किस्सा तब का है जब पंडित मदन मोहन मालवीय बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी बनाने के लिए लोगों से चंदा मांग रहे थे | शिक्षा का प्रसार भारत में उस समय काफ़ी कम हो गया था | उच्च शिक्षा के लिए तो जागरूकता भी नहीं थी और संसाधन तो भारत में थे ही नहीं | अंग्रेजों की गुलामी के ऐसे माहौल में शहर शहर गाँव गाँव घूम कर पंडित जी लोगों को जगाने लगे |
जैसा की जाहिर है उनके इस भागीरथी प्रयास का मज़ाक उड़ाने वालों की भी कोई कमी नहीं थी | ऐसे ही एक बार जब वो हैदराबाद पहुंचे तो निजाम साहब के पास भी इस कार्य में मदद मांगने चले गए | निज़ाम साहब जरा सनकी थे, किसी बात पर उन्हें पंडित जी पसंद नहीं थे | उन्होंने टरकाने के इरादे से पुछा की कितना चंदा आप मुझसे उम्मीद करते हैं ? पंडित जी ने संकोच वश कह दिया जो भी आप दे दें इस सत्कार्य के लिए वही बहुत है | पंडित जी ने सोचा होगा निज़ाम साहब अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से देंगे | निज़ाम साहब ने अपने जूते पंडित जी को थमा दिए | कुटिल मुस्कान के साथ कहा, इस काम के लिए ये रहा मेरा चंदा, स्वीकार करें ! पंडित जी ने जूते समेटे और बाहर आ गए, अपने साथियों को उन्होंने कहा कल चार मीनार पर इनकी नीलामी होगी और जो धन आएगा उसे हम इस्तेमाल करेंगे | उनके साथ के लोग फ़ौरन हैदराबाद के सारे बड़े घरानों में दौड़ गए और सबको ख़बर किया की निजाम साहब ने अपने जूतों की नीलामी से आने वाला पैसा यूनिवर्सिटी बनाने के लिए देंगे |
जंगल की आग की तरह खबर सारे शहर में फ़ैल गई | निज़ाम साहब की गरीबी की बातें होने लगी, शहर में चर्चा हुई की अगर निज़ाम साहब के पास धन कम है तो हमें ज्यादा से ज्यादा कीमत पर जूते ख़रीद कर अपने निज़ाम की इज्ज़त बचानी चाहिए | अब तो निज़ाम साहब का दांव उल्टा पड़ गया ! मरता क्या न करता ! आखिर अगले दिन निजाम साहब की माँ ने जुटे साढ़े चार लाख में ख़रीदे और वो धन यूनिवर्सिटी बनाने में गया | इस तरह कहावत शुरू हुई “मियाँ की जूती मियाँ के सर” !
अब पुराने ज़माने में तो शाहरुख़ को फिल्मों में कहना पड़ता था “My name is Khan and I am not a Terrorist.” और आज ये हाल है की किसी मुसलमान को बिना चार्ज शीट के जेल में रखने पर प्रधानमंत्री आक्रोशित हो रहे हैं ! सेक्युलर होने का ढोंग रचने वाली पार्टियों के पेट में उबाल आ गया है| पहले जब सोलह बार रिहा किया था तो नहीं याद आया था ? मियाँ की जूती मियाँ के सर पड़ गई तो दर्द हो रहा है ?
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