Wednesday, 16 September 2015

आज का सूरज डूब गया तो क्या

कुछ चल रहा है अंदर ही अंदर. कुछ तो खिचड़ी पक रही है. एक उथल पुथल सी मची है. जैसे कहीं जाना है....कहाँ पता नहीं. मन बोझिल और आँखे शांत हैं. होंठ सिले हुए हैं. लगता है जैसे दूर कहीं एक गहरा सन्नाटा छाया है.....बगीचे में लगातार बोल रही कोयल भी अपनी कुक से ध्यान नहीं खींच पा रही है. घंटे भर से खेत में बैठा बैठा मानो जड़ हो गया हूँ.... दूर टीले के पीछे से सूरज का यूँ अस्त हो जाना और भी इमोशनल किये जा रहा है. वो शहर की रंग बिरंगी लाइटें और किराये के फ्लैट्स...कहाँ ले जाएगी ये भाग दौड़ हमें. जमाना बीत गया खुद से बात नहीं की....मुद्दत हो गयी खुद से मिले हुए...लगता है अब थोड़ा जीना पड़ेगा. आज का सूरज डूब गया तो क्या, कल फिर से उगेगा....कल फिर तुमसे मुलाकात होगी....!!

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