Friday, 12 September 2014

बटेर और बिल्ली की राजनीति

बटेर बिल्ली से खुद को बचाने के लिये अपनी आँखे बंद कर लेता है। वो ये सोचता है की अगर मैं बिल्ली को नहीं देख पा रहा हूँ तो संभवतया बिल्ली भी मुझे नहीं देख पा रही है। जान बूझ कर आँखे बंद की जा रही हैं लव जिहाद के मुद्दे पर। पर बिल्ली (जनता) मूर्ख नहीं है। सब देख रही है। कब झपट पड़े कोई नहीं जानता। गरबा पर भी बहस!!? ये भी तोड़ने वाली राजनीति!!? अजीब किस्म के मूर्ख लोग हैं यार। मुझे बताओ दूसरे धर्म का ऐसा कोन सा आदमी है जो गरबा मे जाकर नाचना चाहता है? शरीफ नीयत से। है कोई ऐसा? जो आदमी उस धर्म को मानता नहीं। जो आदमी पूजा मे विश्वास नहीं रखता वो सिर्फ मज़े लेने के लिये गरबा मे जायेगा!! ये तो हद हो गयी। उषा ठाकुर ने क्या गलत कहा ये चीज़ अभी तक समझ मे आ नहीं रही है। ये क्या कोई डांस प्रतियोगिता है जो वहां जाकर अपना जलवा दिखाना है? जो लोग आंखे बंद कर के छुपने का नाटक कर रहे है वो ये अच्छी तरह समझ लें की बिल्ली सब जानती है। एक बार जो झपट पड़ी तो बटेर गया काम से।गलत को गलत कहने मे हर्ज क्या है ये समझ से परे है। अरे बेवकूफों गलत को सही कहना ही सेकुलरिज्म है तो बटेर को भगवान ही बचाये फिर बिल्ली से। 

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