कुछ रिश्ते एक अजीब सी उलझन बन कर क्यूँ रह जाते है? मुझे लगता है की लगभग सभी की जिंदगी मे एक आध रिश्ता तो ऐसा होता है जो गले की हड्डी बन जाता है। ना निगलते बनता है और ना उगलते। और एक कुछ यूं की एक सवाल है। एक ही आदमी को एक ही आदमी कितनी बार ठग सकता है और फिर वापस विश्वास मे ले सकता है? और यूं की कोई किसी को कितनी बार माफ कर सकता है। और एक यूं की किसी का किसी के उपर किस हद तक अधिकार हो सकता है। माने मै रिश्तों के भवर मे उलझा सा महसूस करता हु कभी कभी खुद को। कभी लगता है की सब ठीक है। कभी लगता है की सबको लात मार के चलो हिमालय पर। अब वहीं धूनी रमाएंगे। बहोत जतन करे पर कोई लाभ मिल नहीं रहा बाबा। एक आदमी, सिर्फ कुछ लोगों के हाथों की कठपुतली बन कर सारी जिंदगी गुजार देता है। किस मजबूरी मे? नही मल्लब भिये, अभी हाल फिलहाल ऐसा कुछ हुआ नहीं है पर कभी कभी मेरे दिल मे ख्याल आता है, की ये सब क्या हो रेल्ला है बाप। मल्लब हम तो बस यूँ ही फिरकी ले रहे हैं भिया.........
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