Wednesday, 16 September 2015

कांग्रेस : फुट डालो और राज करो

इतिहास गवाह है की अलगाववाद, अल्पसंख्यकवाद, जातिवाद और आरक्षण के जहर का बीज हमेशा से एक ही पार्टी के दवारा बोया गया है. और फिर बाकि तमाम पार्टियों ने जहर की इस बहती नदी में जम के हाथ धोये. फुट डालो और राज करो की नीति को सही मायने में अगर किसी ने अपना कर्म सिद्धांत बनाया है तो वो यही सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है. कांग्रेस के मंत्री जब सत्ता में रहते हैं तो राजा बन कर रहते हैं. प्रजा पर जुल्म करना इनका धर्म होता है. रामदेव के आंदोलन में आधी रात को लाठियां चलवाना इसकी एक बानगी भर है. अरबों खरबों के घोटालों से इनका साम्राज्य दिन दोगुनी रात चौगुनी उन्नति करता है. जब यही पार्टी विपक्ष में रहती है तो समाज को धर्म और जाती के नाम पर बाँट कर घर फूँक तमाशा देखती है. राजस्थान का गुजर और हरियाणा का जाट आरक्षण इनकी हालिया सफलता है. साथ ही गुजरात के पटेल समुदाय का आरक्षण के लिए मुंह उठाता आंदोलन साजिशों की लम्बी फेरहिस्त में एक और नाम है. अटूट सत्य यह है की हरियाणा का जाट या गुजरात का पटेल कभी भी सामाजिक या आर्थिक रूप से इतना पिछड़ा नहीं रहा की उसको आरक्षण के टुकड़ों के सहारे पलने की जरुरत महसूस हो. गुजरात के पटेलों ने अपने बिज़नेस कौशल के दम पर जहाँ न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी गुजराती भारतीय समाज का नाम चमकाया है वहीँ जाट समुदाय अपनी दिलेरी, स्वाभिमान और कृषि संबधी कौशल से हर जगह छाया हुआ है. इसी क्रम में जाते जाते हरियाणा के सिक्खों के लिए अलग SGPC का गठन सिक्ख समुदाय को बाँटने का कांग्रेस का एक और समाज विरोधी षड्यंत्र था. धर्म के नाम पर हाल ही में जैन समुदाय को आरक्षण की भट्टी में कांग्रेस द्वारा झोंक दिया गया. जो जैनी कल तक अपने को सनातन का अभिन्न अंग समझते थे वो षडयंत्रो के दलदल में इस कद्र फंस चुके हैं की केदारनाथ जैसे सर्वोच्च मंदिरों को जैनियों की सम्पति बता कर हथियाने की जुगत में लग चुके हैं. इस काम को अंजाम देने के लिए न जाने कितने ही जयचंद समाजसेवा का मुखोटा लगाये हमेशा तैनात रहते हैं. भारतीय राजनीती जिस बिसात पर बिछी हुई है वहां एक समाज के रूप में मोहरों से ज्यादा हमारा कोई अस्तित्व नहीं लगता. इन्ही मोहरों से चालें चल कर वोटों की फसल तैयार की जाती है. हाल ही में ये मोहरे एक आतंकवादी को हीरो बना कर बोई हुई फसल का पकने का संकेत दे चुके हैं. इस सफलता से कांग्रेस जैसी पार्टियां किस कदर उत्साहित हैं ये सदन में दिख रहा है. जहाँ सिर्फ 44 सांसदों ने 270 सांसदों वाली भाजपा को भूमि अधिग्रहण जैसे बहुप्रतीक्षित बिल को वापिस लेने पर मजबूर कर दिया है. हम एक समाज के रूप में कभी भी फट सकने वाले बारूद के उस ढेर पर बैठे हुए हैं जहाँ से चालें चलने वालों की मोटी तोंद के पीछे वोटों के भूखे भेड़िये दिखाई नहीं देते.

Tuesday, 21 July 2015

तेरी यादों की परछाई


"प्यार" एक कठिन और निर्मम शब्द है...सुनने में भले ही अच्छा लगे पर जब अपना असर छोड़ता है तो निमोनिया के P की तरह जिंदगी साइलेंट हो जाती है.....पायल तो तुम आज भी पहनती होगी, पर अब उनकी छनछनाहट पर दिल कौन न्योछावर करता होगा...हंसती भी होगी पर अब वो खिलखिलाहट कहाँ होती होगी...शरारत करना तो तुम्हारा नेचर है पर अब उन शरारतों पर जान कौन छिड़कता होगा....आज भी जब तुम्हारी याद आती है तो काले चश्मे पहनने पड़ते हैं. नदी के किनारे खड़े होकर हरे भरे पेड़ खेत खलिहानों को घंटो ताकना और मुस्कुराते रहना ही तुम्हारी याद है....गीली मिटटी की खुशबु, रिमझिम बारिश, शिव का मंदिर, शताब्दी का सफर...सब तुम्हारी यादों का ही रूप है.....शायद परछाइयों का पीछा करना ही जिंदगी है और परछाई कभी पकड़ में आती नहीं....
तेरे होने से ही मेरा होना है, तू जो है तो मैं हूँ, यूँ जो है तो मैं हूँ!!

Thursday, 16 July 2015

तेरे होने से ही मेरा होना है

केबिन के शीशे पे हाथ रख कर बाहर सड़क की और घंटो तक यूँही ताकता रहता हूँ. थोड़ी देर तक तो सड़क पर गाड़ियां और लोग आते जाते हुए दिखाई देते हैं फिर अचानक से पता नहीं सब कहाँ गायब हो जाते हैं. शोर शराबे से भरी हुई वो गन्दी सी सड़क जाने कब एकदम खूबसूरत और शांत हो जाती है. फिर उसी सड़क पर मुझे दिखने लगता है वो जिसे मैं देखने के लिए शीशे के पार अक्सर झांकता हूँ. शांत सड़क पर एकदम बेपरवाह होकर उछल कूद मचाती हुई तुम ......यहाँ से वहां, वहां से यहाँ .. ...बार बार आना फिर जाना....जब भी ऑफिस के सामने से निकलती हो तो नज़रें उठा कर शरारत भरी नज़रों से मुझे देखती हो...जैसे चिड़ा रही हो मुझे....अभी कल की ही तो बात लगती है जब बरसों पहले गीली पहाड़ी सडकों पर तुम यूँ मेरी उँगलियों में अपनी छोटी छोटी उँगलियाँ फंसा कर चलती थी....हाथों को जोर जोर से ऐसे हिलाते हुए जैसे परेड कर रहे हों हम...पहाड़ों से लौट कर आने के बाद दिल्ली के सड़कों पर भी और समुद्र के किनारे पर भी....जगह बदलती रही पर तुम्हारा शरारत करने का अंदाज नहीं बदला कभी...जब भी याद करता हूँ दिल में दर्द और होटों पर एक मुस्कान आ जाती है....गधी......आज जब तुम नहीं हो तो एक बार उस गीली सड़क को देखता हूँ और एक बार अपनी उँगलियों को...बाहर बारिश की बुँदे काले शीशे से लुढक कर निचे गिर रही हैं ......एक ठंडी साँस का लम्बा सा दौर और शून्य में निहारता मैं...
तेरे होने से ही मेरा होना है
तुझको खोना जैसे खुद को खोना है
तू जो है तो मैं हूँ, यूँ जो है तो मैं हूँ!!

Analysis on NGOs

राजशाही सरकारों और उनके लूटतंत्र के उस समय के दौरान मेरी मुलाकात एक बुद्धिजीवी से हुई. तब पहली बार अंदरखाने की कुछ ख़बरों का पता लगा और साथ ही जाना की कैसे कुछ NGO समाज-सेवा के नाम पर खुले तौर पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं और सरकारें सो रही हैं. उसी समय किसी Green Peace India का नाम भी सुना. सरकार इनके खिलाफ क्यों कार्यवाही नहीं करती ये भी पता चला. खैर, लिजलिजी और घोटालेबाज सरकारों के दौरान जब सब कुछ अंधकारमय नज़र आता था तब एक उम्मीद की किरण दिखाई दी. शक्तिमान की तरह गोल गोल घूमते हुए मोदी जी कमाल की एंट्री के साथ अवतरित हुए. जिन्होंने घोटालों और लालफीताशाही को ही अपना नसीब मान लिया था उनकी श्वाश नली में ऑक्सीजन का संचार हुआ. मैं भी उनमे से एक था. बस अटूट विश्वास से भरे हुए दीदे फाड़ फाड़ कर उस समय का इंतज़ार करने लगे जब हम भी “ये देश है वीर जवानो का” पर नाच नाच कर अलबेले और मस्ताने हो जायेंगे. महर्षि वाल्मीकि की तरह दीमक दिन-बे-दिन खा खा कर बालू का टीला किये जा रही थी तभी एक दिन सुना की सरकार ने कोई 10 हज़ार NGOs के FCRA लाइसेंस कैंसिल कर दिए हैं. फिर उसके बाद 3 हज़ार और फिर 2 हज़ार... मनीष सिसोदिया के कबीर समेत कुल लगभग 15 हज़ार.... कोई 2-5 हज़ार NGOs रातों रात अपनी दुकान का शटर गिरा कर फरार हो चुके हैं. ग्रीनपीस इंडिया के ट्रांसक्शन्स पर रोक लगा दी गई है. सरकार ने IB रिपोर्ट्स में पाया हैं की ग्रीन पीस इंडिया समेत बहोत से NGOs गलत तरीके से फंडिंग करवा रहे हैं एवं कुछ देशविरोधी कार्यों में भी शामिल है. रेत के मकान की तरह वेटिकन के अलबेले मस्ताने सपने भरभरा कर कतरा कतरा होने लगे हैं. हाथी का पांव कुत्ते की पुँछ पर पड़ चुका है. अब बिलबिलाहट के इसी सुर में सरकार विरोधी सुर मिलाने की तैयारी हो रही है. कुछ लालची लोग जो ऐसे NGOs को अपनी सूख चुकी छाती से चिपटा चिपटा कर दूध पिला रहे थे अब इनके समर्थन में भोली भाली जनता और पर्यावरण का मुखौटा लगा कर मुंह उठाने की फ़िराक में हैं. विरोध की आग से गरम हुए तंदूर में भेड़ की खाल में छिपे हुए भेड़िये अपने लिए रोटियाँ और बोटियाँ सेंक रहे हैं. कोई तानाशाह कह रहा है तो कोई जनता विरोधी सरकार कह रहा है. ईंटो से ईंटों के बजने की आती आवाजों के बीच अंधेरे साम्राज्य के दौरान देखे गए हमारे सपने आज पतंग हो गए हैं. इधर प्रधानमंत्री को मिल रही लगातार जान से मार देने की ख़बरों से उनके चाहने वाले चिंतित भी हैं. मन का एक कायर कोना डर की वजह से खींसे निपोर निपोर कर अंदर से लहूलुहान किये जा रहा है.....शह और मात का खेल और गोटियां बन कर बीच में झूलते हम.........

Demographic Dividend

1. एक अनुमान के तौर पर 2040 में जापान विश्व में सबसे अधिक बूढ़ों का देश और भारत सबसे अधिक नौजवानो का देश होगा..... माने यूँ की 2040 में जनसांख्यिकीय अनुपात के तौर पर भारत में विश्व के सबसे अधिक युवा होंगे. जनसंख्या के उस अनुपात को नियंत्रित करना किसी भी देश के लिए सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण और अत्यधिक महत्वपूर्ण टास्क होती है. (इसको और अच्छे से समझने के लिए गूगल पर Demographic dividend के बारे में पढ़ सकते हैं) अगर युवाओं को व्यस्त रखने के लिए कोई उपाय नहीं ढूंढा गया तो इस पीढ़ी के भटकने के डर रहता है. मसलन उस दौर में पहले नंबर पर यह जरुरी है की सभी के लिए समान रोजगार के अवसर उपलब्ध हों. कम से कम लोग बेरोजगार रहें......और भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में बेरोजगारी को किसी भी गलत दिशा में मोड़ना अधिक कठिन नहीं है........ उदाहरण के तौर पर ये जो सीरिया-मिश्र जैसे देश हैं वहां हर रोज गृहयुद्ध चलता है. लोगों गुट बना कर आपस में ही लड़ते हैं. जबकि उनके पास लड़ने का कोई कारण ही नहीं है .....बच्चे पैदा होते हैं, बड़े होते हैं और गुटों में शामिल हो जाते हैं लड़ने के लिए......क्यूंकि कोई काम नहीं है जिसमे युवा व्यस्त रह सके........जापान / चीन विकास की सीमा को इसलिए पार कर सका क्यूंकि उसने अपने लोगों को उसने व्यस्त रखा....इस तरह के संभावित खतरों को भांपते हुए ही आज से आने वाले 30-50-100 साल की पालिसी बनायीं जाती हैं. ये काम वही कर सकता है जिसके पास दूरदृष्टि और कुछ करने की इच्छाशक्ति हो......
2. नेताजी सुभाष बोष ने कहा था भारत के विकास को तेज गति और सही दिशा देने के लिए कम से कम 20 साल तक शाशन करने वाले तानाशाह की जरुरत है बशर्ते उसकी नीति और नियत सही हो....
अब अगर दोनों points को मिला दिया जाये तो मुझे लगता है हमने बहोत सही आदमी को चुना है.....सुना है 2014 में प्रधानमंत्री बनना है मोदी जी ने इसकी प्लानिंग 2006 में ही कर ली थी ...अब अच्छी दूरदृष्टि और इच्छाशक्ति का इस से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है ...... उम्मीद है ये जो पूंजीपतियों की सरकार है वो सही दिशा में बढ़ रही है.....बाकि तानाशाही का क्या है....कुछ लोगों के लिए अघोषित इमरजेंसी तो लगी हुई है ही देश में.....

Friday, 19 June 2015

भारतीय फ़ूड सेफ्टी मेकेनिज्म- भाग 2

एक लोकल कंपनी MNC को मिक्स मसाला supply करती थी. मतलब कई सारे मसालों को पीस कर मिक्स कर के blended spice भेजती थी. Example के तौर पर मटेरियल का नाम है मिक्स Veg सूप पाउडर........ MNC ने अपने standards दे दिए. साथ ही बता दिया की जी हमारा ये मसाला यहाँ से और वो वाला वहाँ से आना चाहिए. ठीक है जी हो जाएगा. पर होता क्या है. पढ़िए ...
सीन 1 - उदाहरण के तौर पर अगर आप गुंटूर की अच्छी क्वालिटी की साबुत हल्दी लेने जाएँगे तो आपको 70 से 80 रुपये प्रति kg मिलेगी. जबकि आपको बेकार क्वालिटी की हल्दी मध्य प्रदेश वैगरह से 40 से 50 रुपये प्रति किलो की दर से मिल जाएगी. लोकल कंपनी ने कुछ टन material अच्छे अच्छे vendors से मँगवाया. बिल्कुल A1 क्वालिटी का. Purchasing और बाकी सारी ज़रूरत के कागजात फाइल मे लगा दिए गये. जो material आया उसका बकयादा lot number generate किया गया. फिर MNC के क्वालिटी विभाग को सूचित किया गया. आ जाओ जी आपका मेटीरियल आ गया है. इस से पहले हम उसको process करें आकर raw material check कर लो..... MNC के क्वालिटी analysts आए..... sampling हुई..... material पास हो गया...... ऑर्डर मिला please proceed for further process. अब लोकल कंपनी ने कोल्ड स्टोर से सड़ा हुआ माल मँगवाया. उसको process करवा दिया. Bacterial load कम करने के लिए ETO प्रोसेस करवा दिया गया. और material dispatch. रिपोर्ट आई material is quality passed.
सीन 2 - जो A1 मेटीरियल स्टोर मे पड़ा था. उसके बैग चेंज किये गये. बैग के उपर नया लॉट नंबर लिखा गया. purchase के और बाकी ज़रूरत के फर्जी पेपर बनाए गये. जिस से मेटीरियल लेना था उसको कुछ गिफ्ट्स भिजवाए गये. बिल generate हुए. सारा काम सेट होने के बाद MNC को inform किया गया. आ जाओ आपका मेटीरियल आ गया है. MNC से क्वालिटी वाले आए. sampling हुई. Material passed. Proceed for further process. स्टोर से सड़ा हुआ माल आया....
सीन 3....सीन 4....सीन 5.....सिलसिला बदस्तूर जारी है....
आप बात करते हो क्वालिटी की ....... साहब यहाँ कमीशनखोरी के आगे जान की बाजी लगती है.

भारतीय फ़ूड सेफ्टी मेकेनिज्म- भाग 1

एक लोकल फ़ूड कम्पनी एक दूसरी काफी बड़ी नामी गिरामी फ़ूड ब्रांड (MNC) के लिए थर्ड पार्टी की तरह काम करती थी. माने देशी कम्पनी MNC के लिए फ़ूड बना कर उसको सप्लाई करती थी. काफी सारे फ़ूड प्रोडक्ट्स के बीच में एक था onion powder. पैकिंग साइज था 17 kg का LDPE+HDPE बैग यानि अपनी देशी भाषा में पन्नी + कट्टा...... लोकल कम्पनी dehydrated onion खरीद करती थी महाराष्ट्र से. फिर उसको थोड़ा process कर के, और उसका पाउडर बना के MNC को सप्लाई करती थी. देशी कम्पनी जो dehydrated प्याज लेती थी उसमे 3 तरह के ग्रेड मिलते थे. a, b और c. A सबसे अच्छा क्वालिटी का 22 rs / kg और C सबसे घटिया क्वालिटी का सड़ा हुआ 5 rs / kg के भाव से. लोकल कम्पनी बाकायदा अपने स्टाफ को पहले MNC में उनका सिस्टम देखने समझने के लिए ट्रेनिंग के नाम पर भेजती थी. इसी ट्रेनिंग की आड़ में पता चला की MNC जब देशी कम्पनी से आये हुए माल की क्वालिटी चेक के लिए सैंपलिंग करती है तो उनके पास एक सैंपलिंग स्पून होती है. अब वो सैंपलिंग स्पून standardized थी सो उसके change होने का चांस ही नहीं था. उस spoon की लम्बाई इतनी कम थी की वो 17 kg के बैग में मुश्किल से ऊपर के 2 या 4 kg तक ही पहुंच पाती थी. एक बार सैंपल क्वालिटी से पास हो जाये तो फिर आगे का प्रोसेस सिस्टम ऐसा था कहीं कुछ पकड़ा ही नहीं जाये. बस यहीं से cost saving का idea generate हुआ. आदेश दिया गया की 17 kg के बैग में निचे 10 kg c ग्रेड के प्याज का पाउडर और उसके ऊपर 7 kg में a ग्रेड का पाउडर मिलाया जाये. आईडिया चल निकला. दिन दुगनी रात चुगनी बरकत होती गयी. वर्षों से अब भी उस कम्पनी में MNC को onion powder भेजने का वही सिलसिला चला आ रहा है. सुना है एक आध बार चोरी पकड़ी भी गयी पर भारतीय तरीके से कुछ ले देकर मामला रफा दफा करवा दिया गया.... कृपया अब ये न पूछें की onion powder से बनता क्या है?
ताकि सनद रहे - ये वही फ़ूड MNC है जो अपनी क्वालिटी चेक करने के method को वर्ल्ड का सबसे best method मानती है. भारतीय लोगों के चोरी करने के तरीके को पकड़ सके ऐसी कोई मशीन अभी तक बनी नहीं........ साहब यहाँ कमीशनखोरी के आगे जान की बाजी लगती है.

राकेश को जन्मदिन के दिन खुला खत

डियर राकेश 

इस से पहले मैं आपको अपने लिखे हुए उल जुलूल शब्दों को लेख का नाम देकर पढ़ने को मजबूर कर दूँ आपको जन्मदिन की हार्दिक बधाई...आपके भविष्य के लिए आपको बहोत शुभकामनायें. भगवान आपको लम्बी और सुख भरी उम्र दे, ऐसी मैं आपके लिए कामना करता हूँ.....

आज जब आपसे कुछ कहने और सुनाने का मौका लिखने के जरिये मिला है तो मैं आपको पहले ही बता दूँ की अपनी एकतरफा बकबक हिंदी में ही करूँगा. because unfortunately I am not enough comfortable in English....

वैसे तो मुझे पता नहीं क्या लिखना है पर मोनी ने बोला है की उसने आपको कोई सरप्राइज देना है, सो कुछ लिखना पड़ेगा. वैसे सोचने वाली बात है की मैसेज कलेक्शन भी एक सरप्राइज गिफ्ट हो सकता है!! हो क्यों नहीं सकता जब  सानिया मिर्जा वर्ल्ड नंबर वन की रैंकिंग हासिल कर सकती है, मनमोहन सिंह भाषण दे सकता है, और आप डांस कर सकते हैं तो मैसेज कलेक्शन भी एक सरप्राइज गिफ्ट हो सकता है. अपनी अपनी जॉब की वजह से हमारी बहोत ज्यादा मेल मुलाकात नहीं हो पायी है.  देखा जाये तो जॉब एक कठिन निर्मम शब्द है. स्पेलिंग भले ही छोटी है लेकिन जब करने लगे तो नॉलेज के K की तरह जिंदगी साइलेंट हो जाती है. इसी साइलेंट जिंदगी में खोया हुआ मैं आपकी शादी में अपनी बहन और आपको "सदा खुश रहो और फूलो फलो" का आशीर्वाद नहीं दे पाया था. खैर जो रुक जाये वो जिंदगी क्या, बात आगे बढ़ी और आपसे फिर नीरज की शादी में मुलाकात हुई. ये मुलाकात जय वीरू की जोड़ी तब बन गयी जब महफ़िल ख़त्म होने के बाद हम दोनों शादी के अगले दिन नीरज की ससुराल पहुचें. जब रास्ते भर गाड़ी में मैं वीरू की तरह बकर बकर करता रहा तो आप शोले के जय की तरह कान में रुई डाल कर मन ही मन मुस्कुराते रहे. वैसे डांस करने से बचने के लिए आपका मम्मी के पीछे छुपना संता बंता के लिए भी प्रेरक क्षण हो सकता है....

नेहा की शादी से होते हुए हमारी मुलाकात फिर युवान के कुंआ पुजन समारोह में हुई. आपकी आवभगत करते हुए VVIP सुरक्षा में लगे काले चश्मे वाले कमांडो का अहसास हुआ. काले चश्मे इसलिए ताकि सामने वाले को पता नहीं चले की निगाह किधर है. फिर इसी दौरान अापसे थोड़ी बातचीत करने का अवसर मिला. आपके टेक्निकल स्किल और नॉलेज का तो मैं पहले दिन से ही टेबल फैन हूँ. इसी फैन और कूलर की सरसराहट के बीच कुंआ पुजन की रस्म शुरू हुई तो मैंने आपसे डिस्को डांसर बनने की गुजारिश की. इस से पहले की मेरी गुजारिश खत्म होती इस बार मैंने आपको डीजे के आगे वाइब्रेशन मोड़ में पाया. मिले सुर मेरा तुम्हारा की तर्ज पर इस वाइब्रेशन में मैंने, रवि ने और जगबीर जी ने भी अपना अपना सुर डाला. और फिर क्या खूब जमा रंग.....आप एक अच्छे दोस्त और रिलेटिव हो. रिलेटिव इसलिए बोला क्यूंकि रिश्तेदार बोलना अब ओल्ड फैशन हो गया. जो आपकी पर्सनालिटी के हिसाब से आपके ऊपर शूट नहीं करेगा. 

राकेश जी, मुझे नहीं पता मुझे क्या लिखना था और क्या लिख दिया और क्यूँ लिख दिया. इतना बड़ा अत्याचार झिलवाने के लिए आपसे सप्रेम माफ़ी मांगता हूँ. बात का सार केवल इतना सा है की आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें. आप और आपके साथ मेरी बहन मोनी सपरिवार सदा खुश रहे. एक बार फिर इसी मंगलकामना के साथ ....बोल सांचे दरबार की ...जय 

खत्म हो गया भाई मुस्कुराना बंद करो. हाहाहा. रोहित.  

Monday, 8 June 2015

सरकारी कार्यप्रणाली के 2 उदाहरण

उदाहरण 1:- 
अपना एक मित्र पासपोर्ट बनवाने गया. लाओ जी जन्म प्रमाण पत्र दिखाओ..... नहीं है जी.... नहीं है तो यहाँ क्या करने आये हो? जाओ पंचायत, ब्लॉक, तहसील, जिला जहाँ से भी संभव हो अपना रिकॉर्ड निकलवाओ और जन्म प्रमाण पत्र ले कर आओ.....मित्र गली गली कूचे कूचे.....2 साल से अपने जूतों के साथ साथ नगर पालिका दफ्तर के फर्श को भी घीस घीस कर पतला कर दिया....पर जन्म पंजीकरण रिकॉर्ड नहीं मिल रहे हैं.....मिलती है तो बस तारीख पे तारीख....अगले सोमवार....15 दिन बाद....अप्रैल के पहले हफ्ते में......दे देंगे....तेरे माँ बाप क्या सो रहे थे उस समय......अभी मिला नहीं......अरे तू फिर आ गया दिमाग खाने......पहले क्यों नहीं लिया अब कहाँ से लेकर दें तुझे....ऐसे नहीं मिलता है बेटे समय लगता है....जब मिल जायेगा तो फ़ोन कर देंगे......
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उदाहरण 2:- 
यहाँ पर एक सैन्य शासक की कहानी आपको रोचक लगेगी. अप्रैल 2005 में पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की भारत यात्रा से पूर्व ही भारत सरकार ने बेहतरीन मेहमाननवाजी के रूप में उन्हें एक ऐसा तोहफा देना ठीक समझा जो वह वाकई जिंदगी भर याद रखें - उनके जन्म का रिकॉर्ड..... बंटवारे से पूर्व भारत में एक साधारण परिवार में जन्मे मुशर्रफ कहीं के सितारे नहीं थे - पर फिर भी भारत सरकार को पूरी आशा थी उनके जन्म के सभी रिकॉर्ड्स मिल सकते हैं. तब प्रधानमंत्री कार्यालय के इशारे पर करीब 6 सरकारी नौकर नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल के जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र ऑफिस के 12 मोटे मोटे लेजरों को छांटने के काम पर लगा दिए गए. एक प्रवक्ता ने जल्दी ही मिडिया को सूचित किया कि NDMC के पास 1917 के बाद के सारे रिकॉर्ड सुरक्षित हैं. परिणाम स्वरूप जनरल मुशर्रफ को डाo मनमोहन सिंह ने उनके जन्म के पंजीकरण रिकॉर्ड भेंटस्वरूप दिए.... नेताजी रहस्य गाथा ....

Book - सलाम बस्तर by राहुल पंडिता

सामंतवाद सबसे बड़ा कारण है जिसने नक्सलवाद के शुरू होने में भूमिका निभायी. नक्सल विचारक और कवि वरवरा राव ने अपनी जेल डेयरी में एक बड़े सामंत विश्नुरु देशमुख के खेतों में काम करने वाली मजदूर महिलाओं की पीड़ा का जबरदस्त वर्णन किया है. एक बार की घटना है जब उन महिलाओं ने उससे विनती की किअपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए वह उन्हें थोड़ी देर के लिए खेत से बाहर जाने दे. बताया जाता है कि उसने एक मिट्टी का घड़ा मंगवाया और उन औरतों से कहा कि वे उस घड़े में अपने स्तन से दूध निकाल कर भरें. इसके बाद उसने उन औरतों के हाथ से घड़ा छीना और दूध अपने खेत में बिखेर दिया.........

दिल्ली पुलिस का एनकाउंटर और मिडिया

अभी कल परसों में एक एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस ने एक शातिर अपराधी को मार गिराया. मिडिया ने हाय तौबा मचा मचा कर दिल्ली पुलिस को दोषी ठहरा दिया है. जिस देश में पुलिस पर फैसला मिडिया और 2 कौड़ी के नेता करते हो वहां अपराध और अपराधी बंद नहीं हो सकते. घर वाले कह रहे हैं की मनोज तो कोई आतंकवादी नहीं था जी बस छोटा मोटा अपराधी था. जिस दिन घर वाले सीना ठोक के कहने लगेंगे के हमारा बेटा अपराधी है डालो साले को अंदर उस दिन आएंगे अच्छे दिन. मेरे एक परिचित दिल्ली पुलिस में ठीक ठाक रैंक पर हैं.उनके बॉस काफी ऊँची रैंक पर हैं. उन्होंने एक बार बताया था की भाई काम करने का मज़ा सिर्फ भाजपा के राज में ही है. कभी बेइज्जत नहीं होना पड़ता. काम करने की खुली छूट मिलती है. एक छोटा सा पुलिस वाला भी सीना ठोक के काम करता है. मेरे परिचित के बॉस के पास तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी जी का डायरेक्ट मोबाइल नंबर था. कितनी भी रात को कुछ भी दिक्कत होती डायरेक्ट आडवाणी को सूचित किया जाता. आदेश मिलता काम गलत नहीं होना चाहिए. खुल के काम करो. मैं तुम्हारे साथ हूँ. मेरे परिचित कहते हैं की अगर हमें ऐसे ही काम करने की छूट मिलती तो अपराध होना बंध हो जाएँ. पर नेता नहीं चाहते की ऐसा हो. अगर बिना जाँच हुए, मिडिया की बातों में आकर आप भी कल वाले एनकाउंटर में पुलिस पर सवाल उठा रहे हो तो You are what is wrong with our country.

हम भारत गणराज्य के मुफ्तखोर लोग .......भाग 3 (गुज्जर आरक्षण)

तो आखिरकार रेल की पटरियों और सड़कों पर शांतिपूर्वक किये गए सत्याग्रह की वजह से गूजरों को भी आरक्षण मिल ही गया. ये मेरे जैसे उन हज़ारों लोगों के मुँह पर झनझनाता तमाचा है जो बेचारे गूजरों पर जोक बना रहे थे और बोल रहे थे की रेलवे ट्रैक पर आरक्षण नहीं मिलता. अब जाटों की बारी है. हरियाणा में भी भाजपा की ही सरकार है. खट्टर को CM बनाने के बाद हरियाणा के जाट वैसे भी भाजपा से नाराज चल रहे हैं. तो दोनों पक्ष मोल भाव करो और अपना अपना हक़ ले लो. साथ ही भाजपा एक ऐसी पार्टी है जो न तो बेशर्म और ढीठ है और न ही इनमे कलेजा है की जो कोई जोर जबरदस्ती कर के आंदोलन खत्म करवा दिया जाये. ऐसे मामलों में घुटने टेकने का भाजपा का इतिहास पुराना रहा है. पहले एक दौर की वार्ता फिर दूसरे, तीसरे......और पता नहीं कितने दौर की वार्ता उसके बाद ये पड़ें हैं आपके चरणों में. फिर ब्राह्मणों - पंजाबियों - बनियों की बारी आये. जब सारी जातियों का हो जाये उसके बाद धर्म के आधार पर आरक्षण होना चाहिए. मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैनियों इत्यादि सभी को आरक्षण मिलना चाहिए................. उधर गर्मी और लू की वजह से सुनने में आ रहा है देश भर कोई हज़ार लोग मर गए. मैं ये सोच कर हैरान हूँ की अभी तक सरकार ने मुआवजे की घोषणा क्यों नहीं की है? न ही किसी ने इसकी मांग की है अभी तक!! अगर कोई NGO कर्मी इस पोस्ट को पढ़े तो भाई आपसे भी आग्रह है की तुरंत सक्रिय हो जाएँ. आखिर हराम की मलाई पर सबका बराबर का हक़ होना चाहिए. देश, मेहनत, विकास सब बाद में सबसे पहले आरक्षण और मुआवजा. We Parasite people of Indian Republic demands solatium and reservation to all ........

Saturday, 16 May 2015

हम भारत गणराज्य के मुफ्तखोर लोग .......भाग 2 (जुआन परोन और उनकी पत्नी मदर एविटा)


1950 के आस पास एक हुए जुआन परोन. अर्जेंटीना के राष्ट्रपति......उनकी पत्नी ईवा........... ऐसा माना जाता है की जब जुआन और ईवा सत्ता में थे उन दिनों अर्जेंटीना विश्व की समृद्धतम अर्थव्यवस्था हुआ करती थी......... फिर अचानक से first lady Ms ईवा को मसीहा यानि saint बनने की सूझी............... संत भी ऐसी वैसी नहीं पूरी तरह उदार ....... कोमल ह्रदय वाली......... ऐसा कोमल ह्रदय की बताते हैं ईवा गरीबों, भिखारियों को किस्सी (Kiss) तक देती थी। बदले में उनको भी किस्स्सी लेने के लिए allow करती थी............. राष्ट्रपति की बीवी यूँ घंटो तक खुलेआम सड़कों पर गरीबों को चुम्मियाँ बांटते फिरे कोई छोटी बात है..........? ईवा ने गरीबों की ऐसी सुनी की अपने एक फाउंडेशन के माध्यम से सब कुछ फ्री में बाँटना चालू कर दिया.................... विश्व की समृद्धतम अर्थव्यवस्था को जुआन परोन और ईवा ने माल ए मुफ्त लुटाकर कुछ ही वर्षों में कंगाल कर दिया........ अर्जेन्टीना फिर नहीं उबर सका.......... जुआन की पत्नी ईवा उसके लिए ज़िम्मेदार थी पर अपनी 'दयालुता' के लिए आज भी वहां मदर एविटा के रूप में याद की जाती है.......

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एक मित्र की वाल से पता लगा की दिल्ली में बिजली कंपनी पुराने एसी बदल कर नए AC देगी........ फ्री में. पहले आओ, पहले पाओ.............. और ऐसा कर के बिजली कंपनी बिजली का बिल घटाएगी. यह दावा आम आदमी पार्टी के द्वारा बिहार में किया जा रहा है................ माने बिहार की जनता को ये बताया जा रहा है की हमने दिल्ली में फ्री के AC बांटे हैं अब आप यहाँ भी मांग करो. या की यूँ की बिजली पानी के साथ AC भी फ्री होना चाहिए. या यूँ की फ्री की चीज़ों पर सबका हक़ है चाहे दिल्ली हो या बिहार............. हमें चाहिए मुफ्त, मुफ्त सब कुछ मुफ्त.............. और जब हम सत्ता में आएंगे तो खूब मुफ्त का माल लुटाएंगे................ माने गरीबों को खूब चुम्मियाँ देंगे............... केजरीवाल जी भारत के वो संत हैं जो आने वाले समय में मदर एविटा के रूप में जाने जायेंगे............... 
दक्षिण अमेरिका का इतिहास जानने वाले जानते की यह कहानी अर्जेंटीना में घटित हो चुकी है। सावधान मुफ्तखोरों।

हम भारत गणराज्य के मुफ्तखोर लोग .......भाग 1(मुआवज़ा And Reservation)

मुआवज़ा Issue is equivalent to reservation Issue. No one can oppose openly. खेती मे इस बार फिर नुकसान हुआ. बताते हैं जितना नुकसान इस बार हुआ उतना ही नुकसान लगभह हर तीसरे चौथे साल होता ही रहता है. कितनी बार तो मैने खुद देखा गेहूँ को खेत मे कुंभकर्णी नींद सोते हुए. ऐसी नींद की कटाई के समय गेहूँ उठाए ना उठे. पर मज़ाल जो कभी किसी सरकार ने सोई हुई फसलों की तरफ मुँह भी फेरा हो. लेकिन इस बार सरकार आई, बड़े बड़े सरकारी अमले गमले सब आए. और भैया य्य्य्य्ये बड़े बड़े आँसू टपकाते हुए हमेचैक थमा दिए. हमने बोला माई बाप ये क्या करते हो, हमे भीख नही चाहिए. तभी धीरे से कोई कान मे फुसफुसाया अरे बेवकूफ़ ये भीख नही मुआवज़ा है. ले ले. अच्छा!! पर आज तक कभी नही मिला. तब भी नही जब 100% का नुकसान हुआ हो. जिस तरह मुआवज़ा के लिए लोग हाथ फैलाए पड़े हैं उसे देख कर लगता है अब हर बात के लिए मुआवज़ा चाहिए. बारिश ना हो तो सूखे के नाम का. बारिश हो तो फसल के नुकसान के नाम पर. बीजेपी ने 15 दिया, केजरी ने 20 तो ममता दीदी 50 देंगी. किसी सरकार मे हिम्मत नही की इस बंदरबाँट पर क़ानून बनाए. जिधर देखो लपलपाति जीभें मूफ़्तखोरी मे लार टपकाती घूम रही हैं. व्यापारी लटक गया. लो भैया 10 लाख, सरकारी नौकरी के साथ. रोडवेस का ड्राइवर मार दिया लाओ भैया 1 करोड़. आने वाले टाइम मे मुआवज़ा एक देशव्यापी समस्या होने वाली है. हम ही वो घुण हैं जो मुआवज़े के साथ पिसेंगे. जिस तरह आरक्षण को शुरुआती 10 साल के लिए लगाया गया था किंतु बाद मे हटाया नही जा सका उसी तरह मुआवज़ा को भी कभी हटाया नही जा सकेगा. जो लोग मुआवज़ा मिलने पर खीँसे निपोरते घूम रहे हैं 20-30-50 साल बाद उन्ही की पीढ़ियाँ इसको बंद करवाने के लिए सरकार मे बैठे किसी मोदी को कोष रही होंगी. मुआवज़ा is another dirty face of Politics and parasite people of Indian Republic.

Friday, 8 May 2015

Green Peace India और शून्य में ताकता मैं.....

राजशाही सरकारों और उनके लूटतंत्र के उस समय के दौरान मेरी मुलाकात एक बुद्धिजीवी से हुई. वो ऊपर के कुछ महकमों के बारे में एक आम आदमी से थोड़ी ज्यादा जानकारी रखते थे. जैसे की सब न्यूज़ चैनेल्स के अपने सूत्र होते हैं ऐसे ही वो हमारे गुप्त सूत्र बन गए. मेरा सूत्र मुझे बताता था की कैसे कुछ NGO खुले तौर पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं और सरकारें सो रही हैं. तब पहली बार किसी Green Peace India का नाम सुना. सरकार इनके खिलाफ क्यों कार्यवाही नहीं करती ये भी पता चला. खैर, लिजलिजी और घोटालेबाज सरकारों के दौरान जब सब कुछ अंधकारमय नज़र आता था तब एक उम्मीद की किरण दिखाई दी. रात के बाद सवेरा हुआ और जैसे अपंग जनता को बैशाखी मिल गयी. शक्तिमान की तरह गोल गोल घूमते हुए मोदी जी कमाल की एंट्री के साथ अवतरित हुए.  जिन्होंने घोटालों और लालफीताशाही को ही अपना नसीब मान लिया था उनकी श्वाश नली में ऑक्सीजन का संचार हुआ. मैं भी उनमे से एक था. बस अटूट विश्वास से भरे हुए हम दीदे फाड़ फाड़ कर उस समय का इंतज़ार करने लगे जब हम भी ये देश है वीर जवानो का वाले गाने पर नाच नाच कर अलबेले और मस्ताने हो जायेंगे. महर्षि वाल्मीकि की तरह हमें भी दीमक दिन-बे-दिन खा खा कर बालू का टीला किये जा रही थी तभी एक दिन सुना की सरकार ने कोई 10 हज़ार NGOs के लाइसेंस कैंसिल कर दिए हैं. और साथ ही ग्रीनपीस इंडिया के भी सारे ट्रांसक्शन्स पर रोक लगा दी है. माने सरकार ने IB रिपोर्ट्स में ये पाया की ग्रीन पीस इंडिया देशविरोधी कार्यों में शामिल है. जश्न में सब भारतवासी शामिल होंगे ये सोच कर धूम मचाने की तैयारी में ही थे की आज FB पर एक पेज के दर्शन हुए Greenpeace India. कुछ 3 लाख लाइक्स हैं पेज पर. रेत के मकान की तरह मेरे अलबेले मस्ताने सपने भरभरा कर तब कतरा कतरा होने लगे जब देखा की वही लालची लोग जो ऐसे NGOs को अपनी सूख चुकी छाती से चिपटा चिपटा कर दूध पिला रहे थे अब इनके समर्थन में भोली भाली जनता और पर्यावरण का मुखौटा लगा कर उठ खड़े हुए हैं. कुछ रंगे सियार मेरी फ्रेंड लिस्ट में से भी निकले हैं. लोग जमकर विरोध कर रहे हैं सरकार का. कोई तानाशाह कह रहा है तो कोई जनता विरोधी सरकार कह रहा है. इस सब के बीच विरोध की आग से गरम हुए तंदूर में भेड़ की खाल में छिपे हुए वही भेड़िये अपने लिए रोटियाँ और बोटियाँ सेंक रहे हैं. ईंटो से ईंटों के बजने की आती आवाजों के बीच आज अपने आप से मैं बस ये ही पूछ रहा हूँ की क्या मेरी तरह हर उस भारतीय के वो सपने जो उन्होंने अंधेरे साम्राज्य के दौरान देखे थे उनको ऑक्सीजन मिलेगी? मन का एक कायर कोना आज खींसे निपोर निपोर कर अंदर से लहूलुहान किये जा रहा है और कह रहा है रोहित ये नहीं होगा. इच्छाशक्ति नहीं है, पहले शक्ति नहीं थी अब इच्छा नहीं है. पहले सरकार कमजोर थी अब हम कमजोर हैं. शह और मात का खेल और इन सब के बीच शून्य में ताकता मैं.....

Thursday, 7 May 2015

केजरीवाल का मंकी बिज़नेस

एक समय की बात है, एक गाँव में एक आदमी आया और उसने गाँव वालों से कहा कि वो बन्दर खरीदने आया है, और वो एक बन्दर के 10 रुपये देगा. चूँकि गाँव में बहुत सारे बन्दर थे इसलिए गाँव वाले तुरंत ही इस काम में लग गए. उस आदमी ने 10 रूपये की rate से 1000 बन्दर खरीद लिए अब बंदरों की supply काफी घट गयी और धीरे धीरे गाँव वालों ने बन्दर पकड़ने का प्रयास बंद कर दिया. ऐसा होने पर उस आदमी ने फिर घोषणा की कि अब वो 20 रूपये में एक बन्दर खरीदेगा. ऐसा सुनते ही गाँव वाले फिर से बंदरों को पकड़ने में लग गए.
बहुत जल्द बंदरों की संख्या इतनी घट गयी की लोग ये काम छोड़ अपने खेती -बारी में लगने लगे. अब एक बन्दर के लिए 25 रुपये दिए जाने लगे, पर उनकी तादाद इतनी कम हो चुकी थी की पकड़ना तो दूर उन्हें देखने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती थी.
तब उस आदमी ने घोषणा की कि वो एक बन्दर के 50 रूपये देगा. पर इस बार उसकी जगह बन्दर खरीदने का काम उसका assistant करेगा क्योंकि उसे किसी ज़रूरी काम से कुछ दिनों के लिए शहर जाना पद रहा है. उस आदमी की गैरमौजूदगी में assistant ने गाँव वालों से कहा कि वो पिंजड़े में बंद बंदरों को 35 रुपये में उससे खरीद लें और जब उसका मालिक वापस आये तो उसे 50 रुपये में बेंच दें. फिर क्या था गाँव वाले ने अपनी जमा पूँजी बदारों को खरीदने में लगा दी. और उसके बाद ना कभी वो आदमी दिखा ना ही उसका assistant, बस चारो तरफ बन्दर ही बन्दर थे .
सर जी हमने आपको 370 पेजों के सबूत के साथ पहले आपको शीला दिक्षित जी दीं, फिर भ्रष्ट अम्बानी-अडानी दिए, फिर सलमान खुर्शीद (विकलांग साइकिल घोटाला वाले) दिए, फिर सोमनाथ भारती जी (रात के अँधेरे वाले इंस्पेक्टर), राखी बिड़लान जी (स्कोर्पियो वाली), तोमर (फर्जी डिग्री वाले) और अब विश्वाश जी एक कथित विडिओ के साथ सौंप दिए हैं. मान्यवर, आपसे यही गुजारिश है की आजकल आप तो कहीं दिखते नहीं आपका assistant (संजू पहलवान) हमें नए नए तरीके बताता रहता है. कहीं ऐसा न हो की आप और आपका assistant कहीं दिखे न बस चारों तरफ ये बन्दर ही बन्दर दिखते रहे. कुछ होगा या बस यूँही ये मंकी बिज़नेस वाला कौशल दिखाते रहोगे?

चरखी दादरी में दो हवाई जहाजों की टक्कर और हमारा सूचना तंत्र

उस समय सातवीं क्लास में पढता था. ज्यादा कुछ ज्ञान भी नहीं था इसलिए सब कुछ ठीक से याद नहीं. पर जैसा याद है वैसा लिख देता हूँ...... चरखी दादरी (हरियाणा) के आस पास आसमान में Saudi Arabian Airlines और Kazakhstan Airlines के दो जहाज टकरा गए थे...... बताते हैं की विमान इतिहास में आजतक की तीसरी सबसे बड़ी दुर्घटना थी. इसमें सवार दोनों विमानों के सभी 349 लोग मारे गए थे. टक्कर इतनी भीषण थी की हमारा गांव जो लगभग 50 KM दूर है वहां से भी एक बार को आसमान पूरा लाल दिखाई देने लगा था........... उसके दो चार दिन बाद जब मिडिया प्रलाप चल रहा था तब एक दिन अख़बार में पढ़ा की जहाज की दुर्घटना की खबर भारतीय प्रधानमंत्री को अमेरिका से मिली. माने भारत के प्रशासन से पहले खबर अमेरिका या उसके नासा सेंटर को लगी थी...... अब तक इस खबर को 100 % सच नहीं मानता था. ऐसा भी भला हो सकता है? दुर्घटना भारत के आकाश में हो और खबर पहले नासा को पता लगे? ना ना ऐसा नहीं हो सकता. कोरी गप ही होगी. मिडिया ने यूँही सनसनी बनाये होगी........ पर अब सुन रहा हूँ की नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को वहां आए विध्वंसकारी भूकंप की जानकारी भारत के पीएम नरेंद्र मोदी के ट्वीट्स से मिली थी। अब क्या किया जाये? यूँ की एक खबर सच्ची एक झूठी मानी जाये? या की यूँ की दोनों खबर झूठी? या फिर दोनों खबर सच? और एक यूँ की दोनों ख़बरों की तुलना ही ना की जाये?

Nepal Earthquake and हमारे एक Canadian मैनेजर की wordings


जब नाटो ऑपरेशन के तहत दुबई-अफ़ग़ानिस्तान में काम करते थे तो यूरोपियन लोगों के साथ काम करने का मौका मिला. दुनिया के तमाम देशों के लोग साथ काम करते थे. इंग्लैण्ड, अमेरिका, यूरोप के बाकि काफी सारे देश. इस दौरान निर्भया केश हुआ, केदारनाथ आपदा भी आई. लोग चटखारे ले लेकर मज़े लेते थे. उनके टीवी सारे दिन यही न्यूज़ चलाते थे. 
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हमारे एक Canadian मैनेजर की wordings - "Why the hell there is no disaster management in India. You people always seeking help from another countries. India is a country of nothing" कल रात उसी शख्स से Skype से बात हुई. Wording देखिये - "Hey buddy, I heard there was a massive earthquake in India and Nepal...So hws u and family?" We all r safe John. Thank you. "Hey hows Mr. Modi is doing? I heard a lot about him. He been here a few days back. I heard the way your disaster teams responded in Nepal. It was great buddy. Now you guys are getting strong day by day. No no I m nt joking. I mean my words mate. U can c the way India responded in Nepal. Hey Rohit Bets of Luck Buddy.c u later."
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वैसे तो अभी तक कोई अफ़सोस नहीं हुआ. लेकिन आज फिर गर्व हो रहा है की हम मोदी के साथ हैं. बाकि अंधविरोधियों आप विरोध करते रहें और हमसे 56 " के सीने का हिसाब मांगते रहें.

नेशनल कॉन्फ्रेंस का नामकरण

उमर अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस का नामकरण कैसे हुआ. 
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शेख अब्दुल्ला ने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा ली. वहां से पढ़कर निकले अब्दुल्ला ने कश्मीर पहुँचते ही जम्मू कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस नामक संस्था स्थापित की. कुछ समय बाद कुछ मतभेदों की वजह से मुस्लिम कॉन्फ्रेंस टूट गयी और चौधरी गुलाम अब्बास इसके सर्वेसर्वा बन गए. चौधरी ने गांधी जी के पदचिन्हो पर चलते हुए कानून भंग आंदोलन का शंख फूंका पर उसे जनता का समर्थन न मिला. सरकार ने अब्बास को गिरफ्तार किया और 6 महीने के लिए जेल भेज दिया. इधर शेख अब्दुल्ला बड़ी चतुराई से सारी परिस्थिति का जायजा ले रहे थे. अब्बास के पश्चात मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व उनके पास ही आया. उधर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ रहा था. शेख अब्दुल्ला ने इस आंदोलन से जुड़ना लाभदायक समझा परन्तु उनकी संस्था का नाम मुस्लिम कॉन्फ्रेंस होने की वजह से कांग्रेस के साथ उसकी साझेदारी में दिक्कत आ रही थी. इसलिए 1935 में जम्मू कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का नाम बदल कर उसे जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस कर दिया गया. यह नाम आज तक चालू है. यह नाम एक राजनैतिक रणनीति थी उसमे ह्रदय परिवर्तन का कोई अंश नहीं था. 
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(कश्मीर समस्या और समाधान by माधव गोविन्द वैद्य)

Friday, 24 April 2015

हंस-कौवे की प्रतियोगिता और केजरीवाल

हंसों का एक झुण्ड समुद्र तट के ऊपर से गुज़र रहा था, उसी जगह एक कौवा भी मौज मस्ती कर रहा था. उसने हंसों को उपेक्षा भरी नज़रों से देखा “तुम लोग कितनी अच्छी उड़ान भर लेते हो !” कौवा मज़ाक के लहजे में बोला, “तुम लोग और कर ही क्या सकते हो बस अपना पंख फड़फड़ा कर उड़ान भर सकते हो !!! क्या तुम मेरी तरह फूर्ती से उड़ सकते हो ??? मेरी तरह हवा में कलाबाजियां दिखा सकते हो ???…नहीं, तुम तो ठीक से जानते भी नहीं कि उड़ना किसे कहते हैं ! अगर तुम में से कोई भी मेरा मुकाबला कर सकता है तो सामने आये और मुझे हरा कर दिखाए .”
एक हंस ने कौवे की चुनौती स्वीकार कर ली. यह तय हुआ कि प्रतियोगिता दो चरणों में होगी, पहले चरण में कौवा अपने करतब दिखायेगा और हंस को भी वही करके दिखाना होगा और दूसरे चरण में कौवे को हंस के करतब दोहराने होंगे .
प्रतियोगिता शुरू हुई, पहले चरण की शुरुआत कौवे ने की और एक से बढ़कर एक कलाबजिया दिखाने लगा, वह कभी गोल-गोल चक्कर खाता तो कभी ज़मीन छूते हुए ऊपर उड़ जाता. वहीँ हंस उसके मुकाबले कुछ ख़ास नहीं कर पाया. कौवा अब और भी बढ़-चढ़ कर बोलने लगा ,” मैं तो पहले ही कह रहा था कि तुम लोगों को और कुछ भी नहीं आता …ही ही ही …”
फिर दूसरा चरण शुरू हुआ , हंस ने उड़ान भरी और समुद्र की तरफ उड़ने लगा. कौवा भी उसके पीछे हो लिया, "ये कौन सा कमाल दिखा रहे हो, भला सीधे -सीधे उड़ना भी कोई चुनौती है ??? सच में तुम मूर्ख हो !”, कौवा बोला . पर हंस ने कोई ज़वाब नही दिया और चुप-चाप उड़ता रहा, धीरे-धीरे वे ज़मीन से बहुत दूर होते गए और कौवे का बडबडाना भी कम होता गया, और कुछ देर में बिलकुल ही बंद हो गया. कौवा अब बुरी तरह थक चुका था, इतना कि अब उसके लिए खुद को हवा में रखना भी मुश्किल हो रहा था और वो बार -बार पानी के करीब पहुच जा रहा था. आखिर में कौवे को समझ आया की थोड़ी देर के लिए छोटी मोटी बन्दर टाइप उछल कूद मचाने से कहीं बेहतर है उड़ कर लम्बी दुरी तय करना.
उस कौवे को तो समझ आ गया. इस कौवे को कब समझ आएगा मालूम नहीं. सुना है आज फिर जंतर मंतर पर छोटी मोटी उछल कूद का कार्यक्रम रखा है. थोड़ी कलाबाजियां दिखाई जाएँगी. हंस को जम के कोसा जायेगा. 67 सीट आ गयीं. दूसरी बार मुखयमंत्री बन गया. जब वादों की बात आई तो बोलता है 40 % ही पूरा कर पाउँगा जी. इतना ड्रामा खुद की पार्टी में चल रहा है पर पता नहीं दूर तक उड़ना कब सीखेगा. इसको permanent जंतर मंतर पर ही शिफ्ट न कर दिया जाये?