Wednesday, 29 November 2017

यात्रा वृतांत: भरतपुर

 
पिछले महीने ही नयी बाइक ली। बुलेट 350 cc। शौकीन लोग जानते हैं की ये क्या चीज है और लेने की खुशी कितनी होती है। अमूमन हर बाइकर का सपना होता है बुलेट लेने का। ऐसा ही एक सपना मेरा भी था। सपना तो पूरा हो गया पर अब बड़ा सवाल ये था की इसको लेकर घूमने कहाँ जाएँ। ये भी समस्या है। आप पहले एक सपना देखो फिर उसको पूरा करने के लिए और सपने देखो फिर दूसरे सपने से पहला सपना पूरा करो। मतलब बुलेट लेना सपनों की जलेबी बनाना। ऐसे ही कुछ महीने पहले एक अच्छा सा कैमरा भी ले लिया था। बाइक होगी तो घूमने जायेंगे और घूमने जायेंगे तो फोटो भी खीचेंगे। बाइक से मथुरा हो आया था मैं कुछ दिन पहले ही। लेह जाना है पर वो तो जून में जाना है अभी तो जनवरी है। ऐसी जगह ढूंढी जाये जहाँ बाइक और कैमरा दोनों का फुल उपयोग हो। नेट खंगाला गया तो कई जगह निकली पर आखिर में जाना फाइनल हुआ भरतपुर बर्ड सेंचुरी जिसका नाम है "केवलादेव पक्षी उद्यान।"
सारी जानकारी निकाली गयी - दूरी, खर्चा, छुट्टी आदि आदि। सब चीजों का तालमेल बिठाया और 25 जनवरी 2017 की सुबह 4.30 बजे फरीदाबाद से किक लगा दी।
 
मंजिल यहाँ से 140 km दूर है। भरतपुर के बारे में जब सर्च किया तो पता लगा की दिसम्बर-जनवरी सबसे उत्तम समय होता है घूमने का। इस दौरान यहाँ देश विदेश से हजारों की तादाद में अलग अलग प्रजाति के पक्षी आते हैं। एक ब्लॉग पर तो ये भी लिखा था की सबसे बढ़िया समय जनवरी के प्रथम सप्ताह तक ही है। पर ये तो आखिरी सप्ताह चल रहा है। कहीं पक्षी कम तो नहीं हो गए होंगे? कहीं मैं इतनी दूर जाऊँ और कुछ खास देखने को मिले ही ना। चलो इस बहाने बाइक की सैर तो हो ही जायेगी। अपने आप से ये सब बातें करता हुआ मैं NH 19 पर धीरे धीरे रेंग रहा था। कड़ाके की ठण्ड और जबरदस्त धुंध थी। कोहरे में देखने की समस्या से बचने के लिए एक ट्रक के पीछे पीछे चल रहा था। सर्दी ज्यादा थी पर मैं उसी हिसाब से इंतजाम कर के चला था। हम उत्तर भारतीयों को इतनी सर्दी सहने की तो आदत भी है। बाइक अपनी गति से बढ़ती रही। मुझे पहुंचने की कोई जल्दी नहीं थी। रास्ते में 2 जगह रुक कर चाय पी और भट्टी पर हाथ सेंके।
 
सुबह 8 बजे मथुरा के नजदीक पहुँचा। भूख लगने लगी। वहीँ पुल के नीचे एक रेहड़ी पर कचोरी और आलू झोल की सब्जी खायी। बेहतरीन नाश्ता था। सब्जी इतनी स्वादिष्ट थी की कई बार कटोरी में डलवाई। खिलाने वाले ने उलहना दिया भाई साहब 20 रु में सब इतनी सब्जी खाने लगे तो हम जल्दी ही कंगाल हो जायेंगे, बस अब आपको और सब्जी नहीं मिलेगी। कुछ देर बाद ही मैंने खाली कटोरी आगे बढ़ाते हुए कहा अरे ग्राहक को ऐसे मना करते हैं क्या। आप जी भर के खिलाओ, आपको पूरी प्लेट के पैसे दूँगा आपको घाटा थोड़े ही ना करवाएंगे। अतिरिक्त पैसे की बात सुनकर रेहड़ी वाले ने चौड़ी सी स्माइल देकर तुरंत कटोरी भर दी। खा पी कर आगे बढ़ा। रास्ता पूछते पूछते 10.30 बजे तक वहाँ पहुँच गया जहाँ रुकना था। सेंचुरी टूरिस्ट लॉज। ठहरने के ठिकाने का पहले ही बंदोबस्त कर लिया था। इस लॉज की खासियत का अंत में उल्लेख करूँगा अन्यथा मुख्य मुद्दे से भटकने का डर है। पहले ही बाइक और आलू झोल को काफी स्पेस दे दिया गया है। 
 
रूम में कुछ देर आगे की योजना बनी तब तक चाय पकौड़े आ गए। स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ लिया और 11.30 बजे तक रूम छोड़ दिया। केवलादेव प्राणी उद्यान यहाँ से पैदल दुरी पर ही है। यही कोई 300 मीटर।
 
अंदर घूमने के तीन तरीके हैं:
पैदल - जो की काफी ज्यादा हो जायेगा। नहीं ये सही नहीं।
सायकिल रिक्शा - थोडा महंगा लग रहा है। एक घंटे के 200रु। कम से कम 4 घंटे भी जोड़ें तो 800रु। एकदम से नहीं। इस तरह के खर्चीले विक्लप तो मैं अक्सर पूरा सोचने से पहले ही मना कर दिया करता हूँ। 
साइकिल - 50 रु 4 घंटे के लिए। वाह, ये सबसे अच्छा है। तुरंत एक साईकिल ली और चल दिया। 
 
हालाँकि रिक्शा का 'एकमात्र फायदा' जो होता वो ये की यहाँ के रिक्शा चालक समय के साथ साथ काफी अनुभवी हो गए हैं और एक बेहतरीन गाइड का काम फ्री में कर सकते हैं। इनको लगभग हर प्रजाति के पक्षी के बारे में विस्तार से जानकारी है। साथ ही अच्छी फोटो खींचने के लिए कुछ अच्छे स्पॉट भी इन लोगों की नजर में है। अगर आप यहाँ आये हुए पक्षियों की प्रजाति इत्यादि के बारे में जानने और फोटोग्राफी में दिलचस्पी रखते हैं तो आप इसको 'एकमात्र फायदा' नहीं कह सकते। 
 
मैं अपनी साईकिल से चल चुका था। साईकिल साथ थी पर शुरू में पैदल ही चल रहा था। उद्यान देखने का उत्साह और एनर्जी अभी दोनों बराबर थे। चलते ही एक बैरियर पर टिकट चेक हुई। बस कुछ आगे जाते ही बेहतरीन जंगली वातावरण शुरू हो गया। सर्दी के दिन थे और अभी तक काफी धुंध थी। जंगल बहुत गहरा तो नहीं है पर बड़ा है। सबसे पहले दर्शन हुए भारत के राष्ट्रिय पक्षी मोर के। एक सूखे हुए पेड़ के सबसे ऊँचे वाले ठूँठ पर बैठ हुआ। लंबी रंगीन पंखे फैलाई हुई। सुराही जैसी लंबी गर्दन इधर उधर घुमाता हुआ मानो आस पास के नजारे आँखों में उतार रहा हो। उसके ठीक पीछे बिल्कुल हल्का सूर्य दिखाई दे रहा था। किसी भी प्रोफेशनल फोटोग्राफर के लिए एकदम उपयुक्त नजारा था। मैंने भी कुछ फोटो ली किंतु धुंध का प्रभाव और कैमरे का कम ज्ञान होने की वजह से उतनी आकर्षक नहीं आई। आगे एक जगह दीमक का टीला नाम का स्थान आया जहाँ विभाग की तरफ से एक सूचना बोर्ड भी लगाया हुआ था। पास में ही एक पेड़ के चारों तरफ बड़ा सा मिट्टी का ढ़ेर लगा हुआ जिसमे बड़े बड़े चुँहे के बिल जैसे होल थे। इसको ही दीमक का टीला कहा गया है। मिट्टी की ये हालत चूहों ने नहीं दीमक ने की है। आश्चर्य। छुट्टी का दिन होने की वजह से लोगों की उपस्थिति ठीक ठाक थी। पर सैलानियों में आधे से अधिक विदेशी सैलानी थे अपने बड़े बड़े कैमरों के साथ। कुछ के पास तो एक हाथ से भी बड़े कैमरे थे। अधिकतर ने अपने कैमरा टाइप का सामान ढोने के लिए रिक्शा लिया हुआ था।
और हाँ याद आया, शुरू में ही एक बात उल्लेख करना भूल गया हूँ। प्राणी उद्यान में आने से पहले एक अच्छी क्वालिटी की दूरबीन साथ लेना ना भूलें। थोड़ा ढूंढने के बाद दूरबीन उद्यान के बाहर से किराए पर मिल जाती है। कुछ रिक्शा चालक भी अपने साथ दूरबीन रखते हैं, ये उनका मार्केटिंग का तरीका भी है। पर जरुरी नहीं की वो फ्री में आपको इसका उपयोग करने दें। 100 से 150 रु तक की फीस वसूली जा सकती है। मुझे मेरे होटल से ही एक अच्छी दूरबीन फ्री में मिल गयी थी। अगर आप बाहर से आ रहे हैं तो होटल बुक करने से पहले ही दूरबीन की उपलब्ध्ता और फीस तय कर लें। मेरे हिसाब से अगर आप कमरा बुक कर रहे हैं तो दूरबीन साथ अवश्य मिलनी चाहिए। वापिस लौटते हैं। विदेशी लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं इसके विपरीत अपने अधिकतर लोग बस टहल रहे हैं। कैसी विडम्बना है ऐसी जगहों पर एक तो हम लोग घूमने जाते ही नहीं और जाते भी हैं तो बस यहाँ वहाँ टहल कर आ जाते हैं। हजारों लाखों किलोमीटर का सफर तय कर के सुदूर यूरोप समेत पूरी दुनिया से ये अदभुत प्राणी यहाँ आते हैं और यहाँ इनको देखने भी इनके ही लोग आते हैं ... सुदूर यूरोप समेत पूरी दुनिया से।
एक हरे रंग का कबुतर दिखा। बेर के पेड़ पर बैठा आराम से बेर खा रहा था। वाह, पहली बार देखा है ये तो। इस बार फोटो अच्छी आई। कुछ कदम आगे चलता तो कुछ न कुछ नया दिखता ही रहा। कोई गाइड नहीं था तो बहोत से पक्षियों के नाम मालूम नहीं हो सके। जाने से पहले कुछ पहचान नेट पर की थी उस से काफी मदद मिली। कुछ के नाम वापिस आने के बाद सर्च किये। घूमने के लिए एक सीधी पक्की सड़क बनी हुई है। बिच बिच में दायें बायें को अलग सड़क भी निकलती है। वैसे तो किसी भी जानवर, पक्षी के लिए कोई पिंजरा नहीं बना है पर थोड़ी थोड़ी दुरी पर विभाग की तरफ से सूचना बोर्ड लगाये गएँ हैं। मसलन इस एरिया में फलां पक्षी दिखाई देने की सम्भावना है टाइप। लोमड़ी दिखी तो मेरी मनोभावना ऐसी थी जैसे 'अरे ये तो अपना ही जानवर है।' चलो कोई तो जान पहचान वाला मिला। लोमड़ी ने खोया आत्मविश्वास जगा दिया। वरना तो इतने अनजान पक्षियों के बिच में मैं उनको देशी और खुद को विदेशी समझने लगा था। आगे हिरण और एक बैल भी अपनेपन का अहसास करवाते रहे।
कुछ भारतीय परिवार भी आये हुए थे। समझ तो आप गए ही होंगे की मैं अब क्या बताना चाह रहा हूँ। बच्चे पक्षियों को पत्थर मारने में व्यस्त थे। Are You Serious!? यहाँ भी? और माता पिता खींसे निपोर रहे थे। सड़क के अंत में एक छोटा सा पार्क मिला जहाँ अपने भारतीय परिवार चिप्स और कोल्ड ड्रिंक ठूंस रहे थे। बच्चे चिप्स पक्षियों को खिलाकर उनकी सेवा कर रहे थे। वहीँ एक बोर्ड लगा है जहाँ पर उद्यान के बारे में काफी महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी है।
खूब घूमने और ढेरों फोटो खींचने के बाद शाम 4.30 बजे तक मैं फ्री हो गया। चाहता तो आज ही वापिस लौट सकता था पर ये जगह इतनी पसंद आई की मैंने अगले दिन फिर आने का निर्णय लिया। अगले दिन नहा धो कर फिर से आया और करीब 4 घंटे उद्यान में बिताये। इस उद्यान की सुंदरता ने ऐसा मन मोह लिया की शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। सर्दियों के समय में विभिन्न तरह के पक्षियों की चहचाहट, जादुई सूर्य उदय, पक्षियों की बड़ी बड़ी कॉलोनियां, सूर्य अस्त का सम्मोहन, ये सब इस जगह का जादू आपके मन में पैदा कर देते हैं. यहाँ कोई भीड़ नहीं, गाड़ियों का शोर नहीं, प्रदूषण नहीं, चारों तरफ बस प्रकृति ही प्रकृति. एक आम इंसान को और क्या चाहिए. आप ये पढ़ रहे हैं मतलब आप घूमने के शौकीन है। तो यहाँ मै आपसे बस इतना ही कहना चाहूँगा की यदि आपने अभी तक भरतपुर नहीं देखा तो एक बार अवश्य जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में: "भरतपुर - A Perfect Date with Nature"
 
ये तो मेरा अनुभव था, अब उद्यान के बारे में कुछ काम की जानकारी – 
·         भरतपुर बर्ड सेंचुरी का असल नाम केवलादेव प्राणी उद्यान है. यह नाम यहाँ स्थित केवलादेव (शंकर) जी के प्राचीन मंदिर के नाम पर पड़ा है. यह उद्यान कुल 29  किमी छेत्रफल एरिया में फैला हुआ है. सीजन में यहाँ लगभग 350 से ऊपर पक्षियों, 50 मछलियों तथा 10 से अधिक साँपों की प्रजाति देखने को मिलती है. इसके अलावा विभिन्न तरह की वनस्पति भी है. हज़ारों की तादाद में हर साल सर्दियों दूर दराज के देशों से पक्षी यहाँ आते हैं और प्रजनन करते हैं. यह उद्यान वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है.
·         लगभग 250 साल पहले भरतपुर के शासक राजा सूरज मल द्वारा इस उद्यान की स्थापना शिकार करने के लिए की गयी थी. 1938 में 12 नवम्बर को तत्कालीन भारत के वायसराय की शूटिंग पार्टी के नाम एक दिन में सबसे अधिक संख्या में बतखों का शिकार करने रिकॉर्ड दर्ज है. यह संख्या 4237 है. मतलब इतने प्राणी सिर्फ एक दिन में शिकार के नाम पर मार दिए गए थे.
 
और अंत में एक पहरा रुकने के ठिकाने के बारे में. वैसे तो भरतपुर में रुकने के ठिकानों की कोई कमी नहीं है. सस्ते से लेकर खूब महंगे तक यहाँ सभी तरह के होटलों की भरमार है. पर मैं जहाँ ठहरा वो जगह थी 'सेंचुरी टूरिस्ट लॉज.'  ये एक छोटी सी लॉज अवस्थी सरनेम के दो भाइयों द्वारा चलायी जाती है. लॉज के प्रबंध और उनकी मेहमान नवाजी देख कर मैं दंग रह गया. यहाँ आपको एकदम घर के जैसे वातावरण मिलेगा. लॉज में आपको फ्री वाई फाई की सुविधा तो है ही साथ ही उद्यान घूमने के लिए अच्छी क्वालिटी की दूरबीन भी उपलब्ध करवाई जाती है. इसके अलावा यहाँ कुछ अच्छी पुष्तकों की एक छोटी से लाइब्रेरी भी है तथा लॉज के मालिक आपको स्थानीय जगहों के बारे में अच्छी जानकारी भी देंगे. और यहाँ के खाने के बारे में तो क्या कहूँ. यहाँ के पकौड़े इतने स्वादिष्ट हैं की इनको तो वर्ल्ड फेमस होना चाहिए था. सिर्फ एक रात के स्टे के दौरान भी मैंने कम से कम छः बार सिर्फ चाय पकौड़े खाये. आलम ये है की उद्यान की खूबसूरती और अवस्थी लॉज के पैकोडे के लिए मैं एक बार फिर से भरतपुर जाने की सोच रहा हूँ. अगर आप कभी यहाँ जाते हैं तो एक बार यहाँ के पकौड़े जरूर खाएं. किराया भी कम है. थोड़ी सी मेहनत कर के लॉज का नंबर नेट पर आसानी से ढूंढा जा सकता है. यदि किसी अन्य साइट के माध्यम से ना जाकर सीधे अवस्थी जी से बात कर के एडवांस में ही कमरा बुक कर लिया जाये तो रेंट में कुछ और कमी भी हो सकती है. भरतपुर यात्रा के दौरान सेंचुरी टूरिस्ट लॉज में ठहराव आपकी यात्रा को और खुशनुमा बना देगा.
 
नोट - मैंने ये यात्रा जनवरी 2017 में की थी। उद्यान घूमने का सीजन आ गया है इसलिए लिख रहा हूँ। आपके पास दिसम्बर और जनवरी सिर्फ दो महीने हैं कुदरत की इस अनोखी जगह को देखने के लिए। एकदम पैसा वसूल जगह है, मौका ना चूकें। 

Monday, 20 November 2017

यात्रा वृतांत: सिक्किम का प्यार

इधर मेरा कैमरा और मोबाइल फिर से चार्ज होने लगे हैं. बैग की धूल झड़ चुकी है. जूते के फीते कस लिए गए हैं I घूमने के नाम से पेट में तितलियाँ सी उड़ने लगती हैं I घूमने का मुझे बेहद शौक शुरू से ही है. अब ये शौक लत बन चुका है, लत एक कठिन एवम् निर्मम शब्द है I दिखने मे भले ही छोटा हो पर जब लग जाए तो knowladge के K की तरह जिंदगी साइलेंट हो जाती है I हर 3 या 4 महीनों में मुझे मेरी इस लत से जंग लड़नी पड़ती है और जब हार जाता हूँ तो अपने आप को कहीं घुमा ही लाता हूँ I एक तरह से देखा जाये तो ये मेरा खुद को एक गिफ्ट है जो हर 3 या 4 महीने बाद देना ही पड़ता हैI कई बार सोचा इस घुमककड़ी पर चंद लाइनें लिखी जाये. पर यकीन से कह सकता हूँ चाहे जितने भी दिन का टूर कर के लौटा होऊं पर किस्से नहीं सुनाने आते, पता नहीं लोग अपने एक ही जगह घूम कर आने के बाद पूरी किताब कैसे लिख देते हैंI मेरे लिए ये किसी आशचर्य से कम हरगिज नहीं है, खैर आज फिर बैग पैक हो गया है I 
बिजली के करंट की तरह कई जगहों के नाम दिमाग में झटके मार रहे थे, असम और मेघालय समेत पूरा ईस्ट इण्डिया मेरा हमेशा से ही पसंदीदा भाग रहा है पर अभी तक जा नही पाया हूँ I वहां एशिया का सबसे क्लीन गांव देखना है, और वो नेचुरल ट्री रुट ब्रिज भी, पर जून में तो काजीरंगा बंद हो जाता है I असम का सबसे खास attraction मेरे लिए बस काजीरंगा ही तो है I अब वही बंद है तो जाकर क्या करूंगा I आख़िर मे सिक्किम जाना फाइनल किया I क्या पता वहाँ थोड़ी बहोत ट्रैकिंग भी कर लूं I नेट पर सर्च किया तो कुछ लोग भी मिल गए जो बाइक रेंट पर देते हैं दार्जलिंग और आस पास के एरिया में, हम्म्म ये ही ठीक रहेगा I दार्जीलिंग से गंगटोक बाइक से जाया जाए I बाइक का नाम आते ही आँखों के सामने तुरंत बैलेंस शीट घूम गयी, दिमाग के कैलकुलेटर ने सारी गुणा भाग कर के बटुए की औकात को रेड लाइन पर ला पटका I बाइक का प्लान केंसल कर के पब्लिक ट्रांसपोर्ट के सहारे ही आगे बढ़ने का फ़ैसला किया. मन कसमसा कर रह गया. मिडिल क्लास आदमी और कर भी क्या सकता है I खैर अपना तो हुनर ही है पैसे की वजह से कोई टूर कभी रद्द नही किया, इस बार भी देख लेंगे I जब तक टूर में परेशानी ना आये तो कैसा टूर, लिमिटिड बजट मेरी पहली परेशानी थी I
जगह आख़िर क्षण मे फाइनल हुई तो रेल की टिकेट के लिए सुबह 5 बजे से नई दिल्ली की तत्काल बुकिंग की लाइन मे लगना पड़ा I गुरुद्वारे के लंगर के जैसे लाइन हर पल लंबी ही होती गयी, सुबह 10 बजे जब तत्काल बुकिंग की टिकेट विंडो ओपन हुई तो नई दिल्ली – डिब्रूगढ राजधानी की टिकेट मिल गयी I अगले दिन सुबह 9.35 पर मैं और मेरा दोस्त अक्ष नई  दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 16 पर अपने अपने बैग के साथ हाज़िर थे I ट्रेन अभी प्लेटफॉर्म पर लगी नही थी तो हम दोनो इधर उधर नज़र घुमा कर आस पास के मुसाफिरों को अपनी अपनी नज़रों से तोलने लगे. अभी मैं अपना निरीक्षण कर ही रहा था की एक गूँज सुनाई दी. कान की इंद्रियों ने दिमाग़ को तुरंत अलर्ट मैसेज भेजा. इधर आँखो ने भी अपनी दूरबीन को गूँज की दिशा मे मोड़ा. सामने एक विशालकाय लड़की घुटने से उपर तक का काले रंग का भद्दा सा फ्राक पहन कर खड़ी दिखाई दी. पैरों पर एक जालीदार गाउन जैसा कुछ कपड़ा सा चढ़ाया हुआ था, सर पर जालीदार कपड़े का एक फूल सा बनाकर उसको एक साइड मे तिरछा सा कर के टीकाया हुआ था I एक छोटा टुकड़ा उसी जालीदार कपड़े का आधे चेहरे को घूँघट की तरह ढका  हुआ था और वो गूँज उसी लड़की के द्वारा मारे गये एक झन्नाटेदार तमाचे की थी जो उसने अभी अभी एक मनचले लड़के को जड़ा  था I थप्पड़ खा कर लड़का सर नीचे कर के चलने लगा तो लेडी सिंघम ने पीछे से एक जोरदार लात भागते लड़के के पीछे जमा दी I ठुकाई करवाने के बाद लड़का शरीफ गाय सा हो गया और पुंछ उठा कर वहाँ से चुपचाप निकल लिया I इधर लेडी सिंघम का रौद्र रूप जारी था, उसने तुरंत फोन निकाला ओर किसी को फोन कर ऑर्डर से देने लगी I मन मे कुछ शंका हो इस से पहले उसके हाथ मे पकड़ी इनस्पेक्टर टाइप की पुलिसिया कैप दिखाई दी I लड़की ने तुरंत अपने बेग से काले रंग का चमकता हुआ पुलिसिया डंडा भी निकाल लिया और लगी इधर उधर तेज़ी से घूमने, ऐसा लग रहा था उसकी भुजाएँ अभी भी फड़क रही थी, मन मे सोचने लगा अगर वो लड़का अभी इसको मिल गया तो ये कहीं आज उसको मृत्यु लोक के दर्शन ही ना करा दे I इस से पहले की मैं अपने रायचंद वाले मोड मे आकर अपने आप को लड़की के एक्शन पर कोई राय देता चमकती हुई साफ सुथरे डब्बों वाली राजधानी के हॉर्न ने मेरे उड़ते विचारों पर रोक लगाई I लेडी सिंघम और मैं दोनो ही अपना अपना समान समेट कर राजधानी मे सवार हो चुके थे I
लगभग 30 घंटों के राजधानी के सफ़र ने उबा दिया I अक्ष इस पूरे समय के दौरान ट्रेन की लोअर बर्थ पर पड़े पड़े कंबल को अपने चारो तरफ लपेट कर उसको सुरंग का रूप दे चुका था I वो जब कभी कभार बाथरूम जाने के लिए सुरंग से बाहर निकलता तो मैं उतनी देर उसकी बनाई हुई सुरंग मे घुस जाता I मैं पूरे रास्ते मे पड़ने वाले स्टेशनों के नाम याद करने की असफल कोशिश करता हुआ अपना टाइम पास करता रहा I बीच बीच मे राकेश तिवारी की लिखी हुई “सफ़र एक डोंगी मे डगमग”पढ़ता रहा, राकेश जी ने इस किताब मे बड़े ही शानदार तरीके से अपनी एक डोंगी से दिल्ली से कोलकाता तक पूरी की गयी यात्रा का कदम दर कदम वर्णन किया है I यह यात्रा पूरी करने मे उन्हे जहाँ 62 दिन का समय लगा वहीं यह किताब लिखने मे पूरे 30 साल लग गये I यात्रा वृतांत पर लिखी गयी यह एक अच्छी किताब है I उधर राकेश जी की डोंगी हिचकोले खाते हुए ओर इधर मेरी राजधानी धड़क धड़क करते हुए आगे बढ़ रही थी I बीच बीच मे अक्ष के करवट बदलने से मेरी निगाहे डोंगी से हट कर खिड़की पर लग जाती I
पीठ पर लदे बैग को देखते ही न्यू जलपाईगुडी स्टेशन पर टैक्सी और ट्रेवल एजेंसियों के राजदूतों ने अपने पूरे प्रतिनिधिमंडल के साथ हमे घेर लिया I अभिमन्यु की तरह चक्र व्यूह को भेदते हुए हम स्टेशन से बाहर निकले और फिर वहीं दोपहर का खाना खाकर आगे का सफ़र तय करने का निर्णय लिया I ज़्यादा बजट नही था तो शुरुआत से आख़िर तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट ही प्रयोग करने का फ़ैसला पहले ही हो चुका था I न्यू जलपाईगुडी स्टेशन से शेयर्ड ऑटो पकड़ कर सिलिगुड़ी बस स्टैंड पहुँचा I बस स्टैंड पहुंचते पहुंचते 3 बज चुके थे इसलिए दार्जीलिंग की सभी बस निकल चुकी थी, ट्रैवल एजेन्सी के राजदूत यहाँ भी आ धमके, बड़ी मुश्किल से उनको चीरते हुए शेयर्ड टैक्सी स्टैंड पहुँचा I प्रति सवारी 130 रुपये मे सौदा तय होने के बाद टाटा सूमो की आगे की सीट पर काबिज हो गया I इस से पहले कि टाटा सूमो चले आपको ड्राइवर का परिचय दे दूं I लगभग 35 वर्षीय खेल बहादुर दार्जीलिंग के ही रहने वाले हैं I गुस्सैल सवभाव के खेल रास्ते मे हमे थोड़ा बहुत बताते हुए भी चलते हैं I जल्दी ही हमारी टैक्सी सिलिगुड़ी शहर की भीड़ को पार करते हुए शहर से बाहर पहुँच गयी I सुकना आर्मी ज़ोन शुरू होते ही मनमोहक हरियाली का दर्शन पूरे सफ़र मे पहली बार हुआ, 20 मिनिट के एक ब्रेक के साथ ही खेल की ख़टारा टाटा सूमो ने लगभग 5.30 हमे दार्जीलिंग पहुँचा दिया I एक राजदूत से बात करने पर उसने 700 रुपये मे हमे एक ठीक ठाक से होटेल मे एक कमरा दिलवा दिया I दार्जीलिंग घूमने का ज़्यादा  प्लान नही था सो रात का खाना खाकर अक्ष और मैं अपनी अपनी सुरंग मे घुस गयेI अक्ष को देख देख कर अब तक मैं भी सुरंग बनाना सीख चुका था I
सुबह दार्जीलिंग की प्रसिद्ध टॉय ट्रेन की एक राइड पूरी कर के माल रोड का एक चक्कर लगाया और गंगटोक तक का सफ़र तय करने के लिए दोपहर मे लगभग 1 बजे टॅक्सी स्टैंड जा पहुँचे I किस्मत से रास्ते मे ही एक खाली बोलेरो टैक्सी मिल गयी, ड्राइवर से बातें शुरू की तो उसने अपना नाम जेम्स बताया I लगभग 25 वर्षीय जेम्स सिक्किम के लाचूंग कस्बे का रहने वाला है I गाड़ी काफ़ी नयी थी पर ये उसकी खुद की नही थी, जेम्स बहुत ही कम बोलने वाला एक खुशमिजाज सा लड़का है I गाड़ी के दार्जीलिंग से बाहर निकल कर गंगटोक वाले हाइवे पर आते ही मनमोहक नज़ारे शुरू हो गये, ऐसा लगा जैसे हरियाली का कोई ज़बरदस्त विस्फोट हुआ हो और चारों तरफ हरियाली बिखर गयी हो I सामने शैतान बादल और उपर नीला आसमान, जैसे किसी ने एक बाल्टी मे नीला पेंट घोल कर उस आसमान को रंग दिया हो I एकदम शानदार सड़कें, हरे भरे जंगल और पहाड़, हल्की हल्की बारिश, बादलों के झुंड और उपर से जेम्स की नयी गाड़ी I दिल झूमना शुरू हो चुका था पेट की तितलियाँ ज़ोर ज़ोर से फड़फडाने लगी थी I चेहरे  पर एक अनदेखी सी चमक तैरने लगी, रास्ते भर इतने शानदार नज़ारे थे की मैने लगभग 4 घंटे के पूरे रास्ते मे अक्ष से एक भी बार बात करने की कोशिश नही की I वो शानदार चीज़ें मैं बातों मे लग कर मिस नही करना चाहता था I कभी पेड़ों से भरे पहाड़ शुरू हो जाते तो कभी चाय के खेत, चाय के बागानों मे काम करते हुए लोग बड़े खुशनसीब से लगने लगे I कार मे बैठ कर इन सबके बीच से यूँ निकल जाना मुझे कुछ अखरने लगा तो मैने जेम्स को कुछ देर कार रोक देने को बोला I वैसे तो वो शेयर्ड कार थी पर उसमे हम दोनो के अलावा कोई और सवारी नही थी तो जेम्स ने भी जगह देख कर एक चाय के बागान के पास कार रोक दी I मैं और अक्ष कैमरा लेकर चाय के खेतों मे कूद पड़े, लगभग 20 मिनट जी भर कर कूद फाँद करने के बाद थोड़े भीगे हुए हम कार मे वापिस आ बैठे I थोड़ी ही देर मे हमारा कारवाँ  वेलकम टू सिक्किम का रंगबिरंगा गेट पार कर गया I रास्ते मे एक छोटे से ढाबे पर चाय ब्रेक लेने के बाद तीस्ता नदी के किनारे किनारे फ़र्राटे भारती हुई जेम्स की बोलेरो ने शाम को 5.30 बजे मुझे मेरी सपनो की नगरी गंगटोक मे पहुँचा दिया I शायद मैं दिखने मे कुछ ज़्यादा ही ग़रीब दिखता हूँ इसलिए जेम्स ने ही एक सस्ता सा होटेल भी दिला दिया I होटेल के मॅनेजर से बात करने पर 500 रुपय प्रतिदिन का सौदा तय हुआ, दिमाग़ फिर से गुना भाग वाले रास्ते पर चला गया, आर्यभट्ट को भी पीछे छोड़ते हुए मेरे दिमाग़ ने तुरंत अलर्ट भेजा की अगर 4 दिन भी रुका तो सिर्फ़ 2000 होटेल के हो जाएँगे I धत्त तेरी की थोड़ी और कूटनीति से काम लेता तो  बात 400 मे फाइनल हो जाती, दिमाग़ के जासूसी विभाग ने बेचारे जेम्स को भी शक की निगाहों से देखा, क्या पता इसका भी कमीशन हो इसमे I अगर खुद से आता तो 100 रुपय तो पक्का बचा सकता था, जेम्स की नेकी का बदला जासूसी विभाग ने शक से दिया I समान रूम मे फेंक कर तुरंत बाहर भागे, रास्ता पूछते पूछते मशहूर एम जी रोड पर पहुँचा I अगले दिन नाथुला पास घूमने का निर्णय हुआ था इसलिए पर्मिट का इंतज़ाम आज ही करना ज़रूरी था, कल इतवार है अगर कल नही जा पाए तो सोमवार और मंगलवार को नाथुला पास विज़िटर के लिए बंद हो जाता है I ऐसी परिस्थति मे हम 2 दिन गंगटोक मे ही बैठे रह सकते थे जिसकी इज़ाज़त मेरी जेब बिल्कुल नही दे रही थी I ट्रेवल एजेंसियो के राजदूत लगातार मक्खियों की तरह भीनभिनाते रहे I छोटी गाड़ी का रेट 5500 और 10 सीट वाली बड़ी गाड़ी का रेट 7500 फिक्स था I 2 लोगो के लिए पूरी गाड़ी बुक करना किसी भी नज़र से किफायती नही लगा तो मैने मेरे जैसे ग़रीब से दिखने वाले कुछ और लोगों को साथ चलने के लिए तैयार कर लिए I बड़ी गाड़ी का किराया 3 हिस्सों मे बराबर बाँटने के बाद मेरे और अक्ष दोनो के हिस्से मे कुल 2500 रुपये आए I अगले दिन सुबह 8 बजे टैक्सी स्टैंड पर मिलने का तय कर के हम सब वाह्न से अपने अपने रास्ते चल दिए I मैं और अक्ष थकने के बाद भी घंटों वहीं टहलते रहे, गंगटोक शहर की खूबसूरती को शब्दों मे ब्यान करना यहाँ लगभग नामुमकिन है I बेहतरीन साफ सफाई, बड़े ही काएदे से चलता यातायात और कदम कदम पर मुस्तैद पुलिस के जवान इस शहर के सबसे बड़े आकर्षण का केंद्र हैं I 4 दिनों तक पूरे शहर मे लेंस लेकर खोजने से भी मुझे एक कागज का टुकड़ा कहीं सड़क पर नही मिला I वहीं एक कोने की दुकान पर पूरी सब्जी और मोमोज खाने के बाद रूम मे पहुचें और अपनी अपनी सुरंग तैयार कर उसमे घुस गये I
दिमाग़ पूरे दिन नज़रों के सामने से गुज़री तस्वीरों को एक एक कर याद करने लगा, क्या शानदार दिन था. सुबह 6 बजे से शाम के 9 बजे तक घूमने के बाद भी एकद्म फ्रेश फील कर रहा था I क्यूँ नही मैं यही कहीं कोने मे एक छोटा सा घर ले लेता हूँ, दिन मे मोमोज बेचता रहूँगा और शाम को वहीं सो जाया करूँगा I थोड़े से पैसे जोड़ लेने के बाद एक छोटी गाड़ी लेकर उसको टूरिस्ट के लिए चलाया करूँगा I सुबह रोज एक घंटे ताजी हवा मे योग करना और शाम को रोज एक घंटे कुछ किलोमीटर की ट्रेकिंग, वाह क्या जिंदगी होगी I अच्छा मेरे दिमाग़ अब ऐसा करो सो जाओ, बाकी के सपने कल देख लेना I गुड नाइट!! 
सुबह तय समय पर हम सभी लोग एम जी रोड पर एकट्ठे हो गये I पिछले दिन ज़्यादा सर्दी नही थी सो हमने अपनी जॅकेट ना लेकर एक हल्की सी स्वेटर साथ ले ली. कैमरा और फोन पूरे चार्ज थे. गाड़ी आते ही बेशरमों की तरह अक्ष ने कूदकर सबसे आगे वाली सीट घेर ली. बाकी लोग मन ही मन कुढ कर रह गये. मैने आखों ही आखों मे अक्ष को एक महान जंग जीतने के लिए बधाई दी. जब सब लोग गाड़ी मे जॅंच गये तो 8 बजे गाड़ी निकल पड़ी. इस से पहले की गाड़ी कहीं पहुँचे मेहमानों का परिचय कुछ यूँ है – 2 दोस्त सोनू और रौशन, राँची से आए हुए हैं. दोनो टाटा स्काई कंपनी मे कार्यरत हैं. सोनू घर घर जाकर टाटा स्काई इनस्टॉल करता है इसलिए पूरे सफ़र के दौरान उसका फोन बार बार बजता रहता है. दूसरा परिवार जलज का है. जलज राजस्थान का मारवाड़ी व्यवसायी है. जलज अपनी पत्नी, एक 2 साल की बेटी और सास ससुर के साथ गंगटोक घूमने आए हैं. और आख़िर मे हमेशा की तरह मेरा पसंदीदा व्यक्ति दोरजी सूमो का ड्राइवर. मिर्दु स्वभाव का दोरजी नाथुला पास से 4 किलोमीटर दूर रहने वाला एक सिक्कीमी युवा है. गाड़ी उसकी खुद की ही है.  एक जगह चेकिंग और 10 रुपये की एंट्री टिकेट लेने के बाद गाड़ी सपाट सुंदर सड़कों पर सरपट दौड़ पड़ी. बीच बीच मे बारिश होती फिर बंद हो जाती. चारों तरफ घनघोर हरे भरे जंगल, भाँति भाँति के रंग बिरेंगे फूल, पहाड़ों की ये उँची उँची चोटियाँ और बादलों के छोटे छोटे गुच्छे पहले ही शरीर के रोंगटे खड़े कर चुके थे. लगभग डेढ़ घंटा चलने के बाद पहला पड़ाव सिक्किम की मशहूर सोमगो लेक पर हुआ. स्थानीय लोग इसको छान्गू लेक बोलते हैं. चारों तरफ से पहाड़ों से घिरी पानी से लबलब भारी एक अती सुंदर झील चारो तरफ से बौध धर्म के रंग बिरंगे कपड़ों के झंडों से ढकी हुई है. बादलों के छोटे छोटे गुच्छे झील मे डुबकी लगा रहे थे. शायद सुबह का स्नान करने आए हों. जगह जगह बॉर्डर रोड ऑर्गनाइज़ेशन (BRO) और सिक्किम सरकार के द्वारा लगाए गये बोर्ड लोगों को कचरा ना फैलाने के लिए प्रेरित कर रहे थे. आधे घंटे मे कोई 2 दर्जन फोटो खिचाने के बाद हमारा जत्था अपने दूसरे पड़ाव के लिए चल दिया.
बाबा मंदिर:- रोंगटे खड़े कर देने वाले इतिहास और वर्तमान को समेटे हुए यह मंदिर भारतीय सेना के लिए किसी धाम से कम नही है. बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सैनिकों और लोगों दोनों की ही आस्थाओं का केंद्र है। इस इलाके में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा का आशीर्वाद लेने ज़रूर आता है।  भारतीय सेना के स्वर्गीय सैनिक हरभजन सिंह 24 वि पंजाब रेजिमेंट के जवान थे जो की 1966 में आर्मी में भर्ती हुए थे। पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में, सिक्किम में एक दिन जब वो खच्चर पर बैठ कर नदी पार कर रहे थे तो खच्चर सहित नदी में बह गए। नदी में बह कर उनका शव काफी आगे निकल गया।  दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी शव की जगह बताई। यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फ़ीट ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है जिसमे प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते है। बाबा की सेना की वर्दी और जुते  रखे जाते है। कहते है की रोज़ पुनः सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सलवटे पाई जाती है। सैनिको का कहना है की हरभजन सिंह की आत्मा, चीन की तरफ से होने वाले खतरे के बारे में पहले से ही उन्हें बता देती है। और यदि भारतीय सैनिको को चीन के सैनिको का कोई भी मूवमेंट पसंद नहीं आता है तो उसके बारे में वो चीन के सैनिको को भी पहले ही बता देते है ताकि बात ज्यादा नहीं बिगड़े और मिल जुल कर बातचीत से उसका हल निकाल लिया जाए। आप चाहे इस पर यकीं करे या ना करे पर खुद चीनी सैनिक भी इस पर विश्वास करते है इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की एक खाली कुर्सी लगाईं जाती है ताकि वो मीटिंग अटेंड कर सके। आर्मी की तरफ से बाबा की सेलरी आज भी उनके अकाउंट मे जमा की जाती है. बाबा मंदिर के दर्शन किए बिना गंगटोक की यह यात्रा कैसे पूर्ण मानी जाती मैं सारे रास्ते यही सोचता रहा. 
नाथुला पास:- परमिट लेने के बाद गाड़ी शानदार पहाड़ी रास्तों से होते हुए दिन के आख़िरी गनतव्य की तरफ दौड़ चली. BRO के द्वारा किए गये अद्भुत काम को देख कर मन सम्मान से भर उठा. जगह जगह लैंड स्लाइड होने की वजह से पूरी की पूरी पहाड़ी तक खिसकी हुई दिखाई दी पर इनके साहस और काम को सलाम जो उसने रोड बंद नही होने दिया और तुरंत नये नये रास्तों का निर्माण किया. कैप्टन स्ट्रीट डागर गेट पर परमिट चेक कराने के बाद हमें नाथुला पास के लिए 4 किलोमीटर का रास्ता और तय करना था. बारिश और उँचाई की वजह से ठंड पहले ही काफ़ी बढ़ चुकी थी और मैं अपनी स्वेटर पहनने के बाद भी कांपना शुरू कर चुका था. गाड़ी के शीशे उपर कर लिए गये. अक्ष ने पहले ही रास्ते मे एक छोटी सी दुकान से 100 रुपये मे एक हेवी जेकेट किराए पर ले ली थी. उसको पहाड़ के नाम से ही ठंड लगनी शुरू हो जाती है. तभी तो ट्रेन मे भी पूरे रास्ते कंबल से बाहर नही निकला. बेहद खूबसूरत नज़ारों को चीरते हुए दोपहर 1.30 बजे हम नाथुला पास पहुँचे. दोरजी ने सख्त हिदायत दी की यहाँ ऑक्सिजन की कमी महसूस हो सकती है. इसलिए ऐसा होने पर उपर जाने की बजाय जितना जल्दी हो सके नीचे गाड़ी मे आकर बैठना है. दोरजी को अनसुना कर मैं तुरंत गाड़ी से कूदा और उपर चड़ने के लिए सीढ़ियों की तरफ भागा. मुझे भागते हुए देख अक्ष भी मेरे पीछे ही लपका. जहाँ गाड़ी रुकती है वहाँ से करीब 50 सीढ़ियाँ उपर चड़ कर नाथुला पास को बिल्कुल सामने से देखा जा सकता है. पर ये क्या, मुश्किल से 5 सीढ़ी चड़ने के बाद ही हम दोनो बुरी तरह हाँफने लगे. बढ़ती उम्र, खराब खाना, बेहद खराब स्टेमिना सब कुछ दिमाग़ मे कौंध गया. लगा की घर जाते ही एक्सर्साइज़ शुरू करूँगा. मुझे अपने आप पर विश्वास नही हो रहा था की किसी जमाने का स्टेट लेवल का एथलीट सिर्फ़ 30 की उम्र मे 5 सीढ़ियाँ चड़ते ही कैसे हाँफने लगा. थोड़ी देर रुकने के बाद फिर धीरे धीरे उपर बढ़ने लगे. अबकी बार 10 फिर 5 करके किसी तरह लगभग 20 सीढ़ियों तक पहुँच कर आखों के आगे अंधेरा छा गया. मुँह पूरा खुला हुआ था. सांस लेने के समय मुँह से घें घें की आवाज़ आने लगी. दोनो आखें बड़ी बड़ी फूल कर बाहर को आ गयीं. नाक पूरा लाल हो गया. ऐसा लग रहा था शरीर का हर हिस्सा सांस लेने के लिए तड़प रहा है. सिर्फ़ दिल ही नही पूरी छाती धड़कने लगी. बाहर से ठंड लग रही थी पर अंदर से पसीने की वजह से शर्ट पूरी भीग चुकी थी. दोनो खड़े होकर हाँफने लगे. मेरा ध्यान अक्ष की तरफ गया तो उसको देख मैं बुरी तरह से चौंका. उसके होठ नीले पड़ चुके थे और मुँह घें घें की आवाज़ के साथ पूरा खुला हुआ था. अक्ष ने हाथ खड़े कर दिए और बोला की बस अब और नही चल सकता. मुझे उसी पल समझ आया की ये स्टेमिना की कमी नही है, दरअसल ये कम ऑक्सिजन लेवल का असर है. आस पास के लोगों को देखा तो सभी हाँफते हुए दिखे. अक्ष की हालत देख कर अजय सोडनी की “दर्रा दर्रा हिमालय” याद आ गयी. अजय जी ने इसमे बताया है की कैसे हिमालय चड़ने के दौरान उनकी पत्नी को लो ऑक्सिजन की वजह से मेंटली डिसॉर्डर होने का ख़तरा बढ़ गया था. इस किताब मे साथ ही अजय जी ने यह भी बताया है की अगर ऐसा होता है तो इसका एक ही इलाज है की जितनी जल्दी हो सके प्रभावित व्यक्ति को तुरंत नीचे की तरफ लेकर भगा जाए. मैं सोच मे पड़ गया. मैं ये नही चाहता था की अक्ष बिना पास देखे ही नीचे लौट जाए और साथ ही मैं कोई रिस्क भी नही लेना चाहता था. मैने अक्ष को तुरंत सारी बात समझाई और आख़िरकार 14200 फीट की उँचाई पर पहुँच कर कुदरत के निर्णय का सम्मान करते हुए मैने अक्ष को नीचे लौट जाने को बोला. बीच रास्ते मे ही एक छोटी सी चाय की दुकान थी. अक्ष को थोड़ी देर दुकान मे आराम कर के नीचे जाकर गाड़ी मे बैठ जाने का समझा कर मैं उदास मन से उपर की तरफ चला. अब तक मैं समझ चुका था की मुझे हर 2 सीधी चढने के बाद कुछ सेकेंड के लिए रुकना है. और फिर जल्दी ही मैं पहुँच चुका था अपने जीवन मे चढ़ी गयी अब तक की सबसे उँची जगह पर. जी हाँ ये है नाथुला पास. शानदार-जिंदाबाद-ज़बरदस्त. चाइना और इंडिया के बॉर्डर के गेट, बॉर्डर के दोनो और दोनो देशों की एक एक बिल्डिंग, सैनिक चौकियाँ, बीच मे एक हल्का सा काँटों वाला तार और दोनो और दोनो देशों के बहादुर सैनिक, वाह, अद्भुत, सलाम मेरे देश के इन बहादुरों को. देश से की गयी सारी वफ़ादारी, गद्दारी, प्यार, गुस्सा, मोहब्बत सब याद हो आई. हम जब मीलों दूर बैठ कर सर्दी गर्मी, भीड़, यातायात, कम ज़्यादा बारिश का रोना रो रहे होते हैं उस समय भारत माँ के ये लाल यहाँ प्रहरी बने खड़े होते हैं. एक जवान चौहान साहब से कुछ देर बात हुई. उनसे हाथ मिलाया और उनके कदम चूम लेने का मन हुआ पर संकोच वश ऐसा कर नही सका. जिंदगी मे पहली बार साक्षात मौत और भगवान दोनो को फील किया. चौहान जी को उनकी बहादुरी भरी ड्यूटी के लिए थैंक यू बोला और नियमों को तोड़ते हुए बॉर्डर की एक फोटो खींच ली. वापिस उतरते हुए अपने आप को बेहद छोटा और शर्मिंदा महसूस कर रहा था. एक बार फिर से भारत माता और उसके उन बहादुर बेटों को दिल से सलाम बोला और तेज़ी से गाड़ी मे लौट आया जहाँ अक्ष पहले से ही वेट कर रहा था.
गंगटोक साइट सीन:- गंगटोक के आस पास बेहद खूबसूरत जगह हैं जहाँ सैलानी बड़ी संख्या मे घूमने जाते हैं. सिक्किम की सबसे बड़ी रूमटेक मोनेस्ट्री, गणेश टोंक, हनुमान टोंक इत्यादि इनमे से प्रमुख हैं. हर जगह के लिए प्राइवेट टॅक्सी बड़ी आसानी से उपलब्ध हैं.
अगले दिन रूमटेक मोनेस्ट्री और कुछ और जगहों पर घूम कर एक दिन बाद गंगटोक को अलविदा कहने का समय आ गया था. उदास मन से रात को पैकिंग कर के सुबह सुबह सिलिगुड़ी के लिए शेयर्ड टैक्सी पकड़ कर चल दिए. रास्ते मे बादलों के झुंड के झुंड तीस्ता नदी मे नहाते हुए दिखाई दिए. चलती गाड़ी मे खिड़की से बाहर निकल कर मुँह खोल कर पहाड़ो की ताज़ी हवा मुँह मे भर कर खाने की कोशिश करने लगा. उस हवा को दोनो मुठठीयों मे और खूबसूरती को नज़रों मे हमेशा के लिए बसा लिया. गीले बादल गाड़ी के आगे से उमड़ घूमड़ कर गुजर रहे थे. तभी बादलों ने एक गीली सी थपकी मेरे गालो पर दी और मुझे अलविदा कहा. ए सिक्किम प्यार है या नशा है तेरा ये रूप, अजब गजब सिक्किम, लोंग लिव सिक्कीमीस. 
क्यूँ जाए:- अगर आपको हर छोटे बड़े काम के लिए सिस्टम या सरकारों को कोसने की आदत है तो एक बार सिक्किम जाकर ज़रूर देखना चाहिए. सिक्किम का हर छोटा बड़ा आदमी कितनी शिद्दत से एक नागरिक का होने का फ़र्ज़ निभाता है ये देख कर आप शर्मिंदा भी हो सकते हैं. पहाड़ों मे चौड़ी, सपाट और शानदार सड़कें, बेहतरीन साफ सफाई, फ्लौरा एंड फियोना, दिलकश मौसम, दिलदार लोग, चाइना बॉर्डर और कुछ अच्छी छुट्टियाँ बितानी हैं तो सिक्किम ज़रूर जाएँ. 
कब जाएँ:- गंगटोक एरिया का सबसे पीक सीज़न दिसंबर से मार्च तक होता है. इस समय चारों तरफ आपको बुरफ के अलावा शायद ही कुछ दिखाई दे. एम जी रोड के टैक्सी स्टैंड से पीक सीज़न मे जहाँ 1500 टैक्सी चलती हैं वहीं ऑफ सीज़न मे मात्र 40 से 50. अगर भीड़, लंबे ट्रॅफिक जाम और महगें होटलों से बचना है तो मई के बाद जाना बेहतर होगा. साथ ही चाहे जिस मौसम मे जाएँ एक जेकेट, अच्छा कैमरा, कुछ फोटो ओर एक आइडेंटिटी प्रूफ ले जाना ना भूलें.

यात्रा वृतांत: जागेश्वर धाम अल्मोड़ा

ये दिन भी बाकि के दिनों की तरह साधारण ही था। हमेशा की तरह सुबह उठते ही पहला ख्याल घूमने के बारे में ही आया। फिर पता नहीं कैसे पर अचानक से मन बन गया की अल्मोड़ा स्थित जागेश्वर धाम चला जाये, वो भी आज के आज ही। काफी समय हो गया है इस यात्रा को टालते हुए अब और बहाने नहीं। जैसे जैसे दिन चढ़ता गया, मन में जाने या नहीं जाने के बीच द्वन्द चलता रहा। जैसे मुसीबत के समय चाचा चौधरी का दिमाग कम्प्यूटर से भी तेज चलता है वैसे ही पैसों की बात आते ही मेरा दिमाग आर्यभट्ट से तेज चलने लगता है। पैसे कम हैं... छुट्टी नहीं मिलेगी .... साथ जाने के लिए कोई दोस्त नहीं है .... आदि आदि। पर अफसोस आज दिमाग पर दिल हावी रहा और रात के 9 बजते बजते मैं अपना वीकेंड बैग लटकाये आनंद विहार के बदबूदार बस अड्डे पर था। यूपी - उत्तराखंड में अगर आपको कहीं जाना हो तो इस दुर्गन्ध युक्त बस अड्डे पर आपको आना ही पड़ेगा। मेट्रो से उतरने के बाद इंसानो द्वारा बनाई गयी मूत्रधाराओं के बीच से उचकते उचकाते पैर रखते हुए और नाक पर अपना तौलिया कस कर लपेटे हुए जब बस अड्डे पहुंच कर एक खटारा बस में सवार हुआ तो बे-चैन की साँस ली। सूखा कीचड़ बस की बाहरी दीवारों पर विश्व का मानचित्र सा बना रहा था। उत्तराखंड रोडवेज की ये बस एक ऐसे डाक बंगले जैसी लग रही थी जिसमे सदियों से कोई नहीं आया हो। दिन की थकान की वजह से बस के चलते ही तुरंत सो गया। बाजु वाले अंकल अपनी मुंडी मेरे कंधे पर लाद कर मुझसे माँ की ममता टाइप फीलिंग लेते रहे। कहीं कहीं सड़क की दुर्दशा की वजह से गर्दन बार बार सुसाइड करती रही। बस अपनी वाइब्रेशन और खड़ खड़ की वजह से सारी रात लोरी सुनाती रही। सुबह 5 बजे हल्द्वानी पहुँचा तो तुरंत अल्मोड़ा के लिए बस मिल गयी। लगभग 9 बजे अल्मोड़ा फिर वहां से शेयर जीप में बाड़ेछीना फिर वहाँ से दूसरी शेयर जीप में आरतोला पहुँचा तो 11 बज चुके थे। जागेश्वर मंदिर अभी भी यहाँ से 3 KM दूर अंदर की तरफ एक निर्जन रास्ते पर था और आपको या तो पैदल जाना था या किसी गाड़ी का इंतज़ार करना था ... यह इंतजार बहोत देर का भी हो सकता था क्योंकि यहाँ अक्सर आपको गाड़ी नहीं दिखाई देगी। इस समय मेरे लिए दोनों ही विकल्प मुश्किल थे। जहाँ गाड़ी से उतरा वहीँ एक झोंपड़ी टाइप रेस्टोरेंट दिखाई दिया तो पेट खुशी से कुलांचें मारने लगा। जागनाथ द्वार रेस्टोरेंट ... जी भर कर खाना खाया। जब तक खाना खत्म करता रेस्टोरेंट के मालिक दर्शन भाई से दोस्ती कर चुका था। थोड़ी गप शप के बाद 500₹ में उनके घर में ही रुकना तय हो गया। ज्यादा घुमक्कड़ी का एक नुकसान यह भी है की आप कम समय और कम पैसे में ज्यादा मजा चाहते हो ... और अक्सर मैं इस तरह की चुनौती का सामना करता हूँ। दर्शन भाई के रेस्टोरेंट की भट्टी पर चाय बनाने वाली केतली में गर्म पानी कर के नहाया। घंटे भर में सारे काम निपटा कर ... तरोताजा होकर मैं अब चला महादेव के द्वारे। मेरी इस वीकेंड मस्ती की दो बातें जो मुझे बाद तक बहोत सुकून देती रहीं ... पहला मैं हमेशा की तरह अकेला आया था और दूसरा मैं इस बार अपने साथ कैमरा नहीं लाया था। आस पास के नजारे बहुत ही मनमोहक थे....किंतु माँ जीवन शैफाली कहती हैं की प्रकृति को कैमरे में कैद करना भी उसके साथ अन्याय ही होता है। ब्लॉग के लिए मोबाइल से कुछ फोटो लिए और चलता रहा। 3 किमी का ये रास्ता विभिन्न तरह की वनस्पतियों और पक्षियों से भरपूर है। रास्ते के साथ साथ शोर करता हुआ पानी लगातार बहता है जो मंदिर के पास पहुंचते पहुंचते काफी ज्यादा हो जाता है और एक छोटी मोटी नहर का रूप ले लेता है। लगभग आधे घंटे में मैं मंदिर पहुँच चुका था। मुख्य मंदिर इतना शांत एवं सम्मोहक है की मैं करीब 2 घंटे मंदिर के फर्श पर ही बैठा रहा। एक अजीब, अदृशय व अलौकिक शक्ति मन को अदभुत सी शांति देती हुई महसूस हो रही थी। मंदिर की शांति को अपने अंदर समेट कर शाम 6 बजे वापिस अपने ठिकाने पर आ गया। 

महादेव के दर्शन करने के पश्चात दो दिन तक दर्शन भाई के पास होम स्टे किया। इस दौरान आस पास की पहाड़ियों में पैदल घूमता और जब थक जाता तो वापिस अपनी झोंपड़ी नुमा बाल्कनी में कुर्सी डाल कर बैठ जाता। चाय की चुस्कियों के बीच पहाड़ों को निहारता और अपनी डायरी लिखता रहता। काश के जीवन इतना ही सरल होता और मुझे कभी लौटना नहीं पड़ता। पर लौटना तो होता ही है .... फिर से जाने के लिए। किसी ने सही ही कहा है - "You return from a trip not from a journey"

जागेश्वर धाम मंदिर - 
उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान हिमालय की पहाडियों के कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरीराजा थे। जागेश्वर मंदिरों का निर्माण भी उसी काल में हुआ। इसी कारण मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक भी दिखलाई पडती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है। कत्यरीकाल, उत्तर कत्यूरीकाल एवं चंद्र काल। बर्फानी आंचल पर बसे हुए कुमाऊं के इन साहसी राजाओं ने अपनी अनूठी कृतियों से देवदार के घने जंगल के मध्य बसे जागेश्वर में ही नहीं वरन् पूरे अल्मोडा जिले में चार सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया जिसमें से जागेश्वर में ही लगभग 200 छोटे-बडे मंदिर हैं। मंदिरों का निर्माण लकडी तथा सीमेंट की जगह पत्थर की बडी-बडी शिलाओं से किया गया है। दरवाजों की चौखटें देवी देवताओं की प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकडी का भी प्रयोग किया गया है।

क्यूँ जाएँ - अगर आपको मन्दिरों में जाना ... भजन पूजन करना और महादेव की स्तुति करना अच्छा लगता है, एक वीकेंड दिल्ली की भीड़ से दूर किसी निर्जन स्थान पर समय गुजरना चाहते हैं, प्रकृति को निहारना-महसूस करना चाहते हैं ... तो जागेश्वर से अच्छा और नजदीक विकल्प शायद ही आपको मिले। 

कैसे जायें - ट्रेन से काठगोदाम तक जाकर वहाँ से बस या टैक्सी पकड़ कर खूबसूरत पहाड़ी रास्ते से होते हुए अल्मोड़ा जाया जा सकता है। या दिल्ली से सीधा बस के द्वारा अल्मोड़ा वाया हल्द्वानी पहुँचा जा सकता है। अल्मोड़ा से सीधे जागेश्वर तक जाने के लिए कोई साधन आसानी से उपलब्ध नहीं होने के कारण टुकड़ों में मंदिर तक जाया जा सकता है। यह मंदिर अल्मोड़ा पिथौरागढ़ मार्ग पर आरतोला के नजदीक है .... अल्मोड़ा - बाड़ेछीना - आरतोला - जागेश्वर धाम मंदिर।

Saturday, 19 December 2015

मोदी और केजरीवाल - राजनैतिक कार्यशैली

राजनैतिक रूप से साल 2014 जहाँ धुआंधार प्रचार, तालियों वाले भाषण और जबरदस्त जीत के बाद मोदी जी के नाम रहा. वहीं 2015 को गिड़गिड़ाने वाले भाषणों, आरोप-प्रत्यारोप और एक और बंपर जीत के बाद केजरीवाल अपने नाम करने में कामयाब रहे. इसमें कोई दो राय नहीं की अपनी जबरदस्त भागदौड़ और यहाँ वहां की उछलकूद के दम पर केजरीवाल अपनी राजनैतिक छवि मजबूत करने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं. पार्टी में उठते विरोध के स्वरों को एक के बाद एक जिस कद्र कुचल कर केजरी अपनी तानाशाही के दम पर पार्टी में शीर्ष पर बने हुए हैं वो उनकी राजनैतिक परिपक्वता को दर्शाता है. एक और जहाँ स्पष्ट बहुमत के बाद भी मोदी अब तक न केवल कोई महत्वपूर्ण बिल पास करने में नाकामयाब हुए बल्कि संसद तक भी ठीक से नहीं चलवा पा रहे हैं वहीं दूसरी और विपक्ष के मात्र तीन सदस्य होते हुए भी केजरी बड़ी ही बखूबी से कभी मार्शल्स का उपयोग तो कभी हफ्ते हफ्ते का निलंबन करवाते आ रहे हैं. साथ ही साथ जिस तरह से अलका लम्बा को आगे कर भाजपा सदस्यों पर पहले विधानसभा और बाद में सड़क पर उतर कर हमला बोला गया उसने भाजपा को दिल्ली में बैकफुट पर धकेलने का काम किया. केजरीवाल ना सिर्फ दिल्ली में बल्कि अन्य कुछ राज्यों में भी भाजपा के जनाधार को बुरी तरह क्षत विक्षत करने में जी जान से जुटे हैं. भाजपा के भीतर घातियों को जहाँ सत्ता की मलाई हज़म नहीं हो रही वहीं आम आदमी पार्टी ने इतने दिनों में पूरी तरह से अरविन्द को समर्पित वालंटियर्स की फ़ौज कड़ी कर दी है. मुख्यमंत्री के द्वारा लगाये गए बिना सर पैर के झूठे आरोपों को कब तक मिडिया में बनाये रखना है और कब सड़क पर उतर कर धरना प्रदर्शन करना है ये लोग इसे अच्छी तरह से समझते हैं. अपने चहेते अफसरों और समर्पित नजदीकियों का ख्याल कैसे रखा जाता है ये भी अरविन्द बता चुके हैं, फिर चाहे वो हाल ही की सीबीआई रेड में राजेन्द्र को बचाना हो या स्वाति मलीवाल को अध्यक्ष बनाना हो. वहीं दूसरी और मोदी गजेन्द्र चौहान के मुद्दे पर अभी तक संघर्ष कर रहे हैं. बहरहाल गोएबल्स थ्योरी के दम पर तेजी से आगे बढ़ते हुए अरविन्द केजरीवाल ने विरोधियों के माथे पर चिंता की लकीरें उकेर कर ये जता दिया है की 2019 तक वो सिर्फ दिल्ली के नेता के तौर पर ही नहीं जाने जाना चाहते हैं.

‪न्याय वयवस्था से उठता भरोसा‬


चाहे दोषी छूट जाये पर एक भी निर्दोष को सजा न होने पाये" बाबा साहेब ने जिस विचारधारा को सामने रख कर भारतीय संविधान के अंतर्गत कानून बनाये थे वो विचारधारा आज के समय में तर्कसंगत नहीं रह गयी है. रेंगती भारतीय न्याय वयवस्था में इतने खिड़की दरवाजे हैं की अपराधी अगर रसूख वाला हो तो अँधेरी कोठरी में कभी रह ही नहीं सकता....... सलमान खान इसका ताजातरीन उदाहरण हैं. एक पल को मान भी लिया जाये की न्याय पालिका भ्रष्ट नहीं है बावजूद उसके क्यों आज समाज का हर अमीर अपराधी यहाँ वहां आज़ाद कुलांचे भरता फिरता है......भुग्तभोगियों की डबडबायी नरम आँखे न्याय की आश में पत्थर की हो जाती हैं पर अपराधी का सफेदपोश कैनवास कभी मैला नहीं होता. चाहे वो 1998 का हिरण शिकार मामला हो या 1970 का बंगाल का सैनबाड़ी केस.... लोग सिस्टम की मोटी दीवारों और न्याय की अंधी देवी के आगे चीख चीख कर बेदम हो गए पर हमारी महान न्याय व्यव्यस्था अभी तक समय पर सही गलत बताने का दम नहीं दिखा सकी है ...तो क्या यह मान लिया जाये की भारतीय न्याय वयवस्था आज उस मच्छरदानी की तरह हो चली है जो होती तो मच्छर रोकने के लिए है पर इतनी जगह से उधड़ी पड़ी है की मच्छरदानी के नाम पर एक चिथड़ा भर बन कर रह गयी है. 70 हज़ार करोड़ का घोटाला कर के सिर्फ 7 महीने जेल में काटने के बाद आज़ाद परिंदों के मानिंद घूमते ना जाने कितने ही कलमाड़ी इसकी एक बानगी भर हैं. इस सबके पीछे फांसी की सजा पाये आतंकवादियों के लिए मानवाधिकार के नाम पर छाती पिट पिट कर मुर्रहम मनाता हमारा मीडिया और वोट बैंक बन कर घूमते हमारे जैसे नागरिक भी बराबर के भागीदार हैं. यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा की बड़े बड़े नेता, जज, वकील, पत्रकार और एक्टिविस्ट इत्यादि खुल्लेआम एक आतंकवादी की पैरवी करते हुए दया याचिका अभियान चलाते हैं और हम चीटियों तर्ज पर इन रंगे सियारों का अनुसरण करते हुए उनके पीछे पीछे आँख बंद कर के चलते हैं. तराजू वाली देवी पैरोल के नाम पर कब किसकी कोठरी का दरवाजा खोल दे कौन जानता है. हमारी न्यायिक प्रणाली शक्तिशाली लोगों के घरों की चौखटों को किस कद्र चूमती है इसका अहसास तब और गहरा हो जाता है जब 19 साल चले आय से अधिक सम्पति के मामले का फैसला सिर्फ 10 सेकंड में सुना दिया जाता है. जर्रा जर्रा हो चुका सिस्टम सेकंड हैण्ड स्कूटर पर चलने वाले उस पत्रकार की महफ़िल में नागिन डांस करता है जो आज हज़ारों करोड़ के ग्रुप के साथ भारत के बड़े बिज़नेस टायकून हैं. इनके पाक साफ दामन की चुंधिया देने वाली चमक के आगे बदलती सरकारें और माननीय न्यायपालिका कभी उस कालिख को नहीं देख सके जिसका ढेर लगा कर ये यहाँ तक पहुंचे हैं. इन्साफ मांगने के नाम पर आज तक ना जाने कितनी ही निर्भया और कितने ही सेन बंधु उस तुनकमिजाज व्यवस्था के बुलेट प्रूफ शीशों से टकरा कर खुद चूर चूर हो चुके हैं. सर्वोच्चता और सम्मान के नाम पर कानून की खाइयां आम आदमी के लिए और गहरी होती जा रही हैं. जयललिता, सलमान, मोहम्मद अफ़रोज़ के बाद सोनिया राहुल भी निर्दोष साबित हो कर बाहर आते ही होंगे. बहरहाल, न्यायपालिका के सम्मान और सर्वोच्चता के नाम पर आम जनता के हिस्से सिर्फ अंधेरगर्दी को ढ़ोना ही लिखा है......

आमिर खान और असहिष्णुता

बेजोड़ बात यह है की आमिर खान ने देश छोड़ने की बात इसलिए कही की उसे यहाँ अब सुरक्षित महसूस नहीं होता. मतलब यह देश उसकी और उसके बच्चों की सुरक्षा के हिसाब से सही नहीं है. इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि इस पुरे भाषण के दौरान आमिर ने एक बार भी मोदी - भाजपा का नाम नहीं लिया. अगर ऐसा है तो आमिर के साथ खड़े लोग किस बिनाह पर उसका समर्थन कर रहे हैं. बहरहाल, बड़ा सवाल यह हो चला है कि क्यों न देश छोड़ने की बात करने या उसका समर्थन करने वाले को देश विरोधी मान लिया जाये या फिर क्या यह मान लिया जाये कि इंडिया इज़ मोदी, मोदी इज़ इंडिया? विरोध का जूनून कुछ इस कद्र हावी हुआ की मोदी विरोध कब देश विरोध में बदल गया पता ही नहीं चला. असहिष्णुता के नाम पर एक मुल्क की ऐतिहासिक वर्ज़िशों के टपके पसीने के मानिंद हम उस यकीन से गुजार दिए गए जैसे हम सबका गया गुजरा होना ही नियति है. बात दरअसल यह है कि मोदी और देश के बीच की रेखा को रबड़ से मिटा कर बड़ी ही सफाई के साथ देश विरोध को मोदी - भाजपा के साथ जोड़ दिया गया है. विरोधियों और लुटियन के बंगलों कि इंचार्जी हासिल करने कि ख़्वाहिश रखने वालों की भीड़ में इस फर्क को कोई देख नहीं पा रहा है या देखना नहीं चाह रहा है. समर्थक लोकतंत्र के नाम पर कब वोटतंत्र में बदल गए ये जानना भी अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं.

Breaking India Forces are now no more unreal gossips..।


कोई दुकानदार प्रतिस्पर्धी दुकानदार का धंधा खराब करने के लिये नगर निगम के पाइप लाइन वालों को पैसे खिलाता है कि प्रतिस्पर्धी की दुकान के सामने नाले का पाइप तोड़ दो या फूटपाथ खोद के रखो ताकि ......। युधों के तरीके बदल गये हैं.... पहले के जमाने मे राजाओं की सेनायें आमने सामने लडाईयां लड़ती थी....सेनाओं की वो लड़ाइयां बंदूक - तोप से होती हुई राकेट - मिसाईल और फिर cobart तक आ पंहुची। दूसरे देश को तोड़ने के लिए अभी जो लेटेस्ट फैशन है उसके हिसाब से उस देश के लोगों को भारी फंडिंग करो.... NGOs खुलवाओ....आये दिन धरने प्रदर्शन....तोड़ फोड़....सरकर विरोधी नारे..... सरकार को काम नहीं करने दो....लोगों को एक चुनी हुई सरकार और देश के संविधान के प्रति भड़काओ। सिर्फ दो दिन की छापेमारी में पचास हज़ार मीट्रिक टन से दालें बरामद की गई हैं....इतना स्टॉक कोई साधारण व्यापारी जमा नहीं कर सकते.... तो ये कोन लोग हैं जो इतने बड़े पैमाने पर जमाखोरी में लिप्त हैं.... महँग़ाई बढ़ने से किसको फायदा होगा। कुछ सिख उपद्रवी ही गुरु ग्रन्थ साहिब के पन्ने क्यों फाड़ने लगे हैं.... और फिर तुरंत केजरीवाल को शांत पड़े पंजाब के कोट कपूरा में अचानक से जाने की जरुरत क्यों आन पड़ी? धार्मिक झड़पें....दलित महादलित... बीफ...वीके सिंह ....मैं हिन्दू तू मुसलमान ....मीडिया अपने एजेंडे में कामयाब हो रहा है..... छोटी सी किश्ती को टाइटैनिक बना कर दिखाया जा रहा है. पर क्यूँ? प्रत्यक्ष तौर पर इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है पर अप्रत्यक्ष हम और आप खूब देख और समझ रहे हैं. कड़ियाँ जुड़ती और राजनीती की गुथ्थी उलझती जा रही है. लड़ाई उस लेवल पर है जहाँ दुश्मन अनजान पर शातिर है. कुरुक्षेत्र के मैदान में डटी कौरवों की सेना धूर्तता की कोई भी सीमा लांघने के लिए तैयार खडी है. अपने आस पास निगाह रख कर बड़े पैमाने पर चल रहे षड्यंत्र को समझना जरुरी है...मजहब जात को दूर रख कर हमेशा सजग और चौकन्ना रहना भी देशभक्ति ही है। 
Breaking India Forces are now no more unreal gossips..।

Sunday, 18 October 2015

अकबर बीरबल के किस्से और केजरीवाल


अकबर बीरबल की कहानियां हम सबने खूब सुनी हैं. किस्से भले ही पुराने हों पर सच आज भी उतने ही होते हैं. इसी तरह ढेर सारे किस्सों के बीच एक किस्सा यह भी...
एक दिन बादशाह अकबर और बीरबल महल के बागों में सैर कर रहे थे। वे बीरबल से बोले, 'बीरबल, देखो यह बैंगन, कितनी सुंदर लग रहे हैं!इनकी सब्जी कितनी स्वादिष्ट लगती है! मुझे बैंगन बहुत पसंद हैं।" 
हां! महाराज, आप सत्य कहते हैं। यह बैंगन है ही ऐसी सब्जी, जो ना सिर्फ देखने में ब्लकि खाने में भी इसका कोई मुकाबला नहीं है। और देखिए महाराज भगवान ने भी इसीलिए इसके सिर पर ताज बनाया है। बादशाह अकबर यह सुनकर बहुत खुश हुआ।
कुछ हफ्तों बाद बादशाह अकबर और बीरबल उसी बाग में घूम रहे थे। बादशाह अकबर को कुछ याद आया और मुस्कुराते हुए बोले, 'बीरबल देखो यह बैंगन कितना भद्दा और बदसूरत है और यह खाने में भी बहुत बेस्वाद है।' 
हां हुजूर! आप सही कह रहे हैं बीरबल बोला। इसीलिए इसका नाम बे-गुण है बीरबल ने चतुराई से नाम को बदलते हुए कहा।
यह सुनकर बादशाह अकबर को गुस्सा आ गया। उन्होंने झल्लाते हुए कहा, 'क्या मतलब है बीरबल?' मैं जो भी बात कहता हूं तुम उसे ही ठीक बताते हो। बैंगन के बारे में तुम्हारी दोनों ही बातें सच कैसे हो सकती हैं, क्या तुम मुझे समझाओगे? 
बीरबल ने हाथ जोडते हुए कहा, 'हुजूर, मैं आपका नौकर हूं बैंगन का नहीं।'
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चुनाव से पहले सर जी - 'हर बार दिल्ली में जब भी कोई रेप होता है, अपराध होता है शीला दिक्सित कहती है दिल्ली पुलिस हमारे पास नहीं है. क्या हमें ऐसी असहाय मुख्यमंत्री की जरुरत है?"
आपिया - 'Yes sir you are absolutely true.. अब तो आप ही हो जो दिल्ली को बचा सकते हो.' सर जी सुन कर खुश हुए. 
चुनाव के बाद - 'दिल्ली में लगातार अल्पसंख्यक बच्चियों का रेप हो रहा है. माना मैं मुख्यमंत्री हूँ पर PM और LG क्या कर रहे हैं. क्या वो अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं रोक सकते. मैं क्या करूँ दिल्ली पुलिस मेरे पास नही है नहीं तो मैं बताता की मैं क्या चीज़ हूँ।'
आपिया - ' Yes sir you are absolutely true...वाह। आज तो मज़ा आ गया .. आप जिस तरह से ट्वीट करते हो सोशल मीडिया पर क्रांति मचा कर रख दी है. ये तो मुख्यमंत्री का काम है ही नहीं।'
अबे पर पहले तो सर जी ने कहा था...'अबे चुप मैं सर का चम्मचा हूँ तेरा नहीं. ये देख मेरा ईमानदारी का सर्टिफिकेट. सर जी की जय हो.' आपिया ख़ुशी से नाचता हुआ चला गया। भक्त अभी तक अपने ऑफिस में बैठ कर सोच रहा है बीरबल आज तुम होते तो चमचागिरी में कड़ी टक्कर मिलती. .

ढोंगी भारतीय समाज


मेरे साथ काम करने वालों में लगभग सभी भारतीय हैं जिसमे से 50 % हिन्दू हैं. पते की बात ये है की जो हिन्दू हैं उनमे से लगभग 65 % बीफ खाते हैं .....बड़े चाव से.....बिना किसी जोर जबरदस्ती के....सभी विकल्प होते हुए भी....मेनू में 1500 से ज्यादा विकल्प मौजूद हैं...फिर भी खाते हैं.....ज्यादा South और North East India से हैं. दूसरी मज़े की बात ये है की उनमे से अधिकतर पूजा पाठ में इतना विश्वाश रखते हैं जितना आमतौर पर मुझे अपने इलाके में देखने को नहीं मिलता. सुबह शाम स्नान करके तमाम तरह के क्रियाकलापों को अपनाते हुए घंटो तक भगवान की मूर्ति के सामने लंबलेट हुए रहते हैं. कुछ तो ऑफिस में भी य्य्य्ये बड़े बड़े चन्दन वाले तिलकधारी बन कर आते हैं. कुछ मेरे काफी अच्छे दोस्त हैं...दिन रात का साथ उठना बैठना है. कई बार पूछा है मैंने कि तुम हिन्दू होते हुए भी बीफ कैसे खा लेते हो? सुनकर आश्चर्यचकित होता हूँ की वो लोग घर में भी खाते हैं. कुछ के यहाँ तो गाय की बलि देने की परम्परा भी है. 
लालू ने भी यही कहा है और कुछ गलत नहीं कहा है. यह बात सोलह आने सच है की बहुत से हिन्दू भी बीफ खाते हैं. पर चूँकि वोटों का ध्रुवीकरण होना है इसलिए इस बात को तो तूल दिया ही जाना चाहिए. पर यहीं से हमारे ढोंगी होने की बात भी सच होती है. बिल्ली को देख कर आँख बंद कर के बैठ गए हैं सब. कोई शक नहीं कि इस बार भाजपा को ही वोट दिया जाना चाहिए पर सिर्फ गाय के लिए नहीं. गाय को भाजपा नहीं हम ही बचा सकते हैं. हम उस दौर से गुजर रहे हैं जहाँ राजनीती हमारी खुद की सोच पर भारी पड़ रही है.

एक युवा और भावुक देश - हिंदुस्तान

हिंदुस्तान औसतन एक युवा और भावुक देश है. अब जमाना बदल रहा है. जरुरत है की देश की जनता, सियासत, उनकी सोच और उनका ढंग भी बदले. पिछले डेढ़ साल से जैसे काम हो रहा है उस से सहज ही अंदाजा हो जाता है की देश की दशा और दिशा किस तरह अंगड़ाई ले रही है. निगाहें जमीं हुई एवं निशाना सटीक है. एक और जहाँ स्थायी सदस्यता और दुनिया भर के इन्वेस्टमेंट के लिए दम लगाया जा रहा है वही दूसरी और विरोधी अभी सिर्फ इस बात में उलझे हुए हैं की माँ गरीब थी या नहीं, वाकई बर्तन मांजती थी या नहीं. साल भर के अंदरजहाँ घोटालों का अम्बार लग जाता था वहां अभी तक सूट जैसे मरे हुए मुद्दों को अल्कोहल डाल कर सुरक्षित रखे जाने की बेहूदा कोशिशें जारी हैं. वैचारिक दरिद्रता किस कदर छायी है यह तब बड़ी आसानी से देखने को मिलता है जब राजनैतिक विरोध के नाम पर आनंद शर्मा जैसे नेता सिर्फ इस बात को उछाल पाते हैं की माँ साथ क्यों नहीं रहती. धर्म और जातियों की जकड़न में उलझे इस देश में विरोध सिर्फ विरोध के लिए ही किया जाता है. राजनैतिक दंगल में जब जनता विकास के नाम पर फ्री बिजली-पानी से आगे न बढ़ पाये तो विदेशी दौरों के नाम पर वो लोग भी रिपोर्ट मांगने लग जाते हैं जो एक शहर के मच्छर तक ना मार पाये हों. विरोधियों की इसी बैचनी और तिलमिलाहट के बीच हमारी विश्वसनीयता दिन-बे-दिन गहरी और उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं. निश्चिंत हैं की देश गलत हाथों में नहीं है. साथ ही इस बात की बेहद सुखद अनुभूति भी है की साल भर से धंदे और चंदे बंद होने के बाद विरोधी अब तक हमें भक्त से ज्यादा कुछ नहीं कह पाये हैं.

Wednesday, 16 September 2015

आज का सूरज डूब गया तो क्या

कुछ चल रहा है अंदर ही अंदर. कुछ तो खिचड़ी पक रही है. एक उथल पुथल सी मची है. जैसे कहीं जाना है....कहाँ पता नहीं. मन बोझिल और आँखे शांत हैं. होंठ सिले हुए हैं. लगता है जैसे दूर कहीं एक गहरा सन्नाटा छाया है.....बगीचे में लगातार बोल रही कोयल भी अपनी कुक से ध्यान नहीं खींच पा रही है. घंटे भर से खेत में बैठा बैठा मानो जड़ हो गया हूँ.... दूर टीले के पीछे से सूरज का यूँ अस्त हो जाना और भी इमोशनल किये जा रहा है. वो शहर की रंग बिरंगी लाइटें और किराये के फ्लैट्स...कहाँ ले जाएगी ये भाग दौड़ हमें. जमाना बीत गया खुद से बात नहीं की....मुद्दत हो गयी खुद से मिले हुए...लगता है अब थोड़ा जीना पड़ेगा. आज का सूरज डूब गया तो क्या, कल फिर से उगेगा....कल फिर तुमसे मुलाकात होगी....!!

2 roommates और आरक्षण

2 roommates थे। दोनो अच्छे दोस्त थे। पर दोनों का सब सामान अलग अलग था। कारण ये था कि उनमें से एक मीट - माँस नहीं खाता था.....शुद्ध शाकाहारी था। दोनो की थाली चम्मच सब अलग थी। एक बार शाकाहारी अपने घर गया हुआ था....तो पीछे से दुसरे ने किसी वजह से शाकाहारी दोस्त की थाली मे चिकन डाल कर खा लिया। शाकाहारी जब लौट कर आया तो उसे सब पता लग गया। अपने दोस्त के साथ गाली गलौज करने लगा। दुसरे ने समझाने की कोशिश करी की कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता। अब शाकाहारी दोस्त का ग़ुस्सा और चढ़ गया और बोला कि अगर यही बात है तो इस बार जब तु घर जायेगा तो मैं तेरी थाली में गु डाल कर खाऊँगा......।

हार्दिक पटेल गुजरातीयों को थाली मे डाल कर गु खाना सीखा रहा है।

उधर पर्दे के पीछे से लालु, FTII, जसलीन कौर और हार्दिक पटेल के रास्ते युगपुरूष दबे पाँव क्रांति ला रहे हैं।

मुझे चाहिए पूर्ण आरक्षण।

मुझे चाहिए पूर्ण आरक्षण।

गुजरों का तो हो गया। जाट भी लगे हैं लाईन में....देर सवेर उनका कोटा भी हो ही जाना है। पटेल भी अपनी AC गाड़ियों में बैठ कर मैदान में डट गये हैं। जैनियों को पहले ही अल्पसंख्यक बता कर खुश कर दिया गया है। उधर मराठी लोग भी कुछ बस गाड़ियाँ फुंकने की तैयारी कर रहे बताये जा रहे हैं। बाहमणों और बनियों सिर्फ़ तुम बचे। तुम लोग क्यूँ चुप हो? तुम भी लंगोट कस लो और बना दो इस देश को आरक्षण की रणभूमि।

विकास में हो ना हो, विनाश में सबकी बराबर की भागीदारी आवश्यक है। यलगार हो..!!

राहुल गांधी को बधाई पत्र

सेवा में
                                        श्रीमान राहुल गांधी,
                                        उपाध्यक्ष कांग्रेस पार्टी
विषय - देश के करोड़ों रूपए बर्बाद करने हेतु बधाई पत्र

श्रीमान जी,
आपसे सविनय निवेदन है की जिस हिसाब से आप और आपकी पार्टी पिछले दस दिनों से पूरे तन मन धन से देश के रूपए बर्बाद करने में लगे हुए हो उसको जारी रखा जाये. वैसे भी विकास तो हम गरीबों को चाहिए होता है, आप इन फालतू के जुमलों में अपना समय नष्ट न करते हुए संसद में पूरी बेशर्मी के साथ ये नंगा नाच जारी रखें. अभी तक सिर्फ ढाई सौ करोड़ रूपए ही बर्बाद हुए हैं आपसे विनती है की इस काम में तब तक लगे रहें जब तक जनता की पाई पाई आपकी कहानियां सुनने में खर्च न हो जाये. देश को आखिर आप जैसे ही प्रधानमंत्री की तो जरुरत है. जिस तरह से आपकी पार्टी के माननीयों ने भूटान के प्रतिनिधिमंडल के सामने राज्यसभा में देश की इज्जत को तार तार किया है वो सबके बस की बात नहीं है. जिगरा चाहिए अपनी हंसती खेलती पार्टी का सत्यानाश करवाने के लिए. आपके कड़े परिश्र्म के लिए देश आपको धन्यवाद देना चाहता है.
अंत में बड़े ही खेद के साथ आपको सूचित करना चाहता हूँ की इस बार 44 सीट देकर जो गलती जनता के दवारा की गयी है, हम लोग ये सुनिश्चित करेंगे की अगली बार आपको 0 सीट मिलें.
भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार करने के लिए एक बार पुनः धन्यवाद और भविष्य के लिए शुभकामनायें

आपका
रोहित यादव

कांग्रेस : फुट डालो और राज करो

इतिहास गवाह है की अलगाववाद, अल्पसंख्यकवाद, जातिवाद और आरक्षण के जहर का बीज हमेशा से एक ही पार्टी के दवारा बोया गया है. और फिर बाकि तमाम पार्टियों ने जहर की इस बहती नदी में जम के हाथ धोये. फुट डालो और राज करो की नीति को सही मायने में अगर किसी ने अपना कर्म सिद्धांत बनाया है तो वो यही सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है. कांग्रेस के मंत्री जब सत्ता में रहते हैं तो राजा बन कर रहते हैं. प्रजा पर जुल्म करना इनका धर्म होता है. रामदेव के आंदोलन में आधी रात को लाठियां चलवाना इसकी एक बानगी भर है. अरबों खरबों के घोटालों से इनका साम्राज्य दिन दोगुनी रात चौगुनी उन्नति करता है. जब यही पार्टी विपक्ष में रहती है तो समाज को धर्म और जाती के नाम पर बाँट कर घर फूँक तमाशा देखती है. राजस्थान का गुजर और हरियाणा का जाट आरक्षण इनकी हालिया सफलता है. साथ ही गुजरात के पटेल समुदाय का आरक्षण के लिए मुंह उठाता आंदोलन साजिशों की लम्बी फेरहिस्त में एक और नाम है. अटूट सत्य यह है की हरियाणा का जाट या गुजरात का पटेल कभी भी सामाजिक या आर्थिक रूप से इतना पिछड़ा नहीं रहा की उसको आरक्षण के टुकड़ों के सहारे पलने की जरुरत महसूस हो. गुजरात के पटेलों ने अपने बिज़नेस कौशल के दम पर जहाँ न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी गुजराती भारतीय समाज का नाम चमकाया है वहीँ जाट समुदाय अपनी दिलेरी, स्वाभिमान और कृषि संबधी कौशल से हर जगह छाया हुआ है. इसी क्रम में जाते जाते हरियाणा के सिक्खों के लिए अलग SGPC का गठन सिक्ख समुदाय को बाँटने का कांग्रेस का एक और समाज विरोधी षड्यंत्र था. धर्म के नाम पर हाल ही में जैन समुदाय को आरक्षण की भट्टी में कांग्रेस द्वारा झोंक दिया गया. जो जैनी कल तक अपने को सनातन का अभिन्न अंग समझते थे वो षडयंत्रो के दलदल में इस कद्र फंस चुके हैं की केदारनाथ जैसे सर्वोच्च मंदिरों को जैनियों की सम्पति बता कर हथियाने की जुगत में लग चुके हैं. इस काम को अंजाम देने के लिए न जाने कितने ही जयचंद समाजसेवा का मुखोटा लगाये हमेशा तैनात रहते हैं. भारतीय राजनीती जिस बिसात पर बिछी हुई है वहां एक समाज के रूप में मोहरों से ज्यादा हमारा कोई अस्तित्व नहीं लगता. इन्ही मोहरों से चालें चल कर वोटों की फसल तैयार की जाती है. हाल ही में ये मोहरे एक आतंकवादी को हीरो बना कर बोई हुई फसल का पकने का संकेत दे चुके हैं. इस सफलता से कांग्रेस जैसी पार्टियां किस कदर उत्साहित हैं ये सदन में दिख रहा है. जहाँ सिर्फ 44 सांसदों ने 270 सांसदों वाली भाजपा को भूमि अधिग्रहण जैसे बहुप्रतीक्षित बिल को वापिस लेने पर मजबूर कर दिया है. हम एक समाज के रूप में कभी भी फट सकने वाले बारूद के उस ढेर पर बैठे हुए हैं जहाँ से चालें चलने वालों की मोटी तोंद के पीछे वोटों के भूखे भेड़िये दिखाई नहीं देते.

Tuesday, 21 July 2015

तेरी यादों की परछाई


"प्यार" एक कठिन और निर्मम शब्द है...सुनने में भले ही अच्छा लगे पर जब अपना असर छोड़ता है तो निमोनिया के P की तरह जिंदगी साइलेंट हो जाती है.....पायल तो तुम आज भी पहनती होगी, पर अब उनकी छनछनाहट पर दिल कौन न्योछावर करता होगा...हंसती भी होगी पर अब वो खिलखिलाहट कहाँ होती होगी...शरारत करना तो तुम्हारा नेचर है पर अब उन शरारतों पर जान कौन छिड़कता होगा....आज भी जब तुम्हारी याद आती है तो काले चश्मे पहनने पड़ते हैं. नदी के किनारे खड़े होकर हरे भरे पेड़ खेत खलिहानों को घंटो ताकना और मुस्कुराते रहना ही तुम्हारी याद है....गीली मिटटी की खुशबु, रिमझिम बारिश, शिव का मंदिर, शताब्दी का सफर...सब तुम्हारी यादों का ही रूप है.....शायद परछाइयों का पीछा करना ही जिंदगी है और परछाई कभी पकड़ में आती नहीं....
तेरे होने से ही मेरा होना है, तू जो है तो मैं हूँ, यूँ जो है तो मैं हूँ!!

Thursday, 16 July 2015

तेरे होने से ही मेरा होना है

केबिन के शीशे पे हाथ रख कर बाहर सड़क की और घंटो तक यूँही ताकता रहता हूँ. थोड़ी देर तक तो सड़क पर गाड़ियां और लोग आते जाते हुए दिखाई देते हैं फिर अचानक से पता नहीं सब कहाँ गायब हो जाते हैं. शोर शराबे से भरी हुई वो गन्दी सी सड़क जाने कब एकदम खूबसूरत और शांत हो जाती है. फिर उसी सड़क पर मुझे दिखने लगता है वो जिसे मैं देखने के लिए शीशे के पार अक्सर झांकता हूँ. शांत सड़क पर एकदम बेपरवाह होकर उछल कूद मचाती हुई तुम ......यहाँ से वहां, वहां से यहाँ .. ...बार बार आना फिर जाना....जब भी ऑफिस के सामने से निकलती हो तो नज़रें उठा कर शरारत भरी नज़रों से मुझे देखती हो...जैसे चिड़ा रही हो मुझे....अभी कल की ही तो बात लगती है जब बरसों पहले गीली पहाड़ी सडकों पर तुम यूँ मेरी उँगलियों में अपनी छोटी छोटी उँगलियाँ फंसा कर चलती थी....हाथों को जोर जोर से ऐसे हिलाते हुए जैसे परेड कर रहे हों हम...पहाड़ों से लौट कर आने के बाद दिल्ली के सड़कों पर भी और समुद्र के किनारे पर भी....जगह बदलती रही पर तुम्हारा शरारत करने का अंदाज नहीं बदला कभी...जब भी याद करता हूँ दिल में दर्द और होटों पर एक मुस्कान आ जाती है....गधी......आज जब तुम नहीं हो तो एक बार उस गीली सड़क को देखता हूँ और एक बार अपनी उँगलियों को...बाहर बारिश की बुँदे काले शीशे से लुढक कर निचे गिर रही हैं ......एक ठंडी साँस का लम्बा सा दौर और शून्य में निहारता मैं...
तेरे होने से ही मेरा होना है
तुझको खोना जैसे खुद को खोना है
तू जो है तो मैं हूँ, यूँ जो है तो मैं हूँ!!

Analysis on NGOs

राजशाही सरकारों और उनके लूटतंत्र के उस समय के दौरान मेरी मुलाकात एक बुद्धिजीवी से हुई. तब पहली बार अंदरखाने की कुछ ख़बरों का पता लगा और साथ ही जाना की कैसे कुछ NGO समाज-सेवा के नाम पर खुले तौर पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं और सरकारें सो रही हैं. उसी समय किसी Green Peace India का नाम भी सुना. सरकार इनके खिलाफ क्यों कार्यवाही नहीं करती ये भी पता चला. खैर, लिजलिजी और घोटालेबाज सरकारों के दौरान जब सब कुछ अंधकारमय नज़र आता था तब एक उम्मीद की किरण दिखाई दी. शक्तिमान की तरह गोल गोल घूमते हुए मोदी जी कमाल की एंट्री के साथ अवतरित हुए. जिन्होंने घोटालों और लालफीताशाही को ही अपना नसीब मान लिया था उनकी श्वाश नली में ऑक्सीजन का संचार हुआ. मैं भी उनमे से एक था. बस अटूट विश्वास से भरे हुए दीदे फाड़ फाड़ कर उस समय का इंतज़ार करने लगे जब हम भी “ये देश है वीर जवानो का” पर नाच नाच कर अलबेले और मस्ताने हो जायेंगे. महर्षि वाल्मीकि की तरह दीमक दिन-बे-दिन खा खा कर बालू का टीला किये जा रही थी तभी एक दिन सुना की सरकार ने कोई 10 हज़ार NGOs के FCRA लाइसेंस कैंसिल कर दिए हैं. फिर उसके बाद 3 हज़ार और फिर 2 हज़ार... मनीष सिसोदिया के कबीर समेत कुल लगभग 15 हज़ार.... कोई 2-5 हज़ार NGOs रातों रात अपनी दुकान का शटर गिरा कर फरार हो चुके हैं. ग्रीनपीस इंडिया के ट्रांसक्शन्स पर रोक लगा दी गई है. सरकार ने IB रिपोर्ट्स में पाया हैं की ग्रीन पीस इंडिया समेत बहोत से NGOs गलत तरीके से फंडिंग करवा रहे हैं एवं कुछ देशविरोधी कार्यों में भी शामिल है. रेत के मकान की तरह वेटिकन के अलबेले मस्ताने सपने भरभरा कर कतरा कतरा होने लगे हैं. हाथी का पांव कुत्ते की पुँछ पर पड़ चुका है. अब बिलबिलाहट के इसी सुर में सरकार विरोधी सुर मिलाने की तैयारी हो रही है. कुछ लालची लोग जो ऐसे NGOs को अपनी सूख चुकी छाती से चिपटा चिपटा कर दूध पिला रहे थे अब इनके समर्थन में भोली भाली जनता और पर्यावरण का मुखौटा लगा कर मुंह उठाने की फ़िराक में हैं. विरोध की आग से गरम हुए तंदूर में भेड़ की खाल में छिपे हुए भेड़िये अपने लिए रोटियाँ और बोटियाँ सेंक रहे हैं. कोई तानाशाह कह रहा है तो कोई जनता विरोधी सरकार कह रहा है. ईंटो से ईंटों के बजने की आती आवाजों के बीच अंधेरे साम्राज्य के दौरान देखे गए हमारे सपने आज पतंग हो गए हैं. इधर प्रधानमंत्री को मिल रही लगातार जान से मार देने की ख़बरों से उनके चाहने वाले चिंतित भी हैं. मन का एक कायर कोना डर की वजह से खींसे निपोर निपोर कर अंदर से लहूलुहान किये जा रहा है.....शह और मात का खेल और गोटियां बन कर बीच में झूलते हम.........

Demographic Dividend

1. एक अनुमान के तौर पर 2040 में जापान विश्व में सबसे अधिक बूढ़ों का देश और भारत सबसे अधिक नौजवानो का देश होगा..... माने यूँ की 2040 में जनसांख्यिकीय अनुपात के तौर पर भारत में विश्व के सबसे अधिक युवा होंगे. जनसंख्या के उस अनुपात को नियंत्रित करना किसी भी देश के लिए सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण और अत्यधिक महत्वपूर्ण टास्क होती है. (इसको और अच्छे से समझने के लिए गूगल पर Demographic dividend के बारे में पढ़ सकते हैं) अगर युवाओं को व्यस्त रखने के लिए कोई उपाय नहीं ढूंढा गया तो इस पीढ़ी के भटकने के डर रहता है. मसलन उस दौर में पहले नंबर पर यह जरुरी है की सभी के लिए समान रोजगार के अवसर उपलब्ध हों. कम से कम लोग बेरोजगार रहें......और भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में बेरोजगारी को किसी भी गलत दिशा में मोड़ना अधिक कठिन नहीं है........ उदाहरण के तौर पर ये जो सीरिया-मिश्र जैसे देश हैं वहां हर रोज गृहयुद्ध चलता है. लोगों गुट बना कर आपस में ही लड़ते हैं. जबकि उनके पास लड़ने का कोई कारण ही नहीं है .....बच्चे पैदा होते हैं, बड़े होते हैं और गुटों में शामिल हो जाते हैं लड़ने के लिए......क्यूंकि कोई काम नहीं है जिसमे युवा व्यस्त रह सके........जापान / चीन विकास की सीमा को इसलिए पार कर सका क्यूंकि उसने अपने लोगों को उसने व्यस्त रखा....इस तरह के संभावित खतरों को भांपते हुए ही आज से आने वाले 30-50-100 साल की पालिसी बनायीं जाती हैं. ये काम वही कर सकता है जिसके पास दूरदृष्टि और कुछ करने की इच्छाशक्ति हो......
2. नेताजी सुभाष बोष ने कहा था भारत के विकास को तेज गति और सही दिशा देने के लिए कम से कम 20 साल तक शाशन करने वाले तानाशाह की जरुरत है बशर्ते उसकी नीति और नियत सही हो....
अब अगर दोनों points को मिला दिया जाये तो मुझे लगता है हमने बहोत सही आदमी को चुना है.....सुना है 2014 में प्रधानमंत्री बनना है मोदी जी ने इसकी प्लानिंग 2006 में ही कर ली थी ...अब अच्छी दूरदृष्टि और इच्छाशक्ति का इस से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है ...... उम्मीद है ये जो पूंजीपतियों की सरकार है वो सही दिशा में बढ़ रही है.....बाकि तानाशाही का क्या है....कुछ लोगों के लिए अघोषित इमरजेंसी तो लगी हुई है ही देश में.....