नरेन्द्र
मोदी राजनीति के बहोत ही चतुर खिलाडी हैं। जूता भीगा
कर मारते हैं। क्यूंकि सूखे जूते से आवाज ज्यादा आती है और चोट कम
लगती है। भीगे हुए जूते से अंदरूनी चोट लगती है। दर्द अइशा की ना किसी
को बता सकते हैं, ना छुपा सकते हैं। अभी देखो एक तो गीता ले कर गये गिफ्ट
करने को। उपर से बयान एसा दे डाला। हंसते हुए बोले की भारत मे सेकुलर्स
की भी रोजी रोटी चलनी चाहिये। भाई जूता भिगोने की क्या जरूरत थी भला? इतनी
दूर बैठ कर भी नही छोड़ा। कितना दर्द हुआ होगा, कभी सोचा है। जब इतनी
दूर गये हो तो कुछ मुद्दा हमे भी दे देते चिल्ल पों करने को। कुछ नही
छोड़ा। सब अपना ही नाम कर लिये बस। उपर से चिड़ाने के लिये इतनी जोर से
कान के नीचे ड्रम और बजा दिये। निवेश इतना लाये की पीछे जीरो कितनी है वोही
समझ नहीं आ रहा है। विरोधी समझ नहीं पा रहे हैं की किस बात पर विरोध
करें।
सभी
मित्रों से अनुरोध है की मोदी का विरोध इसलिये ना करे की विरोध करना है। या
तो तैयार रहें आने वाले और भी ज्यादा रोमांचक दिनो का आनंद लेने के लिये या खेलते
रहें आलू – टमाटर और साम्प्रदायिकता से।
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