दो साल पहले की बात है एक करीबी दोस्त को कोई गंभीर बीमारी हो गयी। दुनिया भर के टेस्ट, चेक-उप और इलाज करवाने के बाद आखिरकार ये निष्कर्ष निकला की Food Poisoning हुई है। फाइनली एक नामी डॉक्टर ने इलाज शुरू किया। 6 महीने तक दवाई चली। 6 महीने बाद दोस्त तो ठीक हो गया पर फूल कर भैंसा हो गया। सबने सोचा की नॉर्मली हो गया होगा। मैने दोस्त को बोला की तेरा डॉक्टर जो दवाई देता है वो क्रॉस चेक करवा लेना कहीं से। कुछ दिन बाद फिर से पेट मे दर्द उठा तो घरवाले भागे डॉक्टर के पास। डॉक्टर ने कुछ दवाई दी और घर भेज दिया। दोस्त ने सारी दवाइयां एक एक कर के गूग्ल पर चेक की। पेट दर्द के लिये उसका डॉक्टर जो दवाइयाँ दे रहा था वो ये निकलीं - Pain killer, Antibacterial, Paracetamol, Constipation, Vomit, मुह के छाले, भूख लगने वाली......और भी कुछ। अब जिनको पता है ये दवाईयाँ किस काम आती हैं वो मामले की गंभीरता को अच्छे से समझ सकते हैं। आगे जो हुआ सो हुआ, लेकिन इस छोटे से किस्से ने बुरी तरह झंकझोर दिया है। रह रह कर ये ही दिमाग मे आ रहा है की देश मे उन लाखो करोडो लोगों का क्या हाल हो रहा होगा जिनके पास गूगल नहीं है? जब दिल्ली जैसे शहर मे ऐशा हो सकता है तो भारत के दूर दराज के गाँवो मे ये झोलाछाप कैसे अपना गोरखधंदा मज़े से फैला रहे होंगे। खैर हम भी कभी खोलेंगे अपना NGO और करेंगे Social Work। तब करेंगे लोगों को जागरूक। फेकबूक पर तो लोग लाइक भी ठीक से नहीं करते जागरूक क्या होंगे। बहरहाल, एक और एजेंडा शामिल हो गया है हमारी To Do लिस्ट मे...
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