हिंदुस्तान औसतन एक युवा और भावुक देश है. अब जमाना बदल रहा है. जरुरत है की देश की जनता, सियासत, उनकी सोच और उनका ढंग भी बदले. पिछले डेढ़ साल से जैसे काम हो रहा है उस से सहज ही अंदाजा हो जाता है की देश की दशा और दिशा किस तरह अंगड़ाई ले रही है. निगाहें जमीं हुई एवं निशाना सटीक है. एक और जहाँ स्थायी सदस्यता और दुनिया भर के इन्वेस्टमेंट के लिए दम लगाया जा रहा है वही दूसरी और विरोधी अभी सिर्फ इस बात में उलझे हुए हैं की माँ गरीब थी या नहीं, वाकई बर्तन मांजती थी या नहीं. साल भर के अंदरजहाँ घोटालों का अम्बार लग जाता था वहां अभी तक सूट जैसे मरे हुए मुद्दों को अल्कोहल डाल कर सुरक्षित रखे जाने की बेहूदा कोशिशें जारी हैं. वैचारिक दरिद्रता किस कदर छायी है यह तब बड़ी आसानी से देखने को मिलता है जब राजनैतिक विरोध के नाम पर आनंद शर्मा जैसे नेता सिर्फ इस बात को उछाल पाते हैं की माँ साथ क्यों नहीं रहती. धर्म और जातियों की जकड़न में उलझे इस देश में विरोध सिर्फ विरोध के लिए ही किया जाता है. राजनैतिक दंगल में जब जनता विकास के नाम पर फ्री बिजली-पानी से आगे न बढ़ पाये तो विदेशी दौरों के नाम पर वो लोग भी रिपोर्ट मांगने लग जाते हैं जो एक शहर के मच्छर तक ना मार पाये हों. विरोधियों की इसी बैचनी और तिलमिलाहट के बीच हमारी विश्वसनीयता दिन-बे-दिन गहरी और उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं. निश्चिंत हैं की देश गलत हाथों में नहीं है. साथ ही इस बात की बेहद सुखद अनुभूति भी है की साल भर से धंदे और चंदे बंद होने के बाद विरोधी अब तक हमें भक्त से ज्यादा कुछ नहीं कह पाये हैं.
No comments:
Post a Comment