आज फिर मोदी-भाजपा की शान में. अच्छा ये बताइये, भाजपा पीडीपी सरकार से पहले कितने लोगों ने मसर्रत आलम का नाम सुना था. शायद ही किसी बुद्धिजीवी ने. जब वो बाहर निकला तो खूब हो हल्ला मचा. मिडिया वालों ने करण रुदाली कर कर के आमजन को बहरा बना दिया. हैरानी हुई ये सोच कर की कसाब तक को मासूम बच्चा बताने वाले लोग और मिडिया आखिर मसर्रत आलम की रिहाई पर चिंघाड़ कैसे मार रहे थे. आखिर एक झटके में इनका देश प्रेम जागा कैसे? दरअसल इन सबको उकसाया गया था. चिंघाड़ने के लिए. नहीं तो आपको क्या लगता है ये जो मसर्रत आज जेल में है अगर उसको उसी समय वापिस जेल में डाल दिया जाता तो अफजल गुरु की फांसी पर विधवा विलाप करने वाले इतनी आसानी से चुप बैठते? बकौल पटना वाले आनंद भाई, अपने मोहरे पिटवा कर बाज़ी जीतना इस बन्दे को बखूबी आता है. अटल बिहारी की तरह ये शख्स भी कभी तो फ्री होगा. तब जायेंगे इसके पास और बैठेंगे फुर्सत से शतरंज की बाज़ी सीखने के लिए.
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