लिखने का शौक बचपन से ही था। पहले अपनी डायरी लिखता था और सोचता था की एक दिन पत्रकार बनूँगा। पर शौक तो शौक होते हैं। सोचने से थोड़े ही पत्रकार बना जा सकता है। कभी उस लेवल का लिख ही नहीं पाया। फिर अब फेसबूक पर कुछ तथाकथित लिखने वाले लोगों से दोस्ती की। सोचा की वाह क्या गज़ब लिखते हैं। कुछ दिन इनको फॉलो करूंगा तो शायद लिखना सीख जाउ। अरे क्या लिखना सीखता भला। ना कोई नया शब्द ना कोई नयी कला। जिसे देखो बस यहाँ की कॉपी वहां पेस्ट वहां की कॉपी यहाँ पेस्ट। और पोस्ट भी क्या? सारे दिन धर्म के नाम पर चिंघाड मचाना या पानी पी पी कर बस मोदी और संघ को कोसना। मतलब हद होती है यार। जिन लोगों के लेखन से इतना इंप्रेस होकर उनको एड किया था वो भी बस ढपोरशंख ही निकले। मन उचट गया है। लग रहा है की लेखकों के नाम पर कचरा जमा कर लिया है मैने अपनी फ्रेंड लिस्ट मे। इस से अच्छा तो मै अपनी डायरी मे लिख कर ही खुश था।
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