केबिन के शीशे पे हाथ रख कर बाहर सड़क की और घंटो तक यूँही ताकता रहता हूँ. थोड़ी देर तक तो सड़क पर गाड़ियां और लोग आते जाते हुए दिखाई देते हैं फिर अचानक से पता नहीं सब कहाँ गायब हो जाते हैं. शोर शराबे से भरी हुई वो गन्दी सी सड़क जाने कब एकदम खूबसूरत और शांत हो जाती है. फिर उसी सड़क पर मुझे दिखने लगता है वो जिसे मैं देखने के लिए शीशे के पार अक्सर झांकता हूँ. शांत सड़क पर एकदम बेपरवाह होकर उछल कूद मचाती हुई तुम ......यहाँ से वहां, वहां से यहाँ .. ...बार बार आना फिर जाना....जब भी ऑफिस के सामने से निकलती हो तो नज़रें उठा कर शरारत भरी नज़रों से मुझे देखती हो...जैसे चिड़ा रही हो मुझे....अभी कल की ही तो बात लगती है जब बरसों पहले गीली पहाड़ी सडकों पर तुम यूँ मेरी उँगलियों में अपनी छोटी छोटी उँगलियाँ फंसा कर चलती थी....हाथों को जोर जोर से ऐसे हिलाते हुए जैसे परेड कर रहे हों हम...पहाड़ों से लौट कर आने के बाद दिल्ली के सड़कों पर भी और समुद्र के किनारे पर भी....जगह बदलती रही पर तुम्हारा शरारत करने का अंदाज नहीं बदला कभी...जब भी याद करता हूँ दिल में दर्द और होटों पर एक मुस्कान आ जाती है....गधी......आज जब तुम नहीं हो तो एक बार उस गीली सड़क को देखता हूँ और एक बार अपनी उँगलियों को...बाहर बारिश की बुँदे काले शीशे से लुढक कर निचे गिर रही हैं ......एक ठंडी साँस का लम्बा सा दौर और शून्य में निहारता मैं...
तेरे होने से ही मेरा होना है
तुझको खोना जैसे खुद को खोना है
तू जो है तो मैं हूँ, यूँ जो है तो मैं हूँ!!
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