Sunday, 18 October 2015

अकबर बीरबल के किस्से और केजरीवाल


अकबर बीरबल की कहानियां हम सबने खूब सुनी हैं. किस्से भले ही पुराने हों पर सच आज भी उतने ही होते हैं. इसी तरह ढेर सारे किस्सों के बीच एक किस्सा यह भी...
एक दिन बादशाह अकबर और बीरबल महल के बागों में सैर कर रहे थे। वे बीरबल से बोले, 'बीरबल, देखो यह बैंगन, कितनी सुंदर लग रहे हैं!इनकी सब्जी कितनी स्वादिष्ट लगती है! मुझे बैंगन बहुत पसंद हैं।" 
हां! महाराज, आप सत्य कहते हैं। यह बैंगन है ही ऐसी सब्जी, जो ना सिर्फ देखने में ब्लकि खाने में भी इसका कोई मुकाबला नहीं है। और देखिए महाराज भगवान ने भी इसीलिए इसके सिर पर ताज बनाया है। बादशाह अकबर यह सुनकर बहुत खुश हुआ।
कुछ हफ्तों बाद बादशाह अकबर और बीरबल उसी बाग में घूम रहे थे। बादशाह अकबर को कुछ याद आया और मुस्कुराते हुए बोले, 'बीरबल देखो यह बैंगन कितना भद्दा और बदसूरत है और यह खाने में भी बहुत बेस्वाद है।' 
हां हुजूर! आप सही कह रहे हैं बीरबल बोला। इसीलिए इसका नाम बे-गुण है बीरबल ने चतुराई से नाम को बदलते हुए कहा।
यह सुनकर बादशाह अकबर को गुस्सा आ गया। उन्होंने झल्लाते हुए कहा, 'क्या मतलब है बीरबल?' मैं जो भी बात कहता हूं तुम उसे ही ठीक बताते हो। बैंगन के बारे में तुम्हारी दोनों ही बातें सच कैसे हो सकती हैं, क्या तुम मुझे समझाओगे? 
बीरबल ने हाथ जोडते हुए कहा, 'हुजूर, मैं आपका नौकर हूं बैंगन का नहीं।'
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चुनाव से पहले सर जी - 'हर बार दिल्ली में जब भी कोई रेप होता है, अपराध होता है शीला दिक्सित कहती है दिल्ली पुलिस हमारे पास नहीं है. क्या हमें ऐसी असहाय मुख्यमंत्री की जरुरत है?"
आपिया - 'Yes sir you are absolutely true.. अब तो आप ही हो जो दिल्ली को बचा सकते हो.' सर जी सुन कर खुश हुए. 
चुनाव के बाद - 'दिल्ली में लगातार अल्पसंख्यक बच्चियों का रेप हो रहा है. माना मैं मुख्यमंत्री हूँ पर PM और LG क्या कर रहे हैं. क्या वो अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं रोक सकते. मैं क्या करूँ दिल्ली पुलिस मेरे पास नही है नहीं तो मैं बताता की मैं क्या चीज़ हूँ।'
आपिया - ' Yes sir you are absolutely true...वाह। आज तो मज़ा आ गया .. आप जिस तरह से ट्वीट करते हो सोशल मीडिया पर क्रांति मचा कर रख दी है. ये तो मुख्यमंत्री का काम है ही नहीं।'
अबे पर पहले तो सर जी ने कहा था...'अबे चुप मैं सर का चम्मचा हूँ तेरा नहीं. ये देख मेरा ईमानदारी का सर्टिफिकेट. सर जी की जय हो.' आपिया ख़ुशी से नाचता हुआ चला गया। भक्त अभी तक अपने ऑफिस में बैठ कर सोच रहा है बीरबल आज तुम होते तो चमचागिरी में कड़ी टक्कर मिलती. .

ढोंगी भारतीय समाज


मेरे साथ काम करने वालों में लगभग सभी भारतीय हैं जिसमे से 50 % हिन्दू हैं. पते की बात ये है की जो हिन्दू हैं उनमे से लगभग 65 % बीफ खाते हैं .....बड़े चाव से.....बिना किसी जोर जबरदस्ती के....सभी विकल्प होते हुए भी....मेनू में 1500 से ज्यादा विकल्प मौजूद हैं...फिर भी खाते हैं.....ज्यादा South और North East India से हैं. दूसरी मज़े की बात ये है की उनमे से अधिकतर पूजा पाठ में इतना विश्वाश रखते हैं जितना आमतौर पर मुझे अपने इलाके में देखने को नहीं मिलता. सुबह शाम स्नान करके तमाम तरह के क्रियाकलापों को अपनाते हुए घंटो तक भगवान की मूर्ति के सामने लंबलेट हुए रहते हैं. कुछ तो ऑफिस में भी य्य्य्ये बड़े बड़े चन्दन वाले तिलकधारी बन कर आते हैं. कुछ मेरे काफी अच्छे दोस्त हैं...दिन रात का साथ उठना बैठना है. कई बार पूछा है मैंने कि तुम हिन्दू होते हुए भी बीफ कैसे खा लेते हो? सुनकर आश्चर्यचकित होता हूँ की वो लोग घर में भी खाते हैं. कुछ के यहाँ तो गाय की बलि देने की परम्परा भी है. 
लालू ने भी यही कहा है और कुछ गलत नहीं कहा है. यह बात सोलह आने सच है की बहुत से हिन्दू भी बीफ खाते हैं. पर चूँकि वोटों का ध्रुवीकरण होना है इसलिए इस बात को तो तूल दिया ही जाना चाहिए. पर यहीं से हमारे ढोंगी होने की बात भी सच होती है. बिल्ली को देख कर आँख बंद कर के बैठ गए हैं सब. कोई शक नहीं कि इस बार भाजपा को ही वोट दिया जाना चाहिए पर सिर्फ गाय के लिए नहीं. गाय को भाजपा नहीं हम ही बचा सकते हैं. हम उस दौर से गुजर रहे हैं जहाँ राजनीती हमारी खुद की सोच पर भारी पड़ रही है.

एक युवा और भावुक देश - हिंदुस्तान

हिंदुस्तान औसतन एक युवा और भावुक देश है. अब जमाना बदल रहा है. जरुरत है की देश की जनता, सियासत, उनकी सोच और उनका ढंग भी बदले. पिछले डेढ़ साल से जैसे काम हो रहा है उस से सहज ही अंदाजा हो जाता है की देश की दशा और दिशा किस तरह अंगड़ाई ले रही है. निगाहें जमीं हुई एवं निशाना सटीक है. एक और जहाँ स्थायी सदस्यता और दुनिया भर के इन्वेस्टमेंट के लिए दम लगाया जा रहा है वही दूसरी और विरोधी अभी सिर्फ इस बात में उलझे हुए हैं की माँ गरीब थी या नहीं, वाकई बर्तन मांजती थी या नहीं. साल भर के अंदरजहाँ घोटालों का अम्बार लग जाता था वहां अभी तक सूट जैसे मरे हुए मुद्दों को अल्कोहल डाल कर सुरक्षित रखे जाने की बेहूदा कोशिशें जारी हैं. वैचारिक दरिद्रता किस कदर छायी है यह तब बड़ी आसानी से देखने को मिलता है जब राजनैतिक विरोध के नाम पर आनंद शर्मा जैसे नेता सिर्फ इस बात को उछाल पाते हैं की माँ साथ क्यों नहीं रहती. धर्म और जातियों की जकड़न में उलझे इस देश में विरोध सिर्फ विरोध के लिए ही किया जाता है. राजनैतिक दंगल में जब जनता विकास के नाम पर फ्री बिजली-पानी से आगे न बढ़ पाये तो विदेशी दौरों के नाम पर वो लोग भी रिपोर्ट मांगने लग जाते हैं जो एक शहर के मच्छर तक ना मार पाये हों. विरोधियों की इसी बैचनी और तिलमिलाहट के बीच हमारी विश्वसनीयता दिन-बे-दिन गहरी और उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं. निश्चिंत हैं की देश गलत हाथों में नहीं है. साथ ही इस बात की बेहद सुखद अनुभूति भी है की साल भर से धंदे और चंदे बंद होने के बाद विरोधी अब तक हमें भक्त से ज्यादा कुछ नहीं कह पाये हैं.