयाँ, घाटी में चरते हुए याक और पहाड़ी भेड़ें, चरवाहे, थोडा बहता हुआ पानी .. वाह.. एकदम वैसा ही नजारा पहली बार देखने को मिला। लेह यहाँ से अभी भी 180 km दूर है और समय है लगभग 2 घंटे। हम लोग चाह रहे थे की आज सीधा लेह ही पहुंच जाते हैं.. यात्रा का एक दिन बचा सकते है.. प्राइवेट नौकरी रे बाबा। अगर बाइक ऐसे ही भागती रही तो लेह पहुंचना कोई ज्यादा बड़ी बात भी नही। 60 km कब निकले पता नहीं चला। आगे चला तो तेज बर्फीली हवाएँ टकराने लगी। सामने एक बड़ा पहाड़ दिखाई दे रहा था जो बर्फ से पूरा ढका हुआ था। शायद उसी बर्फ की वजह से इतनी ठंडी हवा है.. पर इतनी तेज क्यूँ है, तूफान के जैसे.. हेलमेट उड़ने लगा। पहाड़ नजदीक आता जा रहा था.. हवा हल्की सी कम हुई पर लगा की जैसे गुब्बी थोडा धीरे हो गयी है। मीटर पर नजर गयी.. स्पीड 65। ऐसे कैसे? ऐसी कैसी हवा है भाई जो 350 cc बाइक को 100 से 65 पर ले आई? रेस पूरी मरोड़ीनी चाही तो हैरानी हुई देख कर की रेस तो पहले से ही पूरी मरोड़ी हुई है। पहाड़ और नजदीक आया ... रेस और डाउन हुई....40 की स्पीड पर गुब्बी। ये क्या हो रहा है। गुब्बी पहाड़ चढ़ रही थी.. स्पीड 35... फिर 30... और आखिर में 20 । क्या गुब्बी खराब हो गयी है! वो भी ऐसे बियाबान में! और मुझे तो ठीक करनी भी नहीं आती। सोच कर मेरे पांवों के निचे से जमीन खिसक गयी। तभी कुछ दूर आगे जाते हुए अजय पर निगाह पड़ी, वो भी काफी धीरे लग रहा था। पर ये समस्या का समाधान नहीं था। मेरी प्यारी गुब्बी ये तूने क्या किया। मैंने तेरा इतना भरोसा किया और तूने उसका ये सिला दिया। मेरे प्यार में क्या कोई कमी रह गयी थी जो तू खराब हुई वो भी यहाँ ..! दूसरे गेयर में 18-20 की स्पीड से आगे बढ़ने के अलावा कोई दूसरा आप्शन नहीं था। धीरे धीरे बढ़ती हुई गुब्बी दिए के बुझने से पहले फड़फड़ाने टाइप की फीलिंग दे रही थी। खैर फड़फढ़ाती हुई गुब्बी जब पहाड़ के टॉप पर पहुंची तो एक बड़ा सा Welcome बोर्ड लगा हुआ था।
"Welcome at Thanglang-La" 
Height 17580 Feet
बोर्ड देखते ही मुझे किसी का लिखा हुआ ब्लॉग याद आ गया जिसमे लिखा था की कैसे यहाँ चढ़ते समय अच्छी अच्छी गाड़ियाँ भी हाँफने लग जाती है। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। गुब्बी खराब नही हुई थी, ये जगह ही ऐसी थी। पहाड़ चढ़ते समय अहसास नहीं हुआ की चढ़ाई कैसी है। मैंने खुशी से गुब्बी को चूमा और इसकी मस्त पोज बना बना कर कुछ फोटो भी खींची। पूरी यात्रा में फोटो बहोत ही कम खिंची गयी थी अब तक। जाने क्यूँ। उसके बाद तो फिर जो भागे तो 7 बजे लेह पहुंच कर ही रुके। एक घंटा सस्ता सा होटल ढूंढने में लग गए। आज पहाड़ में 500 km बाइक चलाने के बाद अब बिना खाना खाये कपडे बदल कर रजाई में घुस कर दिन भर का अनुभव लिख रहा हूँ। कपडे सारे गीले हैं इसलिए जो कम गीले थे वो पहन लिए हैं। आज का अनुभव ये कहता है की मैं आपको बोलूँ की हर आदमी को मरने से पहले जिंदगी मे कम से कम एक बार मनाली लेह की यात्रा बाइक से जरूर करनी चाहिए। यहाँ बहोत से ऐसे मौके आते हैं जब आपको ये लगता है की अब मरे की तब मरे.. या ये कहाँ फस गए यार। अच्छे से अच्छा नास्तिक भी यहाँ आस्तिक बन जाता है... भगवान से दुरी कुछ कम जो हो जाती है। मैं तो बोलता हूँ की अपने बच्चों को डांस क्लास, पेंटिंग क्लास टाइप की जगहों पर ना भेज कर उनका surviving skill बढाइये। उनको छुई मुई मत बनाओ.. भेजो उनको ऐसी जगहों पर जहाँ उनको सिखने को मिले की जिन्दा कैसे रहा जाता है। विपरीत परिस्थितियों में शांत कैसे रहा जाता है। लगता है मैं ज्यादा ज्ञान दे रहा हूँ। वैसे भी लिखने वाले को अपने लिखने के काम से मतलब रखना चाहिए। आज के इस जिंदगी भर ना भूल सकने वाले अनुभव के साथ इति समाप्ति। लेह से शुभ रात्रि। 

7 Jun पाँचवा दिन 
आज हम कहीं नहीं गए। सुबह उठने के बाद थोडा यहाँ वहाँ पैदल घूमे बाद में नुब्रा और पेंगोंग लेक जाने के लिए परमिट बनवाने में लग गए। अब तक की यात्रा का ये दूसरा परमिट था। मुझे ये बात आज तक समझ नहीं आई की भारत में घूमने के लिए भारतियों को ही परमिट क्यूँ बनवाना पड़ता है? और इसको बनाने की प्रक्रिया इतनी जटिल की एक पूरा दिन बर्बाद हो जाये। घूमने आने वालों के लिए इस तरह एक जगह बैठकर पूरा दिन बर्बाद कर देने की कीमत को शायद सब लोग नहीं समझते। और वैसे भी परमिट जब सबको मिल ही जाता है तो इस सारी excercise का मतलब क्या था भाई? आपको फीस चाहिए... या आपको ऊपर जाने वाले लोगों की गिनती करनी है, तो ये सब तो रास्ते में एक चेक पॉइंट बनाने भर से भी हो जायेगा। इस बात पर किसका इस्तीफा माँगा जाये ये अभी तक तय नहीं हुआ है ..... होते ही दूसरी किताब के जरिये आप लोगों तक पहुँचा दिया जायेगा। वैसे आज मेरा नुब्रा घाटी जाने का मन था पर पता चला की खारदुंग-ला पर चटटान खिसकने और भारी बर्फबारी से रास्ता बंद था। अजय तो वैसे भी वहाँ नहीं जाना चाहता था, अब मेरा भी प्लान कैंसिल हो गया। एक जान पहचान के कर्नल साहब लेह में तैनात थे। घर से चलने से पहले उनसे बात हुई थी और बताया था की 7 को लेह पहुचेंगे। पर रास्ते में नही रुकने की वजह से हम एक दिन पहले ही आ गए थे। इसलिए पिछली रात को हमने उनको फोन ना कर के होटल में रुकना बेहतर समझा। परमिट बनवाने के पश्चात उनको फोन किया तो उन्होंने तुरंत अपना पता दिया और कुछ देर में हम उनकी यूनिट में मेहमान बन कर पहुंच गए। खूब खातिरदारी हुई। कई दिनों बाद गर्म पानी से अच्छे से नहाये और घर जैसे स्वाद का खाना खाया। लंच कर के अजय अपनी बाइक की सर्विस करवाने चला गया। मैं रूम में क्या करता... लेह घूमने के इरादे से बाहर निकला तो गुब्बी पिछले पहिये से पंचर हुई उदास सी खड़ी थी। यहाँ वहाँ देखा तो जमीन में काफी सारी कीलें पड़ी हुई थी। पास में ही आर्मी के जवान लकड़ी का कुछ ढांचा सा बना रहे थे। गुब्बी भी इन्ही कीलों की साजिश का शिकार हो गयी थी। मुझे गुब्बी पर बड़ी दया आई, कोई नहीं बीबा इतने लंबे सफर के बाद एक पंचर तो बनता भी है। यहाँ मैं आपको बताना चाहूँगा की यात्रा पर जाने से पहले मैंने अपनी बाइक के टायर्स को ट्यूबलेस नहीं करवाया था। मुझे इस तरह का बिल्कुल भी अंदेशा नहीं था की आगे क्या हो सकता है। ज्यादा से ज्यादा पंचर हो जायेगा तो खुद ही बना लूँगा सोच कर एक पंचर किट जरूर खरीद ली थी। परन्तु जिस प्रकार की परिस्थितियों से मैं गुजरा वैसे में पंचर बनाना तो दूर अगर सेल्फ ना हो तो बाइक में लगातार 2 किक भी ढंग से ना लगे। इसलिए आप सभी के लिए एक सलाह ये ही है की यहाँ आने से पहले बाइक के टायर्स को ट्यूबलेस करवाना बहुत जरुरी है। साथ ही एक एक अतिरिक्त क्लच वायर, रेस वायर और ब्रेक वायर पहले से ही बाइक में डलवा लें तथा बाइक के ब्रेकडाउन के बारे में डिटेल में जानकारी ले कर ही आएं। सलाह के बाद वापिस साइट सीन पर लौटते हैं। पंचर की दुकान वहाँ से 6 km दूर थी। गुब्बी पर बैठ कर धीरे धीरे वहाँ पहुँचा और पंचर बनवा लिया। दिन के 4 बजे थे। थोडा लेह शहर देख लेते हैं। वहाँ से मॉल रोड, शांति स्तूप और थोडा दायें बाएं का चक्कर लगा कर 7 बजे रूम में पहुँचा। पहुंचते ही सबसे पहला काम ये लिखने का कर रहा हूँ। इस से पहले दिमाग में विचारों की गुथ्म गुत्था हो इनको ताजा ताजा डायरी में लिख देना ही ठीक रहता है ... ना रहेंगे विचार न होगी गुथ्म गुत्था।  कल पेंगोंग लेक जाने का विचार है। सही पूछें तो जब आप यहाँ बाइक से आते हैं तो कुछ देखने की बजाय बाइक चलाना ही अपने आप में घूमना है। जो असल देखने की चीज थी वो मैं अच्छे से ना सिर्फ देख चुका हूँ बल्कि जी भी चुका हूँ .... मनाली लेह हाईवे, NH 3 ..।

8 Jun यात्रा का छठा दिन
रात अजय लेट आया था। उसकी बाइक में कुछ प्रॉब्लम थी तो पूरी सर्विस करवानी पड़ी। अच्छा ही किया, ऐसी जगहों पर रिस्क नहीं लेकर समय पर देखभाल कर लेनी चाहिए। आया तो कहने लगा कल पेंगोंग तो चलेंगे पर बाइक से नहीं जायेंगे। क्यूँ भाई? दलील दी की काफी दिन से लगातार बाइक चला रहे हैं इस से ये नुकसान हुआ की सारा ध्यान बाइक चलाते हुए आगे सिर्फ रोड पर ही रहता है। आस पास कुछ देख ही नहीं पाते। ऐसा करते हैं टैक्सी से चलेंगे, आराम से पैर पसार कर बैठेंगे और खूब फोटो खिंचते हुए जायेंगे। वैसे भी अभी वापिस जाने के लिए भी काफी बाइक तो चलानी ही है। आइला, इस एंगल से तो मैंने सोचा ही नहीं। मुझे ये स्कीम बड़ी अच्छी लगी। मैंने बोला इतनी सर्दी में तेरा दिमाग जमा नहीं? अभी भी बड़ा सही चल रहा है भाई। तारीफ सुन कर उसने दूसरा पत्ता फेंका, बोला "देख अगर अलग से टैक्सी लेंगे तो 8 हजार रु लगेंगे। इसलिए मैंने 3 और लोगों का ग्रुप देख लिया है तो अपना हिस्सा आधा।" "वाह मेरे चीते। तू तो बड़ा दिमाग चलाने लगा। लेह की हवा में ही कुछ फर्क है क्या?" अगले दिन हम एक स्कोर्पियो टैक्सी में बैठ कर घूमने को निकल पड़े। बाकि तीन लोग पहले से ही गाड़ी में बैठे थे। तीनों लड़के गुड़गांव की किसी आईटी कम्पनी में काम करते हैं। बातें चल निकली तो उनकी Frustration खुल कर सामने आ गयी। बेचारे बड़े परेशान थे अपने टूर से। इतने की वापसी की फ्लाइट टिकट मंगलवार को थी मगर वो रविवार को ही वापिस लौट जाना चाह रहे थे। उनकी घूमने की सब इच्छा पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी। मेरे लिए ये सुनना एक आम बात थी। दरअसल अपेक्षाकृत कम घुम्मकड़ी के शौकीन लोग जब लद्दाख आते हैं तो ज्यादातर को पहली नजर में ये जगह पसंद नहीं आती है। ये उसका ही नतीजा है। यहाँ तक की कल तो मुझे एक टूरिस्ट से सुनने को मिला की "I think Ladakh is an over rated place." लेकिन जिसको ये जगह पसंद आ गयी वो फिर यहीं का हो कर रहा जाता है। मुझे एक लड़का मिला जो 7 बार लदाख आ चुका है। मैं खुद 3 बार आ चुका हूँ। रास्ते भर वो लोग खीजते रहे, एक लड़का तो लगातार एयरलाइन कम्पनी से फोन पर जुड़ा हुआ था की जैसे भी कर के उनकी फ्लाइट 2 दिन पहले कर दी जाये, इसके लिए वो अतिरिक्त पैसे देने को भी तैयार थे। चलो छोड़ो खीजने वाले लोगों को इस से ज्यादा स्पेस देना भी ठीक नहीं है। 
ये टैक्सी से आने वाला प्लान यहाँ मुझे बहोत पसंद आया। रास्ते भर फोटो खिंचता हुआ आया। जब आप ऐसी जगहों पर हर छोटी बड़ी चीज़ की खचर खचर फोटो खींचने लग जाते हो तो स्थानीय लोग तुरंत समझ जाते हैं की मार्किट में लौंडा नया आया है। अच्छा ये स्थानीय लोग भी गजब के आत्म नियंत्रण वाले लोग होते होंगे। हर रोज सैकड़ों लोग इनको बर्दाश्त की हद तक तंग करते हैं फिर भी ये अपने काम को शांति पूर्वक चलायमान रखते हैं। कितने भावविहीन चेहरे हो गए हैं इनके। जिनकी जिंदगी निकल गयी भाव दर्शाते दर्शाते अब बेचारे भावविहीन नहीं होंगे तो क्या होंगे। पेंगोंग के रास्ते में कारु गांव से थोड़ा आगे चढ़ाई शुरू हो गयी. लगभग आधा घंटे चले और ये लो जी.... एक और ऊँचा दर्रा आपका स्वागत करेगा. नाम है चांग पास (Chang -La). ऊँचाई के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे ऊँचा मोटरेबल रोड 17590 फीट. रास्ते भर सड़क पर बर्फ की मोटी और कठोर पर्त जमी हुई थी। वाहनों के चलने से बर्फ चिकनी भी गयी थी जिस से वाहन फिसल रहे थे। कुछ बाइक वाले जो आजु बाजु चल रहे थे उनको कई कई बार फिसल कर गिरते हुए देखा। बाइकर्स जमीन पर पैर रखते हुए 5km की रफ़्तार से चल रहे थे। बाइक को लगभग खींचना पड़ रहा था जिसकी थकान उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी। यहाँ गाड़ियों के पहियों में लोहे की मोटी जंजीर बंधी हुई थी जिस से की टायर बर्फ पर फिसले ना। निचे खाई में कुछ ट्रक फिसल कर गिरे पड़े थे। लग रहा है ये ट्रको की कब्रिस्तान होगी। सामने देखा तो आगे चल रहा है एक बड़ा ट्रक फिसलते हुए खाई की तरफ बढ़ने लगा, मैं शून्य में ताकता रह गया। जब वापिस लौटा तो देखा कई स्थानीय ड्राइवर ट्रक को बर्फ से बचा कर वापिस मेन रास्ते पर लाने में लगे थे। हमारी टैक्सी का ड्राइवर भी। मुझे पता ही नहीं चला वो कब उतर कर उस तरफ दौड़ पड़ा था। बेलचे से पहियों के निचे से बर्फ हटाई गयी और यहाँ वहां से थोड़ी मिट्टी खोद कर पहियों के आगे डाली गयी। टायर्स की कुछ ग्रिप बनी तो गाड़ी आगे बढ़ी। आगे एक दिल्ली नंबर की Fortuner गाडी बर्फ में स्केटिंग करती हुई मिली। गाडी सीधा ट्रैक छोड़ रास्ते पर गोल गोल घूम रही थी जैसे परिक्रमा कर रही हो। ड्राइवर काफी अनाड़ी किस्म का प्रतीत हो रहा है। यहाँ प्रकृति का सम्मान ना करते हुए वो अपनी गाड़ी के झोंक में ज्यादा लग रहा था। उसके मनोभाव कुछ ऐसे लगे जैसे कह रहा हो की मेरे पास Fortuner है कोई छोटी मोटी गाड़ी नहीं, बर्फ इसका क्या बिगाड़ लेगी। लगता है कुदरत ने भी मेरी तरह उसके मनोभाव पढ़ लिए थे और उसको परिक्रमा करवाने पर मजबूर कर दिया था। गाड़ी खाई की तरफ जाती देख अंदर बैठे लोग चीख रहे थे.. ड्राइवर के भी हाथ पांव फूल गए थे। उसने गाडी से बाहर कूद लगा दी। तुरंत एक स्थानीय ड्राइवर फिर से हरकत में आया और गाड़ी को कण्ट्रोल किया। कैसे!? मैं देख कर भी समझ नहीं पाया। बस इतना समझा की जहाँ जाओ वहाँ के नियमों का, कुदरत का, रहन सहन इत्यादि का पूरा सम्मान करो। अपने ये पैसों की अकड़ घर छोड़ कर जाओ तो ज्यादा अच्छा होगा। क्यूंकि कुदरत रिश्वत नहीं लेती। 
पेंगोंग झील पहुँचे, अच्छी है पर इतना आकर्षण नहीं की उसके लिए कुर्बान हो जाया जाये। शायद पहले भी आने की वजह से कम आकर्षक लग रही हो। जैसा की आपने इंटरनेट पर फोटोज देखी होंगी, पानी बिल्कुल वैसा ही है। एकदम साफ... रंग बदलता हुआ... कभी हरा कभी नीला... चारों तरफ पहाड़... नीला और साफ आसमान, जैसे किसी ने निल का डिब्बा पानी में घोल कर सफ़ेद बादलों पर डाल दिया हो... अदभुत। फोटो खिंची... लंच किया... 2 घंटे रुके... वापिस चल दिए। बस! हाँ आखिर आप एक झील को लगातार कितनी देर देख सकते हो? शाम को 8 बजे रूम में पहुँचे है। बहुत अच्छा अनुभव रहा। यहाँ मैं फिर से बता देना चाहता हूँ की यदि आप मेरे पेंगोंग झील के सामान्य वर्णन से खुश नहीं हैं तो आपको ये बात समझ लेनी चाहिए की लदाख में कोई एक चीज देखने की नहीं है बल्कि रास्ते ही खुद में देखने समझने और जीने के लायक हैं। आप इन रास्तों पर चल लिए मतलब आप अच्छे से घूम लिए। अब कल श्रीनगर होते हुए वापिसी की तैयारी है। कारगिल-श्रीनगर होते हुए जाने वाला रास्ता काफी अच्छा है। एक तो मैं पहले भी इस रास्ते से जा चुका हूँ और दूसरा इस यात्रा का वर्णन कुछ ज्यादा ही लम्बा हो गया है। कोई स्थापित लेखक ना होने की वजह से मेरे पास शब्दों की भी कमी है इसलिए अब आगे की यात्रा का वर्णन मैं इस अध्याय में नहीं जोड़ूँगा। आगे की यात्रा को समझने को मैं आपकी स्वविवेचना पर छोड़ता हूँ। 
लेह - कारगिल - श्रीनगर - जम्मू - लुधियाना - अम्बाला - पानीपत - रोहतक - रेवाड़ी। 
आगे की यात्रा इस रूट से पूरी करते हुए हम 12 तारीख को (कुल 10 दिन) घर पहुँचे तो घर वालों की नाराजगी से हमारा स्वागत हुआ। आने जाने में बाइक ने कुल दूरी तय की 3000 किमी।



यात्रा वृतांत: सुनहरा त्रिकोण


जगन्नाथ पुरी:
इस यात्रा का कार्यक्रम बाकि यात्राओं की तरह अचानक नहीं बना था. मैंने इस पुष्तक के सबसे पहले पेज पर स्कूल की किताब से श्रवण कुमार वाले किस्से का जिक्र किया है. श्रवण कुमार द्वारा माँ बाप को चार धाम यात्रा करवाने का अध्याय जब पढ़ा तब सबसे पहले सोचा था की चार धाम कोई अच्छी जगह होती होगी. इसलिए मैं भी एक दिन वहां जाऊंगा. समय गुजरता गया और चार धाम के बारे में मेरी जानकारी दुरुस्त और जाने का इरादा पक्का होता गया. महान भारत के चार कोनों में बसे चार अलग अलग मंदिरों को चार धाम कहा गया है. ये हैं - बद्रीनाथ उत्तराखंड में, जगन्नाथ पुरी उड़ीसा में, रामेश्वरम तमिलनाडु में और द्वारका गुजरात में. चार धामों से जुडी अनेकों मान्यताएँ भी हमारे समाज में हैं. धर्म कर्म में विश्वास करने वाले कहते हैं की प्रत्येक हिन्दू नागरिक को जीवन में एक बार चारों धामों की यात्रा अवश्य करनी चाहिए. आस्था और मान्यताएं तो बहुत बाद में समझ आने लगीं पर मैंने आपको बताया की मुझे कैसे यहाँ जाने का चस्का लगा था. इस यात्रा पर जाने का मन पिछले कई साल से बन रहा था. जब भी मन में भक्तिभाव जागता तो चार धाम याद आते फिर कई कई दिन भूल जाता. ऐसे ही चलता रहा.

एक दिन इंटरनेट पर कुछ ढूँढ रहा था. तभी एक विज्ञापन पर नजर गयी. इसमें चुनिंदा मार्गों पर एयर इंडिया की हवाई यात्रा पर कुछ छूट चल रही थी. मेरे दिमाग में पता नहीं क्यूँ कोई और मंजिल नहीं आयी और तुरंत मैंने दिल्ली से भुवनेश्वर की टिकट चेक की. टिकट की कीमत में ज्यादा फर्क तो नहीं मिला पर फिर भी मैंने आने जाने की टिकट बुक कर ली. अब टिकट तो बुक हो ही चुकी थी इसलिए किसी और से साथ चलने के बारे में पूछना बेकार था. निर्धारित समय पर दिल्ली के इंदिरा गाँधी हवाई अड्डे से जहाज पकड़ कर सुबह 8 बजे भुवनेशवर पहुँच गया. सिर्फ आने का दिन पहले से तय नहीं था अन्यथा ये यात्रा अचानक से प्लान की हुई नहीं थी तो इस बार बजट की भी कोई खास समस्या नहीं थी.

भुवनेश्वर का हवाई अड्डा छोटा सा एवं सुंदर भी है. वैसे हवाई अड्डे सुंदर ही बनाये जाते हैं. बाहर निकल कर देखा तो कोई पब्लिक साधन नहीं था. पूछने पर बताया गया की एक आध बस चलती तो है पर आप सिर्फ उसी के भरोसे नहीं बैठे रहें तो ज्यादा अच्छा होगा. ये एक तरह का मागदर्शन कम और सलाह ज्यादा थी. इस तरह के मार्गदर्शन के बाद टैक्सी वालों को मार्केटिंग के लिए अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती. प्री-पेड़ काउंटर पर जाकर बोला मुझे पुरी जाना है. 'अच्छा पुरी की टैक्सी चाहिए?' 'नहीं, पुरी की टैक्सी नहीं चाहिए. जहाँ से पुरी जाने वाली बस मिलती है वहां तक जाने के लिए टैक्सी चाहिए.' धत्त तेरे की, जिस टैक्सी वाले का नंबर था उसकी अच्छे ग्राहक को पाने की उम्मीद तुरंत भरभरा कर ढह गयी. टैक्सी में बैठा तो ड्राइवर ने बताया की 'भुवनेश्वर में चार बड़े बस स्टैंड हैं. और पुरी जाने वाली बस आपको फलाने स्टैंड (नाम याद नहीं) से मिलेगी. पर आपको बस स्टैंड जाने की जरुरत नहीं है, बीच रास्ते में ही एक बड़ा स्टॉप है जहाँ ये बसें सवारी के इंतजार में आधे आधे घंटे तक खड़ी रहती हैं. मैं आपको वहीँ उतार दूंगा.' मैंने एक बार भी प्रतिरोध नहीं किया. ना कुछ पूछा. समय की कोई कमी नहीं थी. और ज्यादा से ज्यादा क्या होगा. थोड़ा इधर उधर टहलना पड़ जायेगा और क्या. इस बहाने शहर ही देख लेंगे. अनजाने शहर में खोने का मज़ा ही कुछ और होता है. कभी खो कर देखिये अनजाने शहर में, रास्ते खुद आपको ढूँढ कर मंजिल पर पहुंचा देते हैं. हालाँकि जब आप दिल्ली में हो तो ऐसा रिस्क बिलकुल नहीं लेना चाहिए, दिल्ली आजकल हमारी राजधानी वाले सारे काम छोड़ कर बाकि सब कुछ होने का फर्ज पूरे मन से निभा रही है. कुछ लोग तो दिल्ली को क्राइम कैपिटल भी कहते हैं. और मेरी आशिंक सहमति है इसमें. दिल्ली वाले मित्र नाराज ना हों, इसके लिए पुष्तक के सबसे पहले पेज पर पहले ही एक माफीनामा छप चुका है.

चलिए अभी अपने लिए अच्छी बात ये है की हम दिल्ली में नहीं हैं इसलिए जहाँ हैं वहीं का मजा लेते हैं. टैक्सी वाले ने जहाँ उतारा वहीं उड़ीसा रोडवेज की एक बस खड़ी थी, उसने बताया इसमें बैठ जाओ ये पुरी जा रही है. भाग कर दरवाजे में घुसता हूँ तो हल्की गुलाबी साड़ी पहने एक औरत पूछती है किधर जाना है? 'पुरी.' 'हाँ आ जाओ, बस चलने वाली है.' एक ही सीट बची थी उस पर मैं बैठ गया, सीट खिड़की वाली नहीं थी, होती तो और मजा आता. बस में बैठने के साथ ही अनजाने शहर में खोने का मेरा प्लान अधूरा रह गया. वापिस लौटते समय भी मेरे पास एक अतिरिक्त दिन रहेगा इसलिए तब खो कर देखूंगा. बस चल चुकी थी, गुलाबी साड़ी वाली महिला पास आयी और बोली 60 रु दीजिए, वो बस की कंडक्टर थी. तब मैंने पहली बार ऐसा देखा था इसलिए सुखद लगा. अब तो शायद हरियाणा दिल्ली में भी काफी महिला बस कंडक्टर हो गयी हैं. सुबह का समय था इसलिए बस में काफी भीड़ हो गयी थी. बाहर का नजारा ज्यादा नहीं देख पाया. बस इतना समझ आया की बस किसी अच्छे हाईवे से जा रही है जिसकी दशा बहुत बेहतर है. कुछ आगे कांवड़िये जाते दिखे. अरे बाप रे, यहाँ भी? मुझे हमेशा लगता था की ये सिर्फ उत्तर भारत में ही होते हैं. ये कहाँ से कावंड लाते होंगे? हरिद्वार से ही? हो भी सकता है और नहीं भी. धर्म और संस्कृति का अज्ञान यहाँ बहुत अखरा. मेरे इस विश्वास को फिर से बल मिला की देश के हर भाग की मान्यताओं संस्कृति को समझने के लिए भी घूमना जरुरी है. वरना तो किताबों में हमें क्या पढ़ाया गया है ये आप भी जानते ही हैं और टीवी वालों के लिए तो जैसे दिल्ली से आगे देश ही नहीं है.
  
ये ही कोई ढाई घंटे में पुरी पहुंचे तो बस ने अनाज मंडी टाइप किसी खुले पक्के मैदान में उतारा. वहां बस तो एक आध ही थी पर ऑटो बहुत थे. ऐसा भी बस स्टैंड होता है? दिल्ली में रहते हुए हम लोग भीड़ देखने के इतने आदी हो चुके हैं की यदि कहीं सिर्फ कुछ लोग ही दिखें तो लगता है किसी निर्जन टापू पर तो नहीं आ गए. हम भी उसी भीड़ का हिस्सा हैं इसलिए किसी और को दोष नहीं दे सकते. एक ऑटो में बैठ और होटल का पता बता दिया. ऑटो लेने से पहले मैंने बिलकुल भाव ताव नहीं किया. इस से समय भी बचा और मग्जमारी भी नहीं करनी पड़ी. यात्रा में पैसे की कमी ना हो तो जीवन कितना आसान हो जाता है ये मैं प्रत्यक्ष महसूस कर रहा था. होटल वाले को बुकिंग नंबर बताया तो उसने तुरंत एक लड़के को कमरा दिखाने को भेज दिया. होटल एकदम साफ सुथरा था और किस्मत से कमरा उस से भी अच्छा मिला था. कमरे का मुँह समुद्र की तरफ था. मेरे कमरे और समुद्र के बीच सिर्फ इतनी दूरी थी की एक पत्थर अगर तबियत से फेंका जाये तो समुद्र तक पहुँच जाये. मौसम अच्छा था, धुप नहीं थी. मैंने तुरंत खिड़की दरवाजे खोल दिए. और बेड पर लेट कर समुद्र को देखता रहा. उन दिनों तक समुद्र मुझे अत्यंत आकर्षक लगता था. समुद्र के प्रति मेरा ये आकषर्ण तब खत्म हुआ जब मलेशिया जाते समय हवाई जहाज समुद्र के ऊपर उड़ान के दौरान वायुचक्र में फंस कर समुद्र में ही गोते लगाने वाली हरकते करने लगा और फिर इसके कुछ ही दिन बाद इंडोनेशिया में पैराशूट फ्लाइंग करते हुए मैं समुद्र में ही गिर गया. हालाँकि अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ था इसलिए मैं समुद्र को देख देख कर दार्शनिक हुए जा रहा था.

घूमने जाने का सबसे बड़ा फायदा जो मुझे होता है वो ये की इस दौरान फेसबुक और व्हाट्सप्प जैसे ज्ञानदेउ संस्थानों से पीछा छूट जाता है और डायरी लिखने का छूटा काम शुरू हो जाता है. यहाँ भी कुछ लिखा. क्या लिखा था वो अब याद नहीं, बाद में जब खुद का लिखा हुआ पढ़ा तो हंसी आयी और डायरी में से पेज को तुरंत फाड़ कर फेंक दिया. लिखने के नाम पर दो घंटे ख़राब किये. उसके बाद नहा धो कर मंदिर दर्शन करने निकला. होटल वाले ने बताया यदि बाजार के बींचों बीच जाओगे तो ढाई किमी और यदि मुख्य मार्ग से जाओगे तो मंदिर यहाँ से 5 किमी पड़ेगा. जाने के लिए ऑटो लेना पड़ेगा. अबे पगले, ढाई किमी वो भी यहाँ के पारम्परिक घरों और बाजार के बीच वाले रास्तों से होकर जाने के लिए भी मैं ऑटो लूंगा? राव साहब पैदल जायेंगे. कहीं कहीं घरों के बाहर चौखट पर कुछ महिलाएं बैठ कर आपस में बतियाती हुई दिखी. महिलाओं की ये आदत वर्ल्ड हेरिटेज साईट में शामिल होनी चाहिए. विश्व की हर महिला की इस तरह बतियाने की पैदाइशी प्रतिभा को गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी जगह दी जा सकती है. गाँव में सोचता था की सिर्फ हमारे यहाँ की महिलाएं ही घंटों तक दरवाजे में खड़ी होकर बतिया सकती हैं पर अब अनुभव ये हो गया है की ये कला विश्व्यापी नहीं तो कम से कम भारतव्यापी तो है ही. दरवाजे में खड़े होकर बातें करना भी लगता है हमारी संस्कृति का ही हिस्सा है. ऐसी संस्कृति जिसके साथ छेड़छाड़ संभव नहीं है. इसलिए इस कला के लुप्त होने की सम्भावना भी कम है. शुरू में मैंने कुछ स्थानीय लोगों को देख कर स्माइल दी पर अधिकतर बिना प्रतिक्रिया दिए ही आगे बढ़ गए. मैं समझ गया की यहाँ के लोग हिमाचली लोगों से बिल्कुल अलग हैं. भाषा और रहन सहन की तरह ही अपने देश में हर जगह के लोगों का स्वभाव भी बिल्कुल भिन्न है. विविधताओं से भरा महान देश.
गलियों से होता हुआ कुछ देर में मैं मंदिर के पास पहुँचा तो मोबाइल और पर्स वगैरह बाहर ही जमा करवा लिया गया. कभी कभी अचरज होता है ये देख कर की इतना बड़ा मंदिर, हर रोज हजारों के हिसाब से आने वाले श्रद्धालु और प्रबंधन बिल्कुल जीरो. पुलिस वालों ने मोबाइल बाहर जमा करवाने को तो बोल दिया पर आपको हैरानी होगी ये जानकर की बाहर जमा करने के लिए कोई आधिकारिक स्थान ही नहीं था. किसी स्थानीय ठेकेदार टाइप के आदमी ने लकड़ी का एक तख्त लगा रखा था और अपने कुछ लोग छोड़ रखे थे. आप अपना कीमती सामान वहीं तख्त पर रख कर जा सकते थे. इसके लिए कोई पर्ची भी नहीं मिलेगी, इसलिए जब तक वापिस आएंगे आपका कीमती सामान पूरी तरह ठेकेदार की दया पर रहेगा. और ये कोई फ्री सेवा नहीं है, इसके लिए आपसे पैसे एडवांस में ही ले लिए जाते हैं. आखिर क्या करती हैं ये सरकारें हमारे चढ़ावे का? और इस तरह की अव्यवस्था सिर्फ यहीं नहीं मैंने बाकि भी बहुत से मंदिरों में देखी है. इसके विपरीत अगर मैं अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का यहाँ जिक्र करूं तो शायद मेरा ही शर्म से डूब मरने को मन करेगा. आपमें से कइयों ने वहां की विश्व प्रशिद्ध व्यवस्था देखी भी होगी. इस लूटमारी के खिलाफ वाकई कुछ करने की आवश्यकता है. चलिए अभी के लिए मारीये गोली पहले मंदिर में चलते हैं. 

मंदिर के इतिहास में लिखा गया है की जगन्नाथ मंदिर को कुल 18 बार आक्रमण किया एवं लुटा गया. 1692 में मुगल लुटेरे औरंगजेब ने अपने गुलामों को मंदिर ध्वस्त करने भेजा था. परन्तु औरंगजेब का स्थानीय मुगल लुटेरा यहाँ से घूस देकर वापस भगा दिया गया था. वैसे भी उनको हराम का माल पसंद था तो चाहे वो मंदिर से आये या कहीं और से. मंदिर अधिकांशतः बंद करवा दिया गया और उसके बाद औरंगजेब की मृत्यु के बाद 1707 में खोला गया.

मंदिर में प्रवेश के लिए चार द्वार हैं. प्रवेश द्वार पर ही एक सुचना बोर्ड मिलेगा "गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है". रामेश्वरम और मदुरै के मीनाक्षी मंदिर में भी मैंने ऐसा ही सुचना बोर्ड देखा था. पहले दूसरे देशों से आने वाले हिन्दुओं का भी प्रवेश वर्जित था परन्तु एक बार 'बाली' इंडोनेशिया से आये हुए तीन हिन्दुओं के प्रवेश पर हुए विवाद के बाद सभी हिन्दुओं को चाहे उसका जन्मस्थान कहीं का भी हो यहाँ प्रवेश मिलता है. गौरतलब है की इंडोनेशिया के बाली की 90% आबादी हिन्दू है. ये प्रसंग दर्शाता है की हमारे धार्मिक नियम कितने लचीले होते हैं. समय समय पर मांग के अनुसार हमने अपने धर्म, रीती रिवाजों में  हमेशा बदलाव किया है. और ये ही हमारी प्रगतिशीलता है. 

अंदर ज्यादा भीड़ नहीं थी. कुछ ही देर में दर्शन के लिए नंबर आ गया. अगर आपने मथुरा के मंदिरों में धर्म के नाम पर पण्डों द्वारा की जाने वाली लूटखसोट देखी है तो यहाँ आपको बिल्कुल उसी तरह का अनुभव होगा. जगन्नाथ जी के मुख्य मंदिर के ठीक सामने कोई बिस फ़ीट की दूरी पर रेलिंग लगी है. मतलब आपको दर्शन करते समय भगवान से बीस फीट दूर रह कर दर्शन करने हैं. यहाँ तक तो ठीक है पर हद तब हो जाती है जब यहाँ के सारे पण्डे पुजारी आपके और भगवान के बीच में दिवार बन कर खड़े हो जाते हैं. और इतने ढीठ होते हैं की सामने से हटने का नाम नहीं लेते. और पता है कब हटेंगे? जब आप इनको दर्शन या  प्रसाद के नाम पर तथाकथित दक्षिणा देंगे. मैंने तो रेलिंग पर चढ़ कर ही भगवान के सामने हाथ जोड़ लिए. किन्तु वहां भतेरे ऐसे लोग थे जो यहाँ तक पहुंचने के बाद भी दर्शन करने में सक्षम नहीं हो पा रहे थे. इस को देखते हुए मैंने वहां हल्ला काटना शुरू कर दिया. सामने से नहीं हटने के नाम पर एक पण्डे के साथ मेरी बहस इतनी बढ़ गयी थी की बात हाथापाई तक आ गयी थी अगर बीच में पुलिस वाला नहीं आता तो. इस तीखी नोक झोंक का फायदा ये हुआ की कुछ मिनट तक अफरातफरी की वजह से पण्डे यहाँ वहाँ हो गए और लोगों ने दर्शन किये. आखिर कौन बनाता है इनको हमारे भगवान का ठेकेदार? जिनके दर्शन के लिए इतनी दूर आया था उनसे मिलने के बाद कुछ ही देर अंदर रुका और बाहर आ गया.

बाहर आकर खाना खाया, और पूरे दिन इधर उधर घूमता हुआ शाम के समय समुद्र किनारे पहुँच कर ठन्डे रेत पर बैठ गया. ये कौन सा बीच था वो तो नहीं पता पर काफी कुछ मुंबई के जुहू बीच जैसी चहल पहल थी. समुद्र किनारे रेत पर बैठे बैठे मैं फिर से दार्शनिक हो गया. इस समय मैं भारत भूमि के एक बहरी किनारे पर था. जिसके आगे भूमि नहीं है, सिर्फ अथाह जल है. मैंने आसमान की तरफ देखा, एक हवाई जहाज जा रहा था. मुझे याद आया वो दिन जब मैं मलेशिया से लौट रहा था. तब मैंने जब खिड़की से निचे देखा तो बिल्कुल ऐसा ही किनारा दिखा था. मतलब मानचित्र में जैसे दिखाया गया है ठीक उसी तरह से भारत भूमि की शुरुआत. मैंने ऊपर से ही धरती को प्रणाम किया था और भारत माता की जय बोली. क्या ये जो हवाई जहाज जा रहा है इसमें भी कोई ऐसा व्यक्ति बैठा होगा? ये सब सोचना मेरे दार्शनिक होने का नतीजा था.

रात को सोने से पहले मन में सोचा - "चार धाम की यात्रा का जो स्वपन बचपन में देखा था उसका एक पड़ाव आज पूरा हो गया."


कोणार्क:
अगली सुबह जल्दी उठा. समुद्र का शोर साफ़ सुनाई दे रहा था. सुबह सामने का नज़ारा देख कर और अच्छा लगा. पहाड़ों की सुबह और समुद्र किनारे की सुबह में जमीन आसमान का अंतर है पर दोनों ही खूबसूरत होती है. आज मुझे कोणार्क जाना है. तैयार होकर एक ऑटो पकड़ा और कोणार्क रोड स्थित एक बाइक की दुकान पर पहुंचा. कल मार्किट घूमने के दौरान ही मैंने पता कर लिया था की पुरी में कुछ दुकानें हैं जहाँ से दिन भर के लिए बाइक किराये पर मिल जाती है. दुकान से एक स्प्लेंडर बाइक किराये पर ले ली. मालिक ने मेरा ओरिजनल लाइसेंस अपने पास बतौर सिक्योरिटी जमा करवा लिया. बाइक का दिन भर का किराया मात्र दौ सौ रु है. तेल आपको जितना घूमना है उतना खुद से डलवाना पड़ेगा. दुकान वाले ने ही वहां से कोणार्क जाने वाला रास्ता दिखा दिया और पास ही में स्थित पैट्रोल पंप भी. कोणार्क यहाँ से 35 किमी दूर है. मैंने 2 लीटर पैट्रोल लिया. पैट्रोल डलवाने के बाद मैं अपनी मंजिल की तरफ चल दिया.

पुरी शहर चाहे कितना भी प्रसिद्ध हो पर अगर आप यहाँ की विश्व-प्रसिद्ध रथ यात्रा के अलावा अन्य किसी भी समय गए हों तो आपको उतनी ज्यादा भीड़ नहीं मिलेगी. शहर का बहरी हिस्सा किसी गांव के जैसा ही है. जल्दी ही मैं शहर को पार कर के 'कोणार्क की तरफ जाने वाले दाएं मुड़े' वाले तीर के निशान को पार कर के हाईवे पर जा पहुंचा. नेशनल हाईवे नंबर 203, मेरे द्वारा अब तक देखे गए देश के कुछ बेहतरीन हाइवेज में से एक है. बिना डिवाइडर का शानदार रोड. इसके एक किनारे घने जंगल तो दूसरे किनारे नीला समुद्र आपके साथ साथ कोणार्क तक चलेगा. कहीं कहीं दोनों तरफ घना जंगल भी आता है पर वहां से समुद्री किनारे ज्यादा दूर नहीं है. अगर समुद्र दिखाई ना भी दे तो लहरों का शोर सुन कर आप आराम से अनुमान लगा सकते हैं की समुद्र कितनी दुरी पर है. रास्ते में एक से बढ़ कर एक फोटो खींचने लायक नजारे बार बार बाइक रोकने के लिए ललचाते हैं. अगर आप एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं तो यहाँ से संग्रह करने लायक तस्वीरों का खजाना आपके हाथ लग सकता है. रास्ते में दस बीस घरों के कुछ गांव भी आते हैं जहाँ आप कुछ देर रुक कर चाय पानी पी सकते हैं. वैसे तो 35 किमी की दूरी तय करने के लिए आपको रास्ते में आराम करने की जरुरत नहीं होती पर यहाँ से गुजरने के दौरान मुझे हर दुकान के सामने रुकने की इच्छा होती रही. गांव वालों भी इस जगह को ऊँचे मापदंड पर बनाये रखने के लिए पूरी जिम्मेदारी निभाते हैं. यहाँ जैसे सब कुछ सिर्फ सरकारों के भरोसे ही नहीं छोड़ा गया है. यहाँ आकर अगर कोई मुझसे पूछे की प्रदूषण क्या होता है, भीड़ कैसी दिखती है तो मैं कहूंगा मुझे कुछ नहीं पता. वैसे तो ये हाईवे है पर आपको यहाँ ट्रैफिक बहुत ही कम मिलेगा. समुद्र का पानी एकदम नीला और साफ़ है. पता नहीं कौन लोग हैं वो जो सिर्फ समुद्र देखने के लिए मारीशस या सिंगापुर जैसी जगहों पर जाते हैं. ऐसे मित्रों से यही कहूंगा की सिर्फ समुद्र देखने के लिए विदेश जाने से पहले एक बार यहाँ आकर देखें. पैसे तो वसूल होंगे ही, अपने देश की मिटटी पर भी गर्व होगा. वाकई कितना खूबसूरत देश है अपना. कैमरा साथ था तो कई जगह रुक कर फोटो लीं, अच्छी आयी हैं. रास्ते में मिलने वाले अजनबी दोस्तों से कुछ फोटो अपनी भी खिंचवाई. अकेले घूमने का सबसे बड़ा नुकसान बस यही लगता है की कोई आपकी फोटो खींचने वाला नहीं मिलता. शानदार हाईवे पर 35 किमी की दुरी ढाई घंटे में तय कर के मैं कोणार्क पहुंचा.

कोणार्क शहर में घुसने के बाद सूर्य मंदिर जाने का रास्ता खोजना कोई मुश्किल काम नहीं है. बाइक पार्किंग में लगाई और टिकट लेकर अंदर प्रवेश किया.  कोणार्क को कोणादित्य के नाम से भी जाना जाता है. कोणार्क शब्द 'कॉर्नर' और 'अर्का' दो शब्दों से मिल कर बना है. अर्थात कॉर्नर ऑफ़ सन - 'सूर्य के कोने'.
यहाँ स्थित सूर्य मंदिर अपने ब्लैक पैगोडा नाम से भी प्रशिद्ध है. इस सूर्य मंदिर को तेरहवीं शताब्दी के मध्य राजा नरसिंह के द्वारा बनवाया गया था. सम्पूर्ण भवन को एक अत्यंत विशाल रथ के आकार में बनाया गया है जिसकी ऊंचाई करीब तीन मीटर है. सूर्य देवता स्वयं इस रथ में विराजमान होकर स्वर्ग की यात्रा कर रहे हैं. रथ में कुल 24 पहिये हैं और सात घोड़े मिल कर इसको खिंच रहे हैं. मंदिर का हर एक भाग अपने आप में विस्मित कर देने वाली कला से बना है इसीलिए अपना ये ब्लैक पैगोडा देश के सात आश्चर्यों में शामिल किया गया है. इस मंदिर को वर्ल्ड हेरिटेज साईट में भी शामिल किया गया है. धार्मिक निर्माण का विश्व भर में सबसे स्तब्ध कर देने वाला स्मारक देख कर आप दातों तले ऊँगली दबाने को मजबूर हो जायेंगे. अपने देश के कुछ बुद्धिजीवियों की भांति यदि आपको भी लगता है की हमारे पास इतिहास में निर्माण के नाम पर गर्व करने लायक कुछ भी नहीं है तो आपसे अनुरोध है कृपया यहाँ एक बार अवशय पधारें. हालाँकि यह मंदिर समुद्र किनारे से लगभग 2 किमी की दूरी पर है किन्तु कहीं कहीं ऐसा कहा गया है की एक ज़माने में ये बिलकुल समुद्री किनारे पर ही बनाया गया था. इस प्रकार समुद्र में आने वाली जहाजों के लिए ये नौसंचालन संबंधी नेविगेशनल पॉइंट का काम करता था. उसी दौरान यूरोपियन लोगों ने इसको ब्लैक पैगोडा का नाम दिया था. हालाँकि मुझे इस पर संदेह है की यूरोपियनों ने हमारे मंदिर को ये नाम दिया था. हमारे गौरवशाली इतिहास को यहाँ भी विकृत कर के बताया गया हो इसकी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

भगवान सूर्य के सम्मान में बनाया गया कोणार्क का ये सूर्य मंदिर अब ढ़हने के कगार पर है. इमारत को सँभालने के लिए समय समय पर इसकी मरम्मत भी की जाती है एवं इस समय लकड़ी की मोटी व मजबूत बल्लियों के सहारे पूरी इमारत को सहारा प्रदान किया गया है. मंदिर के निर्माण और वास्तु सम्बन्धी अनेक प्रकार की विरोधाभाषी जानकारियां इतिहास की किताबों में मिलती है. मंदिर के बनने और खंडहर होने के बारे में विभिन्न ज्ञानी लोग किसी एक मत पर सहमत नहीं हो सके. इसलिए एक पाठक के रूप में आपका गलत दिशा में भटकने का खतरा होता देख पुष्तक में मंदिर के बारे में और अधिक जानकारी देने से मैं बचना चाहता हूँ.
कोणार्क के अविस्मरणीय स्मरण लेकर शाम तक मैं वापस पूरी लौट आया. शाम को सोने से पहले वहीँ कल वाले बिच पर कुछ देर बैठा और अपने दार्शनिक स्वरूप से फिर से रु-ब-रु हुआ. कल का दिन भुवनेश्वर घूमने के नाम है.
 
भुवनेश्वर:
सुबह जल्दी ही होटल से चेक आउट कर दिया एवं ऑटो पकड़ कर पुरी के स्थानीय बस अड्डे पर पहुंचा. बस अड्डे आने से पहले ही रास्ते में एक रेहड़ी पर नाश्ता कर लिया था. ये वो जगह नहीं थी जहाँ आते समय बस ने उतरा था. ये एक गन्दा सा अव्यवस्थित बस अड्डा था. पूछताछ करने पर पता चला था की भुवनेश्वर जाने वाली सब बसें यहीं से चलती है. यहाँ एक भी रोडवज बस नहीं दिख रही थी, करीब सभी प्राइवेट ही थी. मुझे कुछ खटका तो हुआ था की शायद मैं गलत जगह पर हूँ, मुझे रोडवज बस के बारे में पता करना चाहिए. पर पता नहीं क्यूँ मैं आलसी बन कर पड़ा रहा. सोचा जब बस पर लिखा है की वो भुवनेश्वर जाएगी तो जाएगी. इसमें पूछना क्या है? ये आलस मुझ पर भारी पड़ने वाला था. बस सुबह 8 बजे पुरी से चल दी. मैंने हिसाब लगाया की आते समय भी भुवनेश्वर से बस 8 बजे चली थी और उसने करीब 10.30 बजे पुरी पहुँचा दिया था. इस हिसाब से वापिस जाते समय भी मैं 10.30 पहुँच जाऊँगा. जल्दी ही मेरी ये गणना भी गलत सिद्ध होने वाली थी. बस कुछ देर चली और फिर एक गली नुमा जगह पर सवारी भरने के नाम पर आधे घंटे से अधिक खड़ी रही. इस बार खिड़की वाली सीट थी. बस जब चली तो देख कर दुख हुआ की ये उस रास्ते से नहीं जा रही थी जहाँ से आने वाली बस आयी थी. कुछ ही देर में वो खंडर नुमा बस मुख्य मार्ग छोड़ कर किसी गॉँव में जा घुसी. और फिर तो भैया एक बार जो उस बस ने मुख्य मार्ग छोड़ा तो वापिस कभी लौट कर मुख्य मार्ग पर आयी ही नहीं. एक गाँव से निकलती तो दूसरे में घुस जाती और एक कच्ची सड़क से दूसरी कच्ची सड़क पर. हिमालय पर जाने के दौरान जैसे सफेद बादलों का गुब्बार आपके आस पास मंडराता है वैसे भूरे काले रेत का गुब्बार यहाँ बस में घुस कर मेरे गाल चूमने को बेकरार था. अपनी हरकत पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर फिर सोचा की चलो इसी बहाने उड़ीसा के गाँवो, खेतों के भी दर्शन हो गए. ये मेरे लिए पाजिटिविटी की इन्तेहाँ थी. सफर के दौरान अपने आपको मोटीवेटिड रखना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा यात्रा का परिणाम दुखदायी होगा. सुबह रेहड़ी पर खाया गया पकौड़े नुमा नाश्ता कब का हजम हो चुका था. मेरे ख्याल से पुरी से बैठ कर ठेठ भुवनेश्वर तक पहुंचने वाला मैं एकमात्र प्राणी उस बस में बचा था. पहुँचते पहुँचते कंडक्टर से इतनी गहरी दोस्ती हो गयी जैसे कुम्भ के मेले में बिछुड़ा भाई हो. इसका अहसान उसने ऐसे चुकाया की उसने मेरे पहले से बुक होटल के ठीक सामने बस रुकवा कर मुझे उतार दिया. बस स्टॉप से होटल तक आने के कुछ मिनटों के समय ने दिन भर बस में खाये धक्कों को भुला दिया. आगाज चाहे जैसा रहे, अंजाम अच्छा होना चाहिए. दोपहर के डेढ़ बजे मैं भुवनेश्वर पहुँचा.

होटल पहुँच कर नहाया और खाना खाकर, गले में अपना कैमरा लटका कर स्थानीय बस अड्डे पहुँचा. कैमरा आपके टूरिस्ट होने का आई कार्ड होता है. इसको देखते ही सवारी के इंतजार में खड़े ऑटो टैक्सी वालों की आँखों में ठीक वही चमक देखी जा सकती है जो बकरे को हलाल करने से पहले कसाई की आँखों में रहती है. मुझे बस की तरफ बढ़ते देख आँखों की चमक दिए दिए की लौ की तरह तुरंत बुझ गयी. मुझे ग्लानिबोध हुआ. अगर वामपंथ की भाषा में कहें तो मैंने किसी का रोजगार छीन लिया था. ये उनका हक था की मैं उनके ऑटो में बैठता और मुझसे पूरा किराया वसूला जाता.

शायद 10 रु की टिकट कटी थी. अपनी मंजिल है भुवनेश्वर से 8 किमी दूर प्रसिद्ध उदयगिरि और खांडगिरि की गुफाएं. जल्दी ही बस निर्धारित स्थान पर उतार देती है.  दोनों गुफाएं एक दूसरे के आमने सामने करीब डेढ़ सौ मीटर की दूरी है. बिच में रास्ता जाता है तथा वहीँ एक टिकट काउंटर भी बना है. टिकट लेकर पहले उदयगिरि की गुफा की तरफ गया. इन दोनों गुफाओं का निर्माण राजा खारावेला के शासनकाल में विशाल शिलाखंडों से किया गया था. बताते है इन गुफाओं में बैठकर साधुजन शांति से समाधि लगाते थे और कठोर तपस्या करते थे। उदयगिरि में 18 गुफाएं हैं और खंडगिरि में 15 गुफाएं हैं। यहाँ पर लगे शिलालेखों में इन गुफाओं को ‘लेना’ कहा गया है। गुफाओं के मुंह दरवाजों जैसे हैं, जहां से दिन के समय सूरज की रोशनी आ सकती है और पथरीले फर्श गर्म रहते हैं। रात को चाँद की रोशनी गुफा में आती है और गुफाओं में उजाला रहता है। हालांकि गुफा में छत की ऊँचाई कम है और कोई व्यक्ति सीधे खड़ा नहीं हो सकता। इस से अंदाजा लगाया गया की ऋषि मुनियों के लिए ये सिर्फ विश्राम स्थल या शयन कक्ष रहे होंगे। मैं चूँकि अजन्ता एलोरा की गुफाएं देख चुका हूँ इसलिए ये गुफाएं मुझे उतना आकर्षित नहीं कर सकी. ये अजन्ता और एलोरा जितनी प्रसिद्ध नहीं हैं, लेकिन फिर भी मैं कहूँगा की इनका निर्माण बहुत सुंदर ढंग से किया गया है। गुफा की सबसे ऊँची छत पर चढ़ कर देखने से भुवनेश्वर शहर के चारोँ तरफ फैली बेहतरीन हरियाली दिखाई देती है. एयरपोर्ट भी दिखता है और उस मंदिर की चोटी भी जहाँ मुझे कल जाना है - लिंगराज मंदिर.

चूँकि भुवनेश्वर शहर में घूमने के दौरान मुझे कहीं भी दार्शनिक होने का स्थान नहीं मिला तो होटल में आ गया. गलती से टीवी ऑन कर लिया तो उसमे दिल्ली देश में मौजूद समस्याओं का रोना धोना चल रहा था. काँपती रूह से तुरंत टीवी बंद करना पड़ा. कभी कभी लगता है जैसे टीवी वालों को सही में पता ही नहीं होगा की भारत देश की सीमाएं दिल्ली से कितनी दूरी तक है? मैं पिछले कई सालों से टीवी देखना छोड़ चुका हूँ. काम की खबरें अपने आप पता लग जाती है और अगर सिनेमा देखने की तलब लगे तो थिएटर में जाना मुनासिब समझता हूँ.

अगले दिन सुबह निकलने से पहले सामान बांध कर रिसप्शन पर पटक दिया. आज शाम की वापसी की फ्लाइट है. अभी पूरा दिन बाकि है इसलिए चलिए इस यात्रा का एक अन्य महत्वपूर्ण पड़ाव श्री लिंगराज मंदिर के दर्शन कर के आते हैं. मंदिर शहर से कोई आठ दस किमी की दूरी पर है और कोई भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम वहां तक पहुँच नहीं रखता इसलिए ऑटो लेना पड़ा. इस तरह की अत्यधिक आवाजाही वाले पर्यटन व आध्यतमिक केंद्र तक कोई साधन आसानी से उपलब्ध क्यूँ नहीं है इसके लिए सरकारों को जवाबदेह होना चाहिए. कुछ ही देर में अपना ऑटो मंदिर की पार्किंग में खड़ा था. मोबाइल कैमरा यहीं छोड़ कर जाना था. मंदिर में प्रवेश करने से पहले भगवान के वही स्वयंभू ठेकेदार अच्छी पूजा करवाने के नाम पर अपनी मार्केटिंग करते हुए मेरे आगे पीछे चक्कर काटने लगे. एक पण्डे ने जब काफी देर तक पूजा करवाने में अपनी प्रतिभा का गुणगान करते हुए मेरे पीछा नहीं छोड़ा तो मैंने कहा आपका brochure कहाँ है, दिखाइए. मुझे लगता है अब इन लोगों को अपने मार्केटिंग तौर तरीकों को अपग्रेड कर लेना चाहिए. जब मैं किसी के चंगुल में नहीं फंसा तो एक पण्डा कुछ गाली गलौच करते हुए साइड से खिसक गया. उसकी धमकी कुछ इस तरह से मेरी समझ आयी की यदि हम चाहें तो तुम्हे बिना दर्शन किये ही वापिस भिजवा सकते है. और इसका आंशिक असर मुझे अंदर पहुँच कर देखने को मिला भी. मुझे इस तरह के लोगों से भिड़ने में कोई तकलीफ नहीं होती इसलिए इस तरह की घटना से मेरे मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. ये परिपक्क्वता लगातार घूमने और हजार तरह के अनुभव लेने के बाद आयी है. चलिए अंदर प्रवेश करते है.

अंदर जाने के पश्चात सीधे गर्भगृह में प्रवेश किया जहाँ शिवलिंग के दर्शन होने थे. मेरे पीछे पीछे वह तथाकथित पुजारी भी आ गया और मुख्य पूजाघर में मौजूद अन्य पुजारियों को कुछ कहा जिसकी तरफ मैंने ध्यान नहीं दिया था. मैं बाहर हुई बहस बाजी को भूल चुका था पर लगता है ये भाईसाहब ग्राहक खो देने से सदमे में थे और जैसे मुझे बर्बाद कर देने का संकल्प लिए घूम रहे थे. अन्य पुजारियों ने उसे धमकाने वाले अंदाज में कुछ कहा और वो एक किनारे पर जाकर खड़ा हो गया. बावजूद इसके जब मैं शिवलिंग की परिक्रमा कर रहा था तो वहाँ मौजूद पुजारियों में से एक ने मेरे आगे आगे घूमकर कुछ बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की. मंदिर में कोई भीड़ नहीं थी. मेरे अलावा कुछ दस बीस ही लोग उस समय मौजूद थे. इसलिए अगर पुजारी शेर था तो मैं सवा शेर. मैं भी परिक्रमा करता ही रहा. मुझे बाहर भागने की कौन सी जल्दी थी. उल्टा इस से मेरा ये फायदा हुआ की मुझे अधिक परिक्रमा करने का मौका मिल गया. चलिए जाओ पुजारी जी आज मेरा अधिक झगड़ा करने का मन नहीं है अन्यथा मैं बताता आपको की हमें हमारे धर्म में बिचोलिये स्वीकार नहीं है.
 
शिव के अत्यंत अच्छे दर्शन के बाद आइये गर्भगृह से बाहर निकलते है. लिंगराज मन्दिर, भुवनेश्वर का मुख्य मन्दिर है, जिसे ललाटेडुकेशरी ने 617-657 ई. में बनवाया था। इस मंदिर का वर्णन छठी शताब्दी के लेखों में भी आता है। इसके कुछ हिस्से 1400 वर्ष से भी ज्यादा पुराने हैं। यह मंदिर इस शहर के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इंटरनेट से कुछ जानकारी इस प्रकार से मिली - 'धार्मिक कथा है कि लिट्टी तथा वसा नाम के दो भयंकर राक्षसों का वध देवी पार्वती ने यहीं पर किया था। संग्राम के बाद उन्हें प्यास लगी, तो शिवजी ने कूप बनाकर सभी पवित्र नदियों को योगदान के लिए बुलाया। यहीं पर बिन्दूसागर सरोवर है तथा उसके निकट ही लिंगराज का विशालकाय मन्दिर है। सैकड़ों वर्षों से भुवनेश्वर यहीं पूर्वोत्तर भारत में शैवसम्प्रदाय का मुख्य केन्द्र रहा है। कहते हैं कि मध्ययुग में यहाँ सात हज़ार से अधिक मन्दिर और पूजास्थल थे, जिनमें से अब क़रीब पाँच सौ ही शेष बचे हैं।'

मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा छोटे बड़े करीब 150 अन्य मंदिर है. लिंगराज मंदिर अपनी शक्तिशाली संरचना की वजह से जबरदस्त रूप से प्रशिद्ध है. बलुआ पत्थर से बनी इसकी मुख्य मीनार करीब 55 मीटर ऊँची है.  लिंगराज मंदिर ना केवल आध्यत्मिक बल्कि वास्तुशिल्पीय कुशलता की वजह से भी महत्वपूर्ण है. मंदिर की बड़ी और ऊँची दीवारें भिन्न भिन्न मूर्तिकलाओं से सजाई गयी है. यदि आप भक्त नहीं है तो भी मंदिर की वास्तुकला व बनावट वाकई प्रत्येक जन को देखनी चाहिए. मंदिर के एक गलियारे में घूमते हुए जब छत पर निगाह गयी तो सैंकड़ों उल्लू छत से चिपके हुए दिखे. मैं तुरंत उल्टे पाँव वहाँ से भाग लिया.

चार दिन की यात्रा के बाद वापसी की फ्लाइट लेने के लिए एयरपोर्ट जा रहा हूँ. इस दौरान हुए तमाम खट्टे मीठे अनुभव मैं पहले ही सांझा कर चुका हूँ. परन्तु जाने से पहले भुवनेश्वर शहर के बारे में एक अच्छी बात और बताना चाहता हूँ. ये शहर सुंदर तो है ही साफ सुथरा भी बहुत है. शहर के मुख्य मार्ग किसी प्रकार के कूड़े कचरे से दूर, बड़े व खुले है. यातायात अपने नियम के अनुसार चलता है जो भारत में रहने वाले बन्दे के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है. मुख्य मार्गों के साथ ही किनारे पर अलग से पैदल व साईकिल पथ बनाया गया है जिसका सभी आमजन पूर्ण रूप से अनुसरण करते है. अंत में सिर्फ ये कहना चाहूंगा की यदि आप यात्रा करते रहते है तो उड़ीसा का ये का सुनहरा त्रिकोण आपकी सूचि में होना ही चाहिए. अत्यंत सुंदर एवं जरूर घूमने योग्य स्थान.

उड़ीसा सरकार को फ्री में उनके राज्य का विज्ञापन करने के लिए हम लोगों का शुक्रगुजार होना चाहिए. नहीं?