Tuesday, 7 October 2014

सांस्कृतिक विरासत


मदारी। वही खेल दिखाने वाला। बंदर के गले मे रस्सी डाल कर नचाने वाला। अब आता ही नही है। सुना है सपेरों के साँप वाला खेल दिखाने को भी बंद करवा दिया गया है। भालू वाला तो बहोत पहले ही बैन कर दिया गया था, पशु क़ुर्रता के नाम पर। बच्चे बड़े हो रहे हैं। घर मे अगली पीढी चहलकदमी करने लगी है। क्या बताएंगे उनको। कैसे यकीन दिलवाएंगे की कोई आता था गाँव मे खेल दिखाने। कोई फोटो भी तो नही है उस समय की। गुल्ली-डंडा, कंचा ओर पिट्ठू जैसे बहोत से खेल गाँव का कोई बच्चा खेलता नहीं है। जन्माष्टमी और तीज पर लगने वाले मेले भी बंद हो गये हैं। चप्पल के पहिये काट कर कोई गाड़ी भी नहीं बनाता है। चकरी ओर कागज का डमरू जैसे देशी खिलोने कहीं मिलते नहीं। किसी ने बताया के पतंग भी अब प्रोफेशनल हो गया है। मोदी और सलमान ही उड़ाते हैं। गुजरात में। पतंग उत्सव के नाम पर। मनोरंजन के लिये बस टीवी देखना और क्रिकेट खेलना ही रह गया है। माहौल पश्‍चिमी और खिलोने चाइनीज हो गये हैं। अगली पीढी को सांस्कृतिक विरासत कैसे मिले?

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