Wednesday, 29 November 2017

यात्रा वृतांत: जबलपुर


एक दिन दफ्तर में खाली बैठा हुआ था। सावन का महीना ऊपर से पवन का शोर था। हिसाब लगाया की इस बार सप्ताह अंत में तीन दिन की छुट्टी है। चल यार रोहित कहीं घूमने चलते हैं। अंदर खुशी की लहर सी दौड़ गयी। घूमने का नाम सुनते ही जो चीज सबसे पहले याद आती है वही इस बार भी आयी. और क्या याद आएगा, वही पैसों की कमी। पता नहीं ये कमी मेरे पास ही होती है या सबका ये हाल है। आजकल सोशल मिडिया का जमाना है, कई लोग सोशल मिडिया पर इतने प्रसिद्ध हैं की वो जहाँ घूमने जाते हैं उनमे से अधिकतर जगहों पर उनका कोई ना कोई प्रसंशक रूपी दोस्त मौजूद रहता है। जिस से इनके घूमने, रहने और खाने का खर्चा बच जाता है। सिर्फ आने जाने का भाड़ा लगा। हींग लगे ना फिटकरी रंग भी चौखा होय। पर अपनी ऐसी किस्मत कहाँ। ना कभी लिखना आया, ना कभी सेलिब्रिटी बने। सच कहूँ तो मुझे ऐसे सेलिब्रिटी टाइप लोगों से जलन होती है। बजट देखा। कहीं आस पास ही जाया जा सकता था, ट्रेन से। उत्तर भारत में जुलाई और अगस्त बारिश के महीनें होते हैं। खिड़की से बाहर देखा। बारिश की गोल बूँदें काँच पर से लुढ़कती हुई निचे गिर रही थी। सुना है ऐसा माहौल देख कर कुछ लोग रोमांटिक हो जाते हैं, मैं इमोशनल हो जाता हूँ। घूमने के लिए इमोशनल। बारिश में पहाड़ों में जाना नहीं है, साउथ और ईस्ट इंडिया जा नहीं सकता। गुजरात महाराष्ट्र 3 दिन में आना जाना घूमना हो नहीं सकता। तो अब? तो अब मध्य प्रदेश जायेंगे। मामा के राज्य में। नेट चालू करो पार्थ, अजब गजब MP में घूमने की जगह ढूंढो। बजट, आने जाने का समय, मौसम, ट्रेन में सीट आदि सब चीजों पर गौर किया। मंजिल को अच्छे से फिल्टर पर लगाया गया। जबलपुर। वीकेंड के लिए सही जगह है भाई यहीं चल। इरादा बदले उस से पहले ही घर फोन कर दिया
"ऑफिस में काम ज्यादा है इस बार नही आऊंगा।"
15 अगस्त को कौन सी कम्पनी खुलती है बेटा?
खुलती है, बस ओवरटाइम मिल जाता है।
चल ठीक है, कोई नही। 

कई बार बुरा भी लगता है, घर पर झूठ बोल कर जाना। पर कहते हैं की खुजली और कलंक प्रकृति की 2 ऐसी कालजयी रचनाएँ है की एक बार लग जाये तो मिटाना भारी हो जाता है। मुझे खुजली लगी घूमने की, फिर चाहे झूठ बोल कर ही जाना पड़े। दोस्तों को फोन किया, चलोगे घूमने जबलपुर? जवाब मुझे पहले से ही पता था। आपको भी अंदाजा तो हो ही गया होगा। 

13 अगस्त शाम 5 बज कर 45 मिनट, निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन, मध्य प्रदेश सम्पर्क क्रांति। ट्रेन सही समय पर छूटी। बारिश की बूँदें गालों पर लुढ़कते आँसुओं की तरह खिड़की के कांच पर गिर कर नीचे की तरफ भाग रही थी। मैं फिर से इमोशनल हो गया। बैग से हेडफोन निकाल कर कान में ठूँसा, गाना लगाया- बोलो इतने दिन क्या किया, तेरा नाम लिया हो तुझे याद किया, तुझे याद किया तेरा नाम लिया। खिड़की वाली सीट, बारिश और गाना ... क्या संयोग था। ज्यादातर खुशमिजाज लोगों का पसंदीदा कॉम्बिनेशन। जहाँ मौका मिले अपनी तारीफ कर लेनी चाहिए। अँधेरा घिर रहा था। शहर पीछे छूट रहे थे। 9 बजते बजते लोग सोने लगे। जबलपुर मैं आ रहा हूँ, सोचते सोचते सो गया। 

जबलपुर पहुंच कर स्टेशन से रिक्शा लिया और बोला किसी सस्ते से होटल में चलो. सस्ते होटलों को रिक्शे वालों से अच्छा भला कौन जानता है. कभी कभी तो लगता है की जैसे रिक्शा वाले होते ही सस्ते होटल में ले जाने के लिए. दिल्ली में मैंने अक्सर देखा है एक रिक्शा वाला आप जितने में कहोगे उतने बजट का कमरा दिखा देगा. स्टेशन के आस पास पानी जमा था. रिक्शे वाले ने बताया रात को अच्छी बारिश हुई है. अभी धूप नहीं निकली थी और मौसम इतना खुशनुमा था जैसे कह रहा हो 'Welcome To Jabalpur'. एक दो होटलों में पूछताछ करने के पश्चात एक होटल में 400 रु का कमरा मिल गया. जबलपुर की व्यवसायिकता को देखते हुए 400 रु ज्यादा नहीं थे. मुझे यहाँ सिर्फ आज की रात ही रुकना था. अगले दिन रात को फिर वापसी की ट्रेन थी. कमरे में गया और जाते ही नहा कर कपडे बदले. कल वाले कपडे थोड़े भीग गए थे. भर पेट नाश्ता किया और घूमने निकल पड़ा. बारिश तो नहीं हो रही थी पर बादल छाए हुए थे. रेनकोट और छाता मैं साथ लाया था. जबलपुर में घूमने के लिए काफी जगह हैं जिनके बारे में आने से पहले में काफी विस्तार से जानकारी लेकर आया था परन्तु एक दिक्कत वाली बात ये है की सारी जगह काफी दूर दूर हैं. और इनको आपस में जोड़ने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बारे में कोई विशेष जानकारी मुझे नहीं मिल सकी. तो ये निश्चय हो कर लिया की कोई ऑटो किराये पर बुक कर के घूम लेंगे. तभी होटल वाले का फ़ोन आया
भाईसाहब आपको कहाँ कहाँ घूमने जाना है?
अरे, ये तो आपको बताना चाहिए की आपके शहर में भीड़ के अलावा क्या है घूमने का.
हाँ हाँ यहाँ बहुत कुछ है. आप ऐसा करो वापिस होटल आ जाओ मैं सारा इंतज़ाम करवा देता हूँ.
ठीक है आता हूँ लेकिन मुझे सस्ता इंतज़ाम चाहिए.
ठीक है आ जाओ. फिर बात करते हैं.

अच्छा जी ऐसा भी होता है! होटल वाले को मेहमान की इतनी फिक्र! क्या बात है. अक्सर सस्ते होटल वाले को इतनी तमीज से बात करते हुए देखा नहीं. और सस्ते होटलों में रुक रुक कर मैं भी इनकी बदतमीज़ी का आदी हो गया हूँ. वापिस रिसेप्शन पर पहुँचा तो उसने एक कागज पर कोई 5 या 6 जगह दिखाई. देखो मैं आपको यहाँ यहाँ घूमने भेज रहा हूँ. हमारे जबलपुर की सारी जगह इसमें शामिल हैं. ये आपका ड्राइवर और बाहर आपकी टैक्सी है. इतना सुनने के बाद तुरंत शीशा देखने का मन हुआ. कभी कभी स्मार्टनेस की वजह से मैं अमीर दिखने लगता हूँ. मौका मिलते ही तारीफ कर लेनी चाहिए. मैंने मुस्कान छुपाते हुए पूछा और पैसे? 800 रु. मैं खुश था. क्यूंकि मैंने नेट पर देखा था ऑटो वाले 1000 रु तक ले लेते हैं. और मैं इतने रु तक देने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी था. फिर भी बनावटी गंभीरता दिखते हुए कहा अरे इतने ज्यादा, क्या आप नहीं चाहते की मैं जबलपुर घूमूं. मेरा एक दोस्त यहाँ का है, मैंने पता किया तो उसने तो बताया था की 500 रु तक टैक्सी मिल जाती है. नहीं सर वैसे तो ऐसा नहीं है पर चलो आप 600 दे देना. कहीं ज्यादा भाव ताव के चककर में टैक्सी वाला भाग ना जाये ये सोचते ही मैंने तुरंत हाँ कर दी. लो जी चलो घूमने.
जबलपुर नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ एक प्राचीन शहर है. इसे मध्यप्रदेश की संस्कार राजधानी भी कहा जाता है। थलसेना की छावनी के अलावा यहाँ भारतीय आयुध निर्माण के कारखाने तथा पश्चिम-मध्य रेलवे का मुख्यालय भी है। ये शहर गौंड शासकों, मराठाओं तथा अंग्रेजों के अधीन रह चुका है. पुराने समय के शासकों द्वारा बनवाये गए कुछ महल एवं ताल तालाब इत्यादि अभी भी यहाँ बचे हुए हैं. नेट पर जबलपुर के बारे में जो जानकारी पढ़ने को मिली उनमे से एक पहरा यहाँ ज्यों का त्यों रख रहा हूँ – “जबलपुर का इतिहास उतना ही पुराना है जितना की काशी, पाटलिपुत्र, मगध आदि नगरों का है. पौराणिक आधार पर देखें तो भृगु ऋषि की तपोस्थली भेड़ाघाट और प्रकृतिवादी जाबालि ऋषि का नाम जबलपुर से जुड़ा है. जबलपुर नगरी कभी गढ़ा गोंडवाना, तो कभी त्रिपुरी के नाम से विख्यात रही. यहाँ कई राजा हुए जिन्होंने हिमालय से लेकर सागर के तट तक समस्त राज सत्ताओं को त्रिपुरी के अधीन कर दिया था.”

टैक्सी वाले का नाम अनिल था. अनिल जी वैसे तो काफी बातूनी थे पर जब उनसे शहर के बारे में कुछ जानने की कोशिश की तो उनको ज्यादा जानकारी नहीं थी. खास कर ऐतिहासिक विषयों की. वैसे मुझे लगता है की पर्यटन स्थलों पर टैक्सी, ऑटो, बस परिचालकों आदि को अपने शहर के सभी स्थलों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां तो होनी ही चाहिए. पर्यटक को काफी मदद हो जाती है ऐसे में. खोजी पत्रकार तो कहीं न कहीं से जानकारी निकाल लेते हैं पर मेरे जैसे आम पर्यटक के लिए काफी सारे विषय जानकारी के अभाव में अछूते रह जाते हैं. और जरुरी नहीं की नेट पर उपलब्ध जानकारी हमेशा शत प्रतिशत सही ही हो.   

थोड़ी देर चलने के बाद एक शांत सी जगह पर गाड़ी रुकी तो अनिल जी ने बताया की ‘Balancing Rock’ आ गयी है. गाड़ी यहीं पार्क करनी पड़ेगी. आप घूम कर आ जाओ, मैं यहीं इंतजार करता हूँ.

गाड़ी से उतर कर थोड़ा आगे चला तो क्या देखता हूँ एक बड़ी सी चट्टान एकदम लुढ़कने वाले अंदाज में एक दूसरी बड़ी चट्टान पर बिल्कुल सूईं की नोक जितनी जगह पर टिकी हुई है. ये नजारा वाकई विस्मित कर देने वाला था. यदि आपके पास इंटरनेट की उपलब्धता है तो ‘Balancing Rock’ की गूगल इमेज तुरंत देख डालिये. इस शहर में आगे कुछ देखने को मिले ना मिले पर सिर्फ इस एक चट्टान ने मेरे पैसे वसूल कर दिए. मदन महल की पहाड़ियों पर स्थित ये चट्टान देशी विदेशियों के आकर्षण का खास केंद्र है. कहते हैं कोई पंद्रह बीस साल पहले आये 6.9 की तीव्रता वाले भूकंप का भी इस चट्टान पर कोई प्रभाव नहीं हुआ था. यहाँ आगे ही मां शारदा देवी का प्राचीन मंदिर है और यहाँ के लोग मानते हैं की माता की कृपा से ही ये चमत्कार संभव हो सका है. हम भारतीय हमारे साथ थोड़ा भी अच्छा होते ही उसको चमत्कार का नाम देकर तुरंत भगवान के साथ जोड़ देते हैं. चलो वैसे भी हमें शुक्रगुजार तो होना ही चाहिए चाहे किसी बहाने से ही सही. ये चट्टान कब से अपने इस रूप में इसकी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी. कुछ देर वहाँ रुका. फोटो खींचे और फिर आगे माता शारदा के मंदिर की तरफ चल दिया.

माँ शारदा देवी का मंदिर वहाँ से कुछ ही कदम की दुरी पर है. मंदिर जाते हुए ही दाहिने हाथ की तरफ से सीढियाँ ऊपर की तरफ जा रही हैं. सीढ़ियों के पास एक बोर्ड लगा हुआ है जिसमे लिखा है रानी दुर्गावती का किला. पर मैं पहले मंदिर हो आता हूँ. मंदिर मेरे लिए कभी घूमने के स्थान ना होकर सिर्फ आस्था के  केंद्र होते हैं. इसलिए मैं सोचता हूँ की ट्रेवल एजेंट अपने ट्रेवल लिस्ट में मंदिरों के नाम ना शामिल करें तो ज्यादा अच्छा होगा. जिस पर्यटक को मंदिर जाना है वो पहले ही अपना प्लान कर के आएगा और खुद ही बोल देगा की मुझे फलां फलां मंदिर जाना है.

मंदिर से आने के बाद सीढियाँ चढ़ते हुए रानी दुर्गावती के किले की तरफ गया. इस किले को कुछ जगहों पर मदन महल के नाम से भी लिखा गया है. राजा मदन सिंह द्वारा बनवाया गया यह किला मुख्य शहर से करीब दो किमी दूर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यह किला राजा की मां रानी दुर्गावती से जुड़ा हुआ है, जो कि एक बहादुर गोंड रानी के रूप में जानी जाती है। किले का थोड़ा बहुत रख रखाव किया गया है हालाँकि अधिकतर हिस्सा फिलहाल खंडहर में तब्दील हो चुका है. यह किला रानी दुर्गावती और उनकी पूरी तरह से सुसज्जित प्रशासन व सेना के बारे में काफी कुछ बयान करता है। शाही परिवार का मुख्य कक्ष, युद्ध कक्ष, छोटा सा जलाशय और अस्तबल को देखकर आप इसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सकेंगे। इस किले से प्रचीन काल के लोगों के रहन-सहन का भी पता चलता है। साथ ही इससे उस समय के रॉयल्टी का भी अंदाजा हो जाता है। जबलपुर जाने पर इस जगह को अवश्य घूमना चाहिए। यह किला उन शासकों के अस्तित्व का साक्षी है, जिन्होंने यहां 11वीं शताब्दी में काफी समय के लिए शासन किया था।
जब मैं यहाँ पहुंचा तो सिर्फ एक परिवार यहाँ पर्यटक के रूप में मौजूद था. उनके अलावा यहाँ कुछ स्थानीय लड़के लड़कियाँ स्कूल की यूनिफार्म और बैग समेत घूम रहे थे. शायद स्कूल बंक कर के आये हों. बच्चे खण्डरों में पढ़ने के लिए तो आये नहीं होंगे, फिर क्या करने आये होंगे. इस से पहले की जबलपुर का ये ऐतिहासिक पर्यटक स्थल दिल्ली के कुछ पर्यटक स्थलों की तरह सिर्फ खास किस्म के कार्यों के लिए बदनाम हो प्रशासन को यहाँ ध्यान देना चाहिए. कहने के लिए तो एक चौकीदार भी था वहाँ पर वो अपने सरकारी कर्मचारी होने का धर्म बिना अपवाद के निभा रहा था. ड्यूटी समय पर कुर्सी पर बैठ कर सोने का धर्म. यदि कोई सरकारी कर्मचारी मेरे इस लिखे हुए को पढ़ रहा है तो कृपया बुरा ना मानें ये मेरी आपसे ईर्ष्या है जो मुझसे ये सब जबरदस्ती लिखवा रही है. वरना तो आप कितने कर्म प्रधान होते हैं ये मुझसे बेहतर कोई नहीं जान सकता. मौका मिलने पर तारीफ कर भी देनी चाहिए. 

किला घूमने के बाद मैं वापिस टैक्सी में आ गया जहाँ अनिल भाई इंतज़ार कर रहे थे. मुझे यहाँ 2 घंटे का समय लगा. अनिल जी कहने लगे की अकेला बंदा अमूमन यहाँ इतनी देर तक नहीं घूमता और जल्दी ही बोर होकर निचे आ जाता है, जिस से हम लोगों का समय बच जाता है. पर लगता है आप घूमने के कुछ ज्यादा ही शौकीन हैं. मैंने इसे तारीफ के तौर पर लिया और अनिल जी को धन्यवाद कहा. अब अगर देखा जाये तो 6 में 3 जगह मैं देख चुका हूँ और 3 बाकि हैं.

अब हम भेड़ाघाट की तरफ बढ़ रहे थे. भेड़ाघाट जबलपुर से करीब 20 किमी की दुरी पर है. यहाँ तक पहुंचने के लिए कोई खास मशक्क्त नहीं करनी पड़ी और जल्दी ही अनिल जी ने अपनी गाड़ी पार्किंग में जा लगायी. हम नदी एवं मार्बल रॉक्स यानी संगमरमर की चट्टानें देखने पहुंचे थे. उन्होंने रास्ता बताया और मैं उधर को चल दिया. नर्मदा की खूबसूरती के बारे में आज यानी 26 नवंबर 2017 के वेब दुनिया नामक हिंदी पेज पर छपा है 'लगातार जोर मारती लहरों से चट्टानों का सीना चीरकर हजारों वर्ष के कठोर संघर्ष के बाद नर्मदा ने यह सौंदर्य पाया है जिसे निहारने देश ही नहीं, विदेशी पर्यावरण प्रेमी भी खिंचे चले आते हैं। संगमरमरी चट्टानों के बीच बिखरा नर्मदा का अनूठा सौंदर्य देखते न तो मन अघाता है और न आँखें ही थकती हैं। भेड़ाघाट, तिलवाराघाट के आस-पास के क्षेत्र का इतिहास 150 से 180 करोड़ वर्ष पहले प्रारंभ होता है। कुछ वैज्ञानिक इसे 180 से 250 करोड़ वर्ष पुरानी भी मानते हैं।' मार्बल रॉक्स नर्मदा नहीं के दोनों तरफ की किनारों पर स्थित है और आश्चर्यजनक रूप से ये 100 फीट से भी ऊँचीं है. नर्मदा की ये संगमरमरी चट्टानें सौंदर्य से परिपूर्ण हैं. यह एक अत्यंत रमणीय पर्यटन स्थल है. चाँद की रोशनी में भेड़ाघाट की मार्बल चट्टानों की सैर का एक अलग ही तरह का अनुभव रहता है। चूँकि बारिश का मौसम था तो माँ नर्मदा अपने पुरे वेग पर थी पानी का स्तर बहुत ज्यादा था. मैं वहीँ संगमरमर की चट्टानों पर बैठ कर नदी को निहारने लगा. 'बहता पानी और डूबता सूरज अक्सर मुझे कुछ लिखने को प्रेरित करते हैं.' ये लाइन मेरे दिमाग में आयी और तुरंत मैंने वहीं बैठे बैठे इसको मोबाइल में लिख कर सेव कर लिया. बीच में कुछ देर के लिए हल्की बुँदे गिरी तो मैंने छाता तान लिया था. अभी कुछ दिन पहले ही यहाँ ऋतिक रोशन की मोहनजोदारो फिल्म की शूटिंग हुई है. बेशक ये जगह है ही फिल्माने लायक. अति सुन्दर.

भेड़ाघाट के पास ही नर्मदा का पानी काफी ऊंचाई से झरने के रूप में गिरता है. इसी झरने को धुआँधार फाल कहते हैं. जबलपुर के पर्यटन स्थलों की सूची में एक नाम इसका भी है. जब पानी एक धारा के रूप में ऊपर से नीचे नदी में गिरता है तो दूर से देखने पर नदी में से धुआं सा उठता दिखाई देता है और धार मतलब पानी की धारा. इसीलिए इसको धुआँधार फाल का नाम दे दिया गया है. मेरे भम्रण के दौरान बारिश अपने चरम पर थी तो नर्मदा में खूब पानी था. इस वजह से मैं फाल नहीं देख सका क्यूंकि नदी का जलस्तर इतना बढ़ा हुआ था की इसने झरने को पूरी तरह ख़त्म कर दिया था. अन्यथा ये भी एक आकर्षक दर्शनीय स्थल होता.

करीब 2 घंटे बिताने के बाद अगला पड़ाव चौंसठ योगिनी मंदिर होगा. भेड़ाघाट के पास ही यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ तक जाने के लिए 150 से अधिक सीढियाँ चढ़ कर जाना पड़ता है. यह बहुत ही भव्य मंदिर है। यहाँ 64 योगिनी अर्थात् देवियों की प्रतिमा है। दसवीं शताब्दी में स्थापित हुए दुर्गा के इस मंदिर से नर्मदा दिखाई देती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह प्राचीन मंदिर एक भूमिगत रास्ते के द्वारा रानी दुर्गावती के किले से जुड़ा हुआ है. इस मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में कलचूरी साम्राज्य के दौरान हुआ. बाद में अपनी प्रवृति के अनुरूप ही मुगल आक्रमणकारियों ने मंदिर को काफी नुकसान पहुँचाया और मूर्तियों को तोडा दिया गया. विखंडित मूर्तियां मुगल मानसिकता के प्रमाण के रूप में ज्यों की त्यों अभी भी विराजमान हैं. यकीनन ये जगह जबलपुर घूमने आने के दौरान जरूर देखने वाली जगह में शामिल है. अगर इसको आप मंदिर की श्रेणी में डालना चाहते हैं तो मैं अपनी पहले वाली लाइन वापिस लेता हूँ जिसमे लिखा था की मंदिर पर्यटक स्थलों की सूची से बाहर होने चाहिए.
मन में खुशी और उदासी वाले मिश्रित भाव लिए मैं बाहर लगी बेंच पर आकर बैठ गया और नर्मदा की तरफ देखने लगा. इस जगह को कैसे लिख कर परिभाषित किया जाये ये ही विचार कर रहा था की एक परिवार वहाँ टहलते हुए आ गया. ग्रुप का सज्जन बेंच पर आकर बैठा तो जैसे पुरे दिन से चुप पड़ी मेरी बातूनी जुबान को बोलने का मौका मिल गया. मैं उस बन्दे से ऐसे बातें करने लगा जैसे मेरे घनिष्ट मित्र हो. बन्दे ने भी पूरे उत्साह से बात की. परिवार रोहतक से आया था और मैं रेवाड़ी से. दो हरियाणवी सुदूर प्रदेश में जब मिल बैठे तो बातों का लंबा सिलसिला चल निकला. उन्होंने बताया की वो हर साल कम से कम चार या पांच जगहों पर घूमने जाते हैं और ये उनका जूनून है. वाह, आपसे मिल कर मजा आया. फिर तो हमने दुनिया भर की जगहों के बारे में अपने अनुभव सांझे किये. हम दोनों ही लगभग समान जगहों पर घूमे हुए थे. चर्चा रोचक हो चली तो उनकी श्रीमती ने भी चर्चा में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. मुझे ये जान कर बड़ा ही सुखद आश्चर्य हुआ की उनके दोनों बच्चे भी घुमक्कड़ी की बातों में रुचि दिखा रहे थे और छुपा दिए गए इतिहास से कुछ हद तक वाकिफ थे. मैंने इस तरफ इशारा किया तो विकाश जी ने कहा की 'रोहित भाई मैं तो बोलता हूँ अपने बच्चों को यहाँ ऐसी जगहों पर अवश्य लाना चाहिए. देखने दो उनको की इतिहास में क्या घटित हुआ और उसको हमसे कैसे छुपाया गया. बेशक इस मंदिर में आने के बाद इतिहास को प्रतयक्ष रूप से महसूस किया जा सकता है.’ अब मेरी हैरान होने की बारे थी. विकाश जी कैसे बिना किसी लाग लपेट के अपनी बातें बड़ी आसानी से कह रहे थे जबकि हम में से कई इस तरह की चर्चा से अक्सर बचते रहते हैं. विकाश जी के साथ घंटे भर बतियाने के बाद मैं वापिस आ गया जहाँ अनिल भाई मेरी राह देख रहे थे. शाम होने लगी थी. पता नहीं  देखने के लिए कोई और जगह बची थी या नहीं पर मेरा मन अब और कहीं जाने का नहीं था. अनिल भाई को कहा चलो अब वापिस चलते हैं. और कहीं नहीं जाना. जवाब मिला 'ठीक है चलो. रास्ते में एक शिव मूर्ति मंदिर है जिसको आपको देखना चाहिए. वहाँ कुछ देर के लिए रुकते हुए चलेंगे.' यार शिव मूर्ति तो दिल्ली में भी है, मुझे नहीं जाना चलो बस.' इस से पहले की मैं कुछ भूल जाऊँ, वापिस होटल पहुँच कर अपना आज का अनुभव लिखना चाहता था. 

मना करने के बाद भी अनिल जी ने जबलपुर के विजयनगर पहुंचने के बाद गाड़ी प्रशिद्ध शिव मूर्ति मंदिर की तरफ घुमा दी. होटल मालिक के बाद ये दूसरा बंदा था जो अपने शहर के मेहमान की इतनी देख रेख कर रहा था. 'भैया, आप जाओ प्रभु के दर्शन कर आओ मैं यहीं मिलूंगा.' ठीक है जल्दी ही आता हूँ. अंदर प्रवेश किया तो भगवान शिव की आसन्न मुद्रा में बैठे हुए की एक मूर्ति बनी हुई थी. मूर्ति ज्यादा पुरानी नहीं है और साल 2006 में ही इसे आम जनता के लिए खोला गया है. मूर्ति की ऊंचाई 76 फीट है. अगर आप इसे मंदिर की श्रेणी में रखना चाहते हैं तो मैं फिर से अपने सबसे पहले वाले विचार के समर्थन में आना चाहूंगा. 'मंदिरों को पर्यटन स्थलों की सूची से बाहर ही रखना चाहिए.' शिवजी को प्रणाम किया और अपने विचार के लिए माफी मांगी. वापिस आने पर अनिल जी को घूर कर देखा और कहा 'बहुत अच्छी जगह थी भाई. अच्छा किया जो इधर ले आये. पर अब और कहीं नहीं ले जाना बस.' अनिल जी इतना खुश हुए जैसे कोई मुराद पूरी हो गयी हो, उनको लगा मैं वाकई बहुत खुश हूँ. चलो अच्छा है.

अगले दिन देर तक सोया. कोई प्लान नहीं था. पास में ही एक शॉपिंग माल था. तब पता नहीं था लिखूंगा इसलिए नाम याद नहीं रखा. टहलते टहलते वहाँ चला गया. वहाँ से जबलपुर के ऊपर लिखी हुई एक किताब खरीदी. जो बाद में ये लेख को लिखने में काफी सहायक सिद्ध हुई. थिएटर में ऋतिक की मोहनजोदारो लगी हुई थी. ट्रेन रात को है तब तक क्या करूंगा सोच कर मैंने मूवी की टिकट ले ली. सबसे पहला सीन वहीँ का आया जहाँ मैं कल गया था भेड़ाघाट. अच्छा लगा देख कर. बाहर निकला तो जोरदार बारिश हो रही थी. रेनकोट पहना और छाता भी तान लिया. होटल से बैग उठाया और सीधे स्टेशन जा पहुँचा. शाम को ट्रेन समय से चली. संयोग ही था की वापसी में भी वही खिड़की वाली सीट, बारिश की बूंदें और गाना. याद रखने वाले अनुभव के साथ अलविदा जबलपुर.







यात्रा वृतांत: भरतपुर

 
पिछले महीने ही नयी बाइक ली। बुलेट 350 cc। शौकीन लोग जानते हैं की ये क्या चीज है और लेने की खुशी कितनी होती है। अमूमन हर बाइकर का सपना होता है बुलेट लेने का। ऐसा ही एक सपना मेरा भी था। सपना तो पूरा हो गया पर अब बड़ा सवाल ये था की इसको लेकर घूमने कहाँ जाएँ। ये भी समस्या है। आप पहले एक सपना देखो फिर उसको पूरा करने के लिए और सपने देखो फिर दूसरे सपने से पहला सपना पूरा करो। मतलब बुलेट लेना सपनों की जलेबी बनाना। ऐसे ही कुछ महीने पहले एक अच्छा सा कैमरा भी ले लिया था। बाइक होगी तो घूमने जायेंगे और घूमने जायेंगे तो फोटो भी खीचेंगे। बाइक से मथुरा हो आया था मैं कुछ दिन पहले ही। लेह जाना है पर वो तो जून में जाना है अभी तो जनवरी है। ऐसी जगह ढूंढी जाये जहाँ बाइक और कैमरा दोनों का फुल उपयोग हो। नेट खंगाला गया तो कई जगह निकली पर आखिर में जाना फाइनल हुआ भरतपुर बर्ड सेंचुरी जिसका नाम है "केवलादेव पक्षी उद्यान।"
सारी जानकारी निकाली गयी - दूरी, खर्चा, छुट्टी आदि आदि। सब चीजों का तालमेल बिठाया और 25 जनवरी 2017 की सुबह 4.30 बजे फरीदाबाद से किक लगा दी।
 
मंजिल यहाँ से 140 km दूर है। भरतपुर के बारे में जब सर्च किया तो पता लगा की दिसम्बर-जनवरी सबसे उत्तम समय होता है घूमने का। इस दौरान यहाँ देश विदेश से हजारों की तादाद में अलग अलग प्रजाति के पक्षी आते हैं। एक ब्लॉग पर तो ये भी लिखा था की सबसे बढ़िया समय जनवरी के प्रथम सप्ताह तक ही है। पर ये तो आखिरी सप्ताह चल रहा है। कहीं पक्षी कम तो नहीं हो गए होंगे? कहीं मैं इतनी दूर जाऊँ और कुछ खास देखने को मिले ही ना। चलो इस बहाने बाइक की सैर तो हो ही जायेगी। अपने आप से ये सब बातें करता हुआ मैं NH 19 पर धीरे धीरे रेंग रहा था। कड़ाके की ठण्ड और जबरदस्त धुंध थी। कोहरे में देखने की समस्या से बचने के लिए एक ट्रक के पीछे पीछे चल रहा था। सर्दी ज्यादा थी पर मैं उसी हिसाब से इंतजाम कर के चला था। हम उत्तर भारतीयों को इतनी सर्दी सहने की तो आदत भी है। बाइक अपनी गति से बढ़ती रही। मुझे पहुंचने की कोई जल्दी नहीं थी। रास्ते में 2 जगह रुक कर चाय पी और भट्टी पर हाथ सेंके।
 
सुबह 8 बजे मथुरा के नजदीक पहुँचा। भूख लगने लगी। वहीँ पुल के नीचे एक रेहड़ी पर कचोरी और आलू झोल की सब्जी खायी। बेहतरीन नाश्ता था। सब्जी इतनी स्वादिष्ट थी की कई बार कटोरी में डलवाई। खिलाने वाले ने उलहना दिया भाई साहब 20 रु में सब इतनी सब्जी खाने लगे तो हम जल्दी ही कंगाल हो जायेंगे, बस अब आपको और सब्जी नहीं मिलेगी। कुछ देर बाद ही मैंने खाली कटोरी आगे बढ़ाते हुए कहा अरे ग्राहक को ऐसे मना करते हैं क्या। आप जी भर के खिलाओ, आपको पूरी प्लेट के पैसे दूँगा आपको घाटा थोड़े ही ना करवाएंगे। अतिरिक्त पैसे की बात सुनकर रेहड़ी वाले ने चौड़ी सी स्माइल देकर तुरंत कटोरी भर दी। खा पी कर आगे बढ़ा। रास्ता पूछते पूछते 10.30 बजे तक वहाँ पहुँच गया जहाँ रुकना था। सेंचुरी टूरिस्ट लॉज। ठहरने के ठिकाने का पहले ही बंदोबस्त कर लिया था। इस लॉज की खासियत का अंत में उल्लेख करूँगा अन्यथा मुख्य मुद्दे से भटकने का डर है। पहले ही बाइक और आलू झोल को काफी स्पेस दे दिया गया है। 
 
रूम में कुछ देर आगे की योजना बनी तब तक चाय पकौड़े आ गए। स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ लिया और 11.30 बजे तक रूम छोड़ दिया। केवलादेव प्राणी उद्यान यहाँ से पैदल दुरी पर ही है। यही कोई 300 मीटर।
 
अंदर घूमने के तीन तरीके हैं:
पैदल - जो की काफी ज्यादा हो जायेगा। नहीं ये सही नहीं।
सायकिल रिक्शा - थोडा महंगा लग रहा है। एक घंटे के 200रु। कम से कम 4 घंटे भी जोड़ें तो 800रु। एकदम से नहीं। इस तरह के खर्चीले विक्लप तो मैं अक्सर पूरा सोचने से पहले ही मना कर दिया करता हूँ। 
साइकिल - 50 रु 4 घंटे के लिए। वाह, ये सबसे अच्छा है। तुरंत एक साईकिल ली और चल दिया। 
 
हालाँकि रिक्शा का 'एकमात्र फायदा' जो होता वो ये की यहाँ के रिक्शा चालक समय के साथ साथ काफी अनुभवी हो गए हैं और एक बेहतरीन गाइड का काम फ्री में कर सकते हैं। इनको लगभग हर प्रजाति के पक्षी के बारे में विस्तार से जानकारी है। साथ ही अच्छी फोटो खींचने के लिए कुछ अच्छे स्पॉट भी इन लोगों की नजर में है। अगर आप यहाँ आये हुए पक्षियों की प्रजाति इत्यादि के बारे में जानने और फोटोग्राफी में दिलचस्पी रखते हैं तो आप इसको 'एकमात्र फायदा' नहीं कह सकते। 
 
मैं अपनी साईकिल से चल चुका था। साईकिल साथ थी पर शुरू में पैदल ही चल रहा था। उद्यान देखने का उत्साह और एनर्जी अभी दोनों बराबर थे। चलते ही एक बैरियर पर टिकट चेक हुई। बस कुछ आगे जाते ही बेहतरीन जंगली वातावरण शुरू हो गया। सर्दी के दिन थे और अभी तक काफी धुंध थी। जंगल बहुत गहरा तो नहीं है पर बड़ा है। सबसे पहले दर्शन हुए भारत के राष्ट्रिय पक्षी मोर के। एक सूखे हुए पेड़ के सबसे ऊँचे वाले ठूँठ पर बैठ हुआ। लंबी रंगीन पंखे फैलाई हुई। सुराही जैसी लंबी गर्दन इधर उधर घुमाता हुआ मानो आस पास के नजारे आँखों में उतार रहा हो। उसके ठीक पीछे बिल्कुल हल्का सूर्य दिखाई दे रहा था। किसी भी प्रोफेशनल फोटोग्राफर के लिए एकदम उपयुक्त नजारा था। मैंने भी कुछ फोटो ली किंतु धुंध का प्रभाव और कैमरे का कम ज्ञान होने की वजह से उतनी आकर्षक नहीं आई। आगे एक जगह दीमक का टीला नाम का स्थान आया जहाँ विभाग की तरफ से एक सूचना बोर्ड भी लगाया हुआ था। पास में ही एक पेड़ के चारों तरफ बड़ा सा मिट्टी का ढ़ेर लगा हुआ जिसमे बड़े बड़े चुँहे के बिल जैसे होल थे। इसको ही दीमक का टीला कहा गया है। मिट्टी की ये हालत चूहों ने नहीं दीमक ने की है। आश्चर्य। छुट्टी का दिन होने की वजह से लोगों की उपस्थिति ठीक ठाक थी। पर सैलानियों में आधे से अधिक विदेशी सैलानी थे अपने बड़े बड़े कैमरों के साथ। कुछ के पास तो एक हाथ से भी बड़े कैमरे थे। अधिकतर ने अपने कैमरा टाइप का सामान ढोने के लिए रिक्शा लिया हुआ था।
और हाँ याद आया, शुरू में ही एक बात उल्लेख करना भूल गया हूँ। प्राणी उद्यान में आने से पहले एक अच्छी क्वालिटी की दूरबीन साथ लेना ना भूलें। थोड़ा ढूंढने के बाद दूरबीन उद्यान के बाहर से किराए पर मिल जाती है। कुछ रिक्शा चालक भी अपने साथ दूरबीन रखते हैं, ये उनका मार्केटिंग का तरीका भी है। पर जरुरी नहीं की वो फ्री में आपको इसका उपयोग करने दें। 100 से 150 रु तक की फीस वसूली जा सकती है। मुझे मेरे होटल से ही एक अच्छी दूरबीन फ्री में मिल गयी थी। अगर आप बाहर से आ रहे हैं तो होटल बुक करने से पहले ही दूरबीन की उपलब्ध्ता और फीस तय कर लें। मेरे हिसाब से अगर आप कमरा बुक कर रहे हैं तो दूरबीन साथ अवश्य मिलनी चाहिए। वापिस लौटते हैं। विदेशी लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं इसके विपरीत अपने अधिकतर लोग बस टहल रहे हैं। कैसी विडम्बना है ऐसी जगहों पर एक तो हम लोग घूमने जाते ही नहीं और जाते भी हैं तो बस यहाँ वहाँ टहल कर आ जाते हैं। हजारों लाखों किलोमीटर का सफर तय कर के सुदूर यूरोप समेत पूरी दुनिया से ये अदभुत प्राणी यहाँ आते हैं और यहाँ इनको देखने भी इनके ही लोग आते हैं ... सुदूर यूरोप समेत पूरी दुनिया से।
एक हरे रंग का कबुतर दिखा। बेर के पेड़ पर बैठा आराम से बेर खा रहा था। वाह, पहली बार देखा है ये तो। इस बार फोटो अच्छी आई। कुछ कदम आगे चलता तो कुछ न कुछ नया दिखता ही रहा। कोई गाइड नहीं था तो बहोत से पक्षियों के नाम मालूम नहीं हो सके। जाने से पहले कुछ पहचान नेट पर की थी उस से काफी मदद मिली। कुछ के नाम वापिस आने के बाद सर्च किये। घूमने के लिए एक सीधी पक्की सड़क बनी हुई है। बिच बिच में दायें बायें को अलग सड़क भी निकलती है। वैसे तो किसी भी जानवर, पक्षी के लिए कोई पिंजरा नहीं बना है पर थोड़ी थोड़ी दुरी पर विभाग की तरफ से सूचना बोर्ड लगाये गएँ हैं। मसलन इस एरिया में फलां पक्षी दिखाई देने की सम्भावना है टाइप। लोमड़ी दिखी तो मेरी मनोभावना ऐसी थी जैसे 'अरे ये तो अपना ही जानवर है।' चलो कोई तो जान पहचान वाला मिला। लोमड़ी ने खोया आत्मविश्वास जगा दिया। वरना तो इतने अनजान पक्षियों के बिच में मैं उनको देशी और खुद को विदेशी समझने लगा था। आगे हिरण और एक बैल भी अपनेपन का अहसास करवाते रहे।
कुछ भारतीय परिवार भी आये हुए थे। समझ तो आप गए ही होंगे की मैं अब क्या बताना चाह रहा हूँ। बच्चे पक्षियों को पत्थर मारने में व्यस्त थे। Are You Serious!? यहाँ भी? और माता पिता खींसे निपोर रहे थे। सड़क के अंत में एक छोटा सा पार्क मिला जहाँ अपने भारतीय परिवार चिप्स और कोल्ड ड्रिंक ठूंस रहे थे। बच्चे चिप्स पक्षियों को खिलाकर उनकी सेवा कर रहे थे। वहीँ एक बोर्ड लगा है जहाँ पर उद्यान के बारे में काफी महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी है।
खूब घूमने और ढेरों फोटो खींचने के बाद शाम 4.30 बजे तक मैं फ्री हो गया। चाहता तो आज ही वापिस लौट सकता था पर ये जगह इतनी पसंद आई की मैंने अगले दिन फिर आने का निर्णय लिया। अगले दिन नहा धो कर फिर से आया और करीब 4 घंटे उद्यान में बिताये। इस उद्यान की सुंदरता ने ऐसा मन मोह लिया की शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। सर्दियों के समय में विभिन्न तरह के पक्षियों की चहचाहट, जादुई सूर्य उदय, पक्षियों की बड़ी बड़ी कॉलोनियां, सूर्य अस्त का सम्मोहन, ये सब इस जगह का जादू आपके मन में पैदा कर देते हैं. यहाँ कोई भीड़ नहीं, गाड़ियों का शोर नहीं, प्रदूषण नहीं, चारों तरफ बस प्रकृति ही प्रकृति. एक आम इंसान को और क्या चाहिए. आप ये पढ़ रहे हैं मतलब आप घूमने के शौकीन है। तो यहाँ मै आपसे बस इतना ही कहना चाहूँगा की यदि आपने अभी तक भरतपुर नहीं देखा तो एक बार अवश्य जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में: "भरतपुर - A Perfect Date with Nature"
 
ये तो मेरा अनुभव था, अब उद्यान के बारे में कुछ काम की जानकारी – 
·         भरतपुर बर्ड सेंचुरी का असल नाम केवलादेव प्राणी उद्यान है. यह नाम यहाँ स्थित केवलादेव (शंकर) जी के प्राचीन मंदिर के नाम पर पड़ा है. यह उद्यान कुल 29  किमी छेत्रफल एरिया में फैला हुआ है. सीजन में यहाँ लगभग 350 से ऊपर पक्षियों, 50 मछलियों तथा 10 से अधिक साँपों की प्रजाति देखने को मिलती है. इसके अलावा विभिन्न तरह की वनस्पति भी है. हज़ारों की तादाद में हर साल सर्दियों दूर दराज के देशों से पक्षी यहाँ आते हैं और प्रजनन करते हैं. यह उद्यान वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है.
·         लगभग 250 साल पहले भरतपुर के शासक राजा सूरज मल द्वारा इस उद्यान की स्थापना शिकार करने के लिए की गयी थी. 1938 में 12 नवम्बर को तत्कालीन भारत के वायसराय की शूटिंग पार्टी के नाम एक दिन में सबसे अधिक संख्या में बतखों का शिकार करने रिकॉर्ड दर्ज है. यह संख्या 4237 है. मतलब इतने प्राणी सिर्फ एक दिन में शिकार के नाम पर मार दिए गए थे.
 
और अंत में एक पहरा रुकने के ठिकाने के बारे में. वैसे तो भरतपुर में रुकने के ठिकानों की कोई कमी नहीं है. सस्ते से लेकर खूब महंगे तक यहाँ सभी तरह के होटलों की भरमार है. पर मैं जहाँ ठहरा वो जगह थी 'सेंचुरी टूरिस्ट लॉज.'  ये एक छोटी सी लॉज अवस्थी सरनेम के दो भाइयों द्वारा चलायी जाती है. लॉज के प्रबंध और उनकी मेहमान नवाजी देख कर मैं दंग रह गया. यहाँ आपको एकदम घर के जैसे वातावरण मिलेगा. लॉज में आपको फ्री वाई फाई की सुविधा तो है ही साथ ही उद्यान घूमने के लिए अच्छी क्वालिटी की दूरबीन भी उपलब्ध करवाई जाती है. इसके अलावा यहाँ कुछ अच्छी पुष्तकों की एक छोटी से लाइब्रेरी भी है तथा लॉज के मालिक आपको स्थानीय जगहों के बारे में अच्छी जानकारी भी देंगे. और यहाँ के खाने के बारे में तो क्या कहूँ. यहाँ के पकौड़े इतने स्वादिष्ट हैं की इनको तो वर्ल्ड फेमस होना चाहिए था. सिर्फ एक रात के स्टे के दौरान भी मैंने कम से कम छः बार सिर्फ चाय पकौड़े खाये. आलम ये है की उद्यान की खूबसूरती और अवस्थी लॉज के पैकोडे के लिए मैं एक बार फिर से भरतपुर जाने की सोच रहा हूँ. अगर आप कभी यहाँ जाते हैं तो एक बार यहाँ के पकौड़े जरूर खाएं. किराया भी कम है. थोड़ी सी मेहनत कर के लॉज का नंबर नेट पर आसानी से ढूंढा जा सकता है. यदि किसी अन्य साइट के माध्यम से ना जाकर सीधे अवस्थी जी से बात कर के एडवांस में ही कमरा बुक कर लिया जाये तो रेंट में कुछ और कमी भी हो सकती है. भरतपुर यात्रा के दौरान सेंचुरी टूरिस्ट लॉज में ठहराव आपकी यात्रा को और खुशनुमा बना देगा.
 
नोट - मैंने ये यात्रा जनवरी 2017 में की थी। उद्यान घूमने का सीजन आ गया है इसलिए लिख रहा हूँ। आपके पास दिसम्बर और जनवरी सिर्फ दो महीने हैं कुदरत की इस अनोखी जगह को देखने के लिए। एकदम पैसा वसूल जगह है, मौका ना चूकें।