Saturday, 13 September 2014

झूठी शान और बेलगाम खर्चे


झूठी शान की वजह से शादियों पर होने वाले बेलगाम खर्चे की सामाजिक बुराई हमेशा से ही मुझे सोचने पर मजबूर कर देती थी। फैसला किया की ज्यादा कुछ नहीं तो इसी बुराई के खिलाफ लोगों को जागरूक करेंगे। कुछ तो योग्दान हमे भी देना ही था भारत निर्माण मे। समय बीता। अपना संकल्प और गहरा होता गया। निर्णय हुआ की शुरुआत स्वयम् से करेंगे। समय का चक्र घुमा ओर शादी का दिन निर्धारित हुआ। सबको समझा दिया गया की कोई फालतू का दिखावा नहीं होगा। कन्या पक्ष को बता दिया गया की एक रुपया नहीं लेना है। कोई दूसरा फालतू का दिखावा भी ना होने पाये। कुछ 15 लोग पहुचे बारात मे। अत्यंत साधारण तरीके से शुभ विवाह संपन्न हुआ। लोगों का बहोत स्नेहाशीस मिला। तारीफ हुई हमारी अक्ल के लिये। कुल जमा 25 हज़ार मे सब अच्छे से निपट गया। तब के बचाये गये पैसे से अब चैन की सांस लेते हैं। कोई किसी का कर्जा नहीं, कोई दबाव नहीं। एक मित्र है अपना। राजस्थान का। पिछले 6 सालों से विदेश मे नौकरी कर रहा है। कोई 40-45 हज़ार कमाता है। मित्र की भी शादी का दिन आया। लगा की अपना परम मित्र है ओर समझदार भी है तो हम लगे अपना प्रवचन पेलने। इस उम्मीद मे की यहीं से समाज को सुधारने का कार्य आरम्भ किया जाये अब। लगभग 2 महीने तक मित्र को समझाया गया। सारे नफे नुकसान बताये गये। जवाब मिलता रहा की इस लड़ाई को मिल कर लडेंगे। बड़ी खुशी हुई सुन कर। एक दिन अचानक पता लगा की शादी से पहले ही अपने मित्र के परिजन 19 लाख के गहने ले आये हैं। होने वाली बहू की रस्म के लिये। सुन कर पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी। मित्र से बात की गयी। जवाब मिला की भाई घर वालों को भी तो खुशी का मौका देना चाहिये। शादी कोन सी रोज रोज होतीहै। और फिर रिश्तेदारों को क्या जवाब देता। कुछ दिनों मे शादी भी संपन हुई। पता लगा की 2 भाइयों की शादी मे कुल जमा 35 लाख से उपर का खर्चा कर दिया गया है। 6 साल विदेश मे नौकरी करने के बाद भी 12 लाख का कर्जा हो गया है। मित्र अपनी नई नवेली दुल्हन को छोड़ कर फिर से विदेश चला गया है। अब जो कमाई कर रहा है उसमे से आधे से ज्यादा तो सिर्फ ब्याज मे ही चला जाता है। मित्र और उसकी संगिनी इस उम्मीद मे हैं की कब ये कर्जा चुकता हो और कब साथ रहने का सुख मिले। जिस सामाजिक बुराई को बचपन से दूर करने का सपना देखता रहा वो पहले ही प्रयास मे चकनाचूर हो गया। पशोपेश यह है की इस प्रयास को जारी रखा जाये या समाज को छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार पर ही ध्यान केंद्रित किया जाये?        

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