कसाई के पास छुरा है, नेताओं के पास जबान। अपने मतलब की बोटियां निकालने के लिये कसाई छुरा चलाता है, समाज को टुकडे टुकडे कर खास वोट बैंक को अलग निकालने के लिये प्रगतिशील नेता जुबान हिलाते हैं। सब नेताओं के अपने अपने लगे बंधे वोट बैंक हैं। एकता भाई-चारे के ढोल नगाडे बजाते हुए एक भाई को दूसरे भाई के विरुध चारे कि तरह इस्तेमाल करने की सोची समझी राजनीति ही दरसल सेक्युलर सियासत का सच है। वैसे तो तुष्टिकरण की राजनीति के लिये जनतंत्र मे कोई जगह नहीं होती लेकिन सेक्युलर ठप्पे के साथ नेत! मानो कुछ भी करने को अज़ाद होते हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है की प्रगतिशील होने का ढोंग रचते हुए समाज को बांटने का षडयन्त्र इस सेक्युलर बिरादरी के ही खेमे मे रचा जाता है। विडम्बना है की समाज मे द्वेष बढाने के इस खेल मे जो जितना गिरेगा, उसका दर्जा खास वोट बैंक के नज़रों मे उतना ही उठेगा। कुछ प्रगतिशील नेताओं के दिये गये हाल के बयान: इंडियन मुजाहिद्दीन कोई आतंकवादी संगठन नहीं है - खुर्शीद। पदमभूषण नीच और चोर लोगों को मिलता है किसी गरीब को नहीं - शरद यादव। मालवीय और वाजपेयी को भारत रत्न इसलिये मिला क्यूंकि दोनो ब्राहमण थे, हरिजन होते तो नहीं मिलता - मायावती। अपने बाप की औलाद है तो हैदराबाद आकर दिखा - ओवैसी। कसाब एक मासूम लड़का था - अय्यर। 15 मिनट के लिये पुलिस को हटा दो - ओवैसी। मै बनिया हूँ - केजरीवाल। रामजादे या हरामजादे - प्राची। ताजमहल को सातों दिन सिर्फ नमाज़ के लिये खोलना चाहिये - आज़म खान। वोट बैंक, वोट बैंक सिर्फ वोट बैंक ...... अंतविहीन एवं दिशाहीन भारतीय राजनीति का सच।
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