मुझे
याद है जब छोटे थे और अपने या किसी पड़ोसी के घर मे कोई शादी होती थी, तो कैसे वहां
गाँव के लोग, पड़ोसी और रिश्तेदारों का काफी दिन पहले ही जमघट लगना शुरू हो जाता था।
सब के अंदर काम करवाने की होड़ लगी रहती थी। कोई पड़ोस से बिस्तर मांग कर ला रहा है
तो कोई बेलन या चाकू। हलवाई के लिये। ये सब कब बंद हो गया पता ही नही चला। पूरा काम
रेडीमेड होता है। ठेकेदार को शादी का ठेका दे दो सब काम खुद से हो जायेगा।
काम तो काफी सरल हो ग्या है परन्तु रिश्ते कहीं खो गये हैं। शादी मे कोई
आता भी है तो घर से बस एक ही सदस्य आता है और वो भी बस हाज़िरी लगाने। अभी पड़ोस की
एक बहन की शादी थी। किसी ने आंटी को बोला की बुआ को बुला लो। आंटी ने झिढ़क
दिया, कहने लगी अभी तो 2 दिन पड़े है। अभी से क्या करेगी यहाँ आकर? पूरे दिन बस सोचता
रहा की रिश्तों की आत्ंयिता कहाँ खो गयी है? क्यों आज सारे रिश्ते बस एक बोझ बन कर
रह गये हैं?
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