Thursday, 26 February 2015

गंदी खिड़की और रेल बजट

एक शादीशुदा जोड़ा नये मकान मे रहने को आता है। पत्नी सुबह सो कर उठने के बाद जब बाहर का नज़ारा देखने को शीशे लगी खिड़की से पर्दा हटाती है तो क्या देखती है की सामने वाली पड़ोसन ने अपनी बालकॉनी मे कपड़े धो कर सुखाये हुए हैं। पत्नी अपने पति को बोलती है की जी देखो कितने गंदे कपड़े धोये हैं इसने। पति सुन कर मुस्कुराता है। फिर तो यह सिलसिला बन गया। पत्नी रोज़ सुबह उठ कर देखती तो पाति की गंदे तरीके से धोये हुए कपड़े आज भी उनके शीशे के सामने सुखाये हुए हैं। पत्नी रोज़ पति को औरत के बारे मे ताना मारती और पति रोज़ मुस्कुरा देता। एक दिन जब पत्नी फिर से पड़ोसन की हंसी उड़ाती है तो पति उठ कर कपड़े से खिड़की का शीशा साफ कर देता है। जब खिड़की अच्छी तरह से साफ हो जाती है तो पत्नी जी को बहोत ही साफ सुथरे और एकदम चमकदार कपड़े दिखाई देते हैं। वो समझ जाती है की कमी पड़ोसन के कपड़ों मे नहीं उनके शीशे मे थी। ये घिसी पीटी किन्तु काम की कहानी आज तब याद आई जब एक जोकर से दिखने वाले तथाकथित पत्रकार ने बोला की मोदी ने रेल का किराया इसलिये नहीं बढ़ने दिया क्यूंकि मोदी सरकार डर गयी है। महाशय हमे लगता है की आपको अपना शीशा साफ करने की जरूरत है। बजट पूर्ण रूप से साफ सुथरा एवं एकदम चमकदार है।

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