Thursday, 16 July 2015

Analysis on NGOs

राजशाही सरकारों और उनके लूटतंत्र के उस समय के दौरान मेरी मुलाकात एक बुद्धिजीवी से हुई. तब पहली बार अंदरखाने की कुछ ख़बरों का पता लगा और साथ ही जाना की कैसे कुछ NGO समाज-सेवा के नाम पर खुले तौर पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं और सरकारें सो रही हैं. उसी समय किसी Green Peace India का नाम भी सुना. सरकार इनके खिलाफ क्यों कार्यवाही नहीं करती ये भी पता चला. खैर, लिजलिजी और घोटालेबाज सरकारों के दौरान जब सब कुछ अंधकारमय नज़र आता था तब एक उम्मीद की किरण दिखाई दी. शक्तिमान की तरह गोल गोल घूमते हुए मोदी जी कमाल की एंट्री के साथ अवतरित हुए. जिन्होंने घोटालों और लालफीताशाही को ही अपना नसीब मान लिया था उनकी श्वाश नली में ऑक्सीजन का संचार हुआ. मैं भी उनमे से एक था. बस अटूट विश्वास से भरे हुए दीदे फाड़ फाड़ कर उस समय का इंतज़ार करने लगे जब हम भी “ये देश है वीर जवानो का” पर नाच नाच कर अलबेले और मस्ताने हो जायेंगे. महर्षि वाल्मीकि की तरह दीमक दिन-बे-दिन खा खा कर बालू का टीला किये जा रही थी तभी एक दिन सुना की सरकार ने कोई 10 हज़ार NGOs के FCRA लाइसेंस कैंसिल कर दिए हैं. फिर उसके बाद 3 हज़ार और फिर 2 हज़ार... मनीष सिसोदिया के कबीर समेत कुल लगभग 15 हज़ार.... कोई 2-5 हज़ार NGOs रातों रात अपनी दुकान का शटर गिरा कर फरार हो चुके हैं. ग्रीनपीस इंडिया के ट्रांसक्शन्स पर रोक लगा दी गई है. सरकार ने IB रिपोर्ट्स में पाया हैं की ग्रीन पीस इंडिया समेत बहोत से NGOs गलत तरीके से फंडिंग करवा रहे हैं एवं कुछ देशविरोधी कार्यों में भी शामिल है. रेत के मकान की तरह वेटिकन के अलबेले मस्ताने सपने भरभरा कर कतरा कतरा होने लगे हैं. हाथी का पांव कुत्ते की पुँछ पर पड़ चुका है. अब बिलबिलाहट के इसी सुर में सरकार विरोधी सुर मिलाने की तैयारी हो रही है. कुछ लालची लोग जो ऐसे NGOs को अपनी सूख चुकी छाती से चिपटा चिपटा कर दूध पिला रहे थे अब इनके समर्थन में भोली भाली जनता और पर्यावरण का मुखौटा लगा कर मुंह उठाने की फ़िराक में हैं. विरोध की आग से गरम हुए तंदूर में भेड़ की खाल में छिपे हुए भेड़िये अपने लिए रोटियाँ और बोटियाँ सेंक रहे हैं. कोई तानाशाह कह रहा है तो कोई जनता विरोधी सरकार कह रहा है. ईंटो से ईंटों के बजने की आती आवाजों के बीच अंधेरे साम्राज्य के दौरान देखे गए हमारे सपने आज पतंग हो गए हैं. इधर प्रधानमंत्री को मिल रही लगातार जान से मार देने की ख़बरों से उनके चाहने वाले चिंतित भी हैं. मन का एक कायर कोना डर की वजह से खींसे निपोर निपोर कर अंदर से लहूलुहान किये जा रहा है.....शह और मात का खेल और गोटियां बन कर बीच में झूलते हम.........

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