राजशाही सरकारों और उनके लूटतंत्र के उस समय के दौरान मेरी मुलाकात एक बुद्धिजीवी से हुई. वो ऊपर के कुछ महकमों के बारे में एक आम आदमी से थोड़ी ज्यादा जानकारी रखते थे. जैसे की सब न्यूज़ चैनेल्स के अपने सूत्र होते हैं ऐसे ही वो हमारे गुप्त सूत्र बन गए. मेरा सूत्र मुझे बताता था की कैसे कुछ NGO खुले तौर पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं और सरकारें सो रही हैं. तब पहली बार किसी Green Peace India का नाम सुना. सरकार इनके खिलाफ क्यों कार्यवाही नहीं करती ये भी पता चला. खैर, लिजलिजी और घोटालेबाज सरकारों के दौरान जब सब कुछ अंधकारमय नज़र आता था तब एक उम्मीद की किरण दिखाई दी. रात के बाद सवेरा हुआ और जैसे अपंग जनता को बैशाखी मिल गयी. शक्तिमान की तरह गोल गोल घूमते हुए मोदी जी कमाल की एंट्री के साथ अवतरित हुए. जिन्होंने घोटालों और लालफीताशाही को ही अपना नसीब मान लिया था उनकी श्वाश नली में ऑक्सीजन का संचार हुआ. मैं भी उनमे से एक था. बस अटूट विश्वास से भरे हुए हम दीदे फाड़ फाड़ कर उस समय का इंतज़ार करने लगे जब हम भी ये देश है वीर जवानो का वाले गाने पर नाच नाच कर अलबेले और मस्ताने हो जायेंगे. महर्षि वाल्मीकि की तरह हमें भी दीमक दिन-बे-दिन खा खा कर बालू का टीला किये जा रही थी तभी एक दिन सुना की सरकार ने कोई 10 हज़ार NGOs के लाइसेंस कैंसिल कर दिए हैं. और साथ ही ग्रीनपीस इंडिया के भी सारे ट्रांसक्शन्स पर रोक लगा दी है. माने सरकार ने IB रिपोर्ट्स में ये पाया की ग्रीन पीस इंडिया देशविरोधी कार्यों में शामिल है. जश्न में सब भारतवासी शामिल होंगे ये सोच कर धूम मचाने की तैयारी में ही थे की आज FB पर एक पेज के दर्शन हुए Greenpeace India. कुछ 3 लाख लाइक्स हैं पेज पर. रेत के मकान की तरह मेरे अलबेले मस्ताने सपने भरभरा कर तब कतरा कतरा होने लगे जब देखा की वही लालची लोग जो ऐसे NGOs को अपनी सूख चुकी छाती से चिपटा चिपटा कर दूध पिला रहे थे अब इनके समर्थन में भोली भाली जनता और पर्यावरण का मुखौटा लगा कर उठ खड़े हुए हैं. कुछ रंगे सियार मेरी फ्रेंड लिस्ट में से भी निकले हैं. लोग जमकर विरोध कर रहे हैं सरकार का. कोई तानाशाह कह रहा है तो कोई जनता विरोधी सरकार कह रहा है. इस सब के बीच विरोध की आग से गरम हुए तंदूर में भेड़ की खाल में छिपे हुए वही भेड़िये अपने लिए रोटियाँ और बोटियाँ सेंक रहे हैं. ईंटो से ईंटों के बजने की आती आवाजों के बीच आज अपने आप से मैं बस ये ही पूछ रहा हूँ की क्या मेरी तरह हर उस भारतीय के वो सपने जो उन्होंने अंधेरे साम्राज्य के दौरान देखे थे उनको ऑक्सीजन मिलेगी? मन का एक कायर कोना आज खींसे निपोर निपोर कर अंदर से लहूलुहान किये जा रहा है और कह रहा है रोहित ये नहीं होगा. इच्छाशक्ति नहीं है, पहले शक्ति नहीं थी अब इच्छा नहीं है. पहले सरकार कमजोर थी अब हम कमजोर हैं. शह और मात का खेल और इन सब के बीच शून्य में ताकता मैं.....
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